कुमकुम (सौभाग्यालंकार)

आजकल की बुद्धिवादी स्त्रियां पति के निधन के उपरांत कुमकुम लगाती हैं, यह सोच कर कि इसमें कोई आपत्ति नहीं है । इस कृत्य से मृत पति की एवं उस विधवा की आध्यात्मिक स्तर पर हानि हो सकती है । इसलिए ‘हिंदू धर्म के विधिवत शास्त्र शुद्ध संस्कारों के पालन में ही हमारा कल्याण है’, यह समझकर धर्म के आगे अपनी बुद्धि न चलाकर धर्मपालन की ओर गंभीरता पूर्वक ध्यान दें ।’

सोलह संस्कार

धर्म सिखाता है कि मनुष्य-जन्म ईश्‍वरप्राप्ति के लिए है; इसलिए जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रत्येक प्रसंग में ईश्‍वर के निकट पहुंचने के लिए आवश्यक उपासना कैसे की जाए, इसका मार्गदर्शन धर्मशास्त्र में किया गया है ।

गर्भाधान (ऋतुशान्ति) संस्कार (प्रथम संस्कार)

इस संस्कार में विशिष्ट मंत्र एवं होमहवन से देह की शुद्धि कर, अध्यात्मशास्त्रीय दृष्टिकोण एवं आरोग्य की दृष्टि से समागम करना चाहिए, यह मंत्रों द्वारा सिखाया जाता है ।

नामकरण

जिसप्रकार बच्चे का लिंग गर्भाशय में ही निश्चित होता है, उस प्रकार बच्चे का नाम भी पूर्वनिश्चित ही होता है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध, ये घटक एकत्रित रहते हैं; इसीलिए बच्चे का जो रूप है उसके अनुसार उसका नाम भी होता है ।

तीसरा संस्कार : सीमंतोन्नयन

सीमंतोन्नयन शब्द सीमंत (मांग की रेखा) एवं उन्नयन (केश ऊपर से पीछे की ओर करना), इन दो शब्दों से बना है । सीमंतोन्नयन अर्थात पत्नी के सिर के केश ऊपर से पीछे की ओर कर मांग निकालना ।

शिशू के जन्म उपरांत कौनसे संस्कार करें ? (चौथा, पांचवां, छठा एवं सातवां संस्कार)

जातकर्म विधि के उद्देश्य हैं – उदकप्राशनादि से गर्भसंबंधी दोषों का निवारण हो एवं पुत्रमुख देखने से पुत्र का पिता ऋणत्रयी से (पितृऋण, ऋषिऋण, देवऋण से) तथा समाजऋण से मुक्त हो ।

आठवां संस्कार : चौलकर्म ( चूडाकर्म, चोटी रखना )

चूडा अर्थात पुरुष की शिखा (चोटी) । यह शिखा सिर पर सहस्रारचक्र के स्थान पर रखी जाती है । इस स्थान पर स्थित केश छोडकर शेष केश कटवाने की क्रिया को चौलकर्म अथवा चूडाकर्म कहते हैं ।

नौवां संस्कार : उपनयन (व्रतबंध, मुंज अथवा जनेऊ )

उपनयन का अर्थ है, गायत्री मंत्र सीखने हेतु गुरु के (शिक्षक के) पास ले जाना । नयन शब्द का अर्थ आंख भी है । उपनयन अर्थात अंतःचक्षु । जिस विधि से अंतःचक्षु खुलने लगते हैं अथवा खुलने में सहायता होती है, उसे उपनयन कहते हैं ।

दसवां संस्कार : मेधाजनन

इस विधि में पलाश के छडी पर ‘सुश्रव’ यह मंत्र पाठ करते हुए ब्रह्मचारी को (बटु) (ब्रह्मवृक्ष की) डाली के चारों ओर सर्व जल छोडते हुए उसकी तीन बार परिक्रमा करनी पडती है ।

महानाम्नीव्रत, महाव्रत, उपनिषद्व्रत, गोदानव्रत (ग्यारहवां, बारहवां, तेरहवां एवं चौदहवां संस्कार )

ग्यारहवें संस्कार से लेकर चौदहवां संस्कार, इन चार व्रतों को चतुर्वेदव्रत कहते हैं । ये व्रत ब्रह्मचर्याश्रम में आचार्य करवाते हैं ।