सोलह संस्कार

१. प्रस्तावना

धर्म सिखाता है कि मनुष्य-जन्म ईश्‍वरप्राप्ति के लिए है; इसलिए जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रत्येक प्रसंग में ईश्‍वर के निकट पहुंचने के लिए आवश्यक उपासना कैसे की जाए, इसका मार्गदर्शन धर्मशास्त्र में किया गया है । जन्म से लेकर विवाह तक जीवन का एक चक्र पूर्ण होता है । उसी प्रकार का चक्र पुत्र / कन्या के जन्म से उसके विवाह तक चलता है । पीढी-दर-पीढी ऐसा चलता रहता है । गर्भधारण से विवाह तक के काल में जीवन के प्रमुख सोलह प्रसंगों में, ईश्‍वर के निकट पहुंचने हेतु होते हैं ये सोलह संस्कार !

 

२. संस्कार की परिभाषा एवं प्रमुख सोलह संस्कारों के नाम

गर्भधारणा से विवाह तक के काल में माता, पिता एवं आचार्य द्वारा पुत्र अथवा कन्या पर, उनसे सम्यक (सात्त्विक) कृत्य होने हेतु, वैदिक पद्धति से की जानेवाली विधियों को संस्कार कहते हैं ।

इससे मनुष्य में सद्गुणों का विकास एवं संवर्धन होता है तथा दोषों का निराकरण होता है ।

प्रमुख सोलह संस्कारों के नाम

१. गर्भाधान
२. पुंसवन
३. सीमंतोन्नयन
४. जातकर्म (जन्मविधि, पुत्रावण)
५. नामकरण
६. निष्क्रमण (घर के बाहर ले जाना)
७. अन्नप्राशन
८. चौलकर्म (चूडाकर्म, चोटी रखना)
९. उपनयन (व्रतबंध, मुंज)
१०. मेधाजनन
११. महानाम्नीव्रत
१२. महाव्रत
१३. उपनिषद्व्रत
१४. गोदानव्रत (केशांतसंस्कार)
१५. समावर्तन
१६. विवाह

 

३. संस्कारों का महत्त्व

१. पूर्वकाल के ऋषियों ने मानवजाति की उन्नति के लिए प्रत्येक मानव को प्रधानता दी है । उसे संस्कारित कर पूर्ण उन्नत करने पर ही उसे इस मनुष्य जीवन का लाभ होगा । वह सर्व प्रकार से संपन्न होकर अपना जीवन सामर्थ्यपूर्वक एवं आनंदपूर्वक व्यतीत करेगा तथा समाज को उन्नत बनाने के लिए भी सहायता करेगा । इस कारण समाज सुदृढ होकर राष्ट्र सामर्थ्यवान होगा । यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहने पर सामर्थ्यवान राष्ट्र का समाज अपने प्रत्येक नागरिक को सबल बनने में सहायता करेगा । यह चक्र निरंतर चलता रहे, इस हेतु ऋषियों ने सोलह संस्कारों की रचना की । इसमें जन्मसे मृत्यु तक के सोलह संस्कार उस विशिष्ट आयु एवं परिस्थितिनुसार उचित हैं । ये वैदिक संस्कृति की महानता के प्रतीक हैं । इन संस्कारों द्वारा जीव के विचारों में परिवर्तन किया जा सकता है । इससे उसका शरीर, मन एवं आत्मा की शुद्धि होती है । जिन जीवों पर ऐसे संस्कार नहीं होते वे आतंकवादी, भ्रष्टाचारी एवं व्यभिचारी होते हैं । इस कारण वे स्वयं अपना तथा अन्यों का भी जीवन दुःखी बनाते हैं । – परात्पर गुरु पांडे महाराज, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल.

२. संस्कार, मृत्योपरांत के जीवन को सुुखमय बनाने के लिए हैं । इन संस्कारों के पालन से अपने और दूसरों के जीवन को सुखी बनाएं । – गुरुदेव डॉ. काटेस्वामीजी

 

४. संस्कार का अधिकार

प्राचीन काल में बालकों की भांति बालिकाओं पर भी संस्कार किए जाते थे । उनका व्रतबंध भी किया जाता था; परंतु वेदकाल में बालिकाओं के संस्कार छूटते गए और पत्नी इस संबंध का मंत्र सहित विवाहसंस्कार ही केवल जारी रहा । संस्कार मुख्यतः त्रैवर्णिकों के लिए (ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों को) बताए गए हैं । शूद्रों को विहित दस संस्कार अमंत्रक (मंत्र के बिना) करने चाहिए एवं बालिकाओं का भी संस्कार अमंत्रक ही करने चाहिए, ऐसा कहा है । शंखस्मृति के अनुसार पागल एवं गूंगे व्यक्तियों का संस्कार नहीं करना चाहिए ।

गर्भाधान, पुंसवन एवं सीमंतोन्नयन, ये तीन संस्कार केवल स्त्रीदेह से संबंधित हैं ।

 

५. मनाने की पद्धति

संस्कार के दो-तीन दिन पूर्व घर की स्वच्छता, रंगाई-पुताई करनी चाहिए । उसी प्रकार घर के प्रवेशद्वार पर भगवान गणपति के चित्र की स्थापना करनी चाहिए । घर के सामने खुले स्थान, आंगन इत्यादि हों, तो वहां मंडप सजाना चाहिए । आंगन को लीप-पोतकर स्वस्तिक, कमल इत्यादि शुभचिह्नों से युक्त रंगोली सजानी चाहिए । संस्कार से पहले संस्कार्य व्यक्ति को (वह व्यक्ति जिसके संस्कार करने हैं उसे) तथा अन्य संबंधियों को नए वस्त्र एवं आभूषण परिधान करने चाहिए । सगे-संबंधियों को संस्कार्य व्यक्ति को उपहार देना चाहिए ।

वर्तमान परिवर्तनशील काल के प्रवाह में अब उपनयन एवं विवाह संस्कारों का महत्त्व घटकर, संस्कार के स्थान पर समारोह का दिखावा एवं प्रतिष्ठा का प्रदर्शन होता है । इस कारण इन संस्कारों से खरा लाभ भी नहीं मिल पाता । अतः आज समाज को आत्मशोधन कर विवाह को केवल समारोह नहीं; अपितु एक पवित्र संस्कार के रूप में समझने की परम आवश्यकता है ।

 

६. अनिष्ट शक्तियों के प्रभाव को नष्ट करने की पद्धतियां

१. संस्कार के समय अतिमानुषिक शक्तियों का संस्कार्य व्यक्ति पर आक्रमण न हो, इसलिए उनके प्रीत्यर्थ बलिदान कर प्रार्थना करते हैं ।

२. मुंडनसंस्कार में बच्चेे के कटे केश गोमय के पिंड में (गाय के गोबरके गोले में) रखकर, उसे गोशाला की भूमि में गाडते हैं अथवा नदी में प्रवाहित करते हैं । इससे उस केश के माध्यम से कोई भी भूत-पिशाच बच्चे तक नहीं पहुंच सकते ।

३. भूत-प्रेत को भगाने का एक उपाय है, उनकी निंदा-भर्त्सना करना ।

४. यदत्रसंस्थितं भूतं० इत्यादि मंत्रों से उन्हें चेतावनी दी जाती है – भूत, तुम इस स्थानसे निकल जाओ । इसी कारण ब्रह्मचारी एवं स्नातक हाथ में दंड धारण करते हैं ।

५. ऐसी मान्यता है कि सरसों से भूत डरते हैं, इसलिए संस्कारक्षेत्र के आस-पास सरसों फेंकते हैं ।

६. कभी-कभी मनुष्य स्वार्थी बनकर अपने संस्कार्य व्यक्ति को कष्ट देनेवाले भूत-प्रेतों को अन्य किसी व्यक्ति पर धकेल देते हैं ।

७. वधु के वैवाहिक वस्त्र (वधू पर) भूत-प्रेत के आक्रमण का एक निश्‍चित माध्यम होते हैं । ब्राह्मण को कोई भी भूत कष्ट नहीं पहुंचा सकते, अतः ये वस्त्र विवाह के उपरांत ब्राह्मण को दान कर देते हैं अथवा वृक्ष पर अथवा गोशाला में टांगकर रखते हैं ।

 

७. संस्कार एवं आधारविधि

सभी संस्कारों के आरंभ में १. श्री गणपति पूजन, २. पुण्याहवाचन, ३. मातृकापूजन, ४. नांदीश्राद्ध एवं ५. आचार्यवरण की विधियां की जाती हैं । तत्पश्‍चात आवश्यक संस्कार किए जाते हैं । (आधारविधि की विस्तृत जानकारी के लिए पढिए सनातन का ग्रंथ सोलह संस्कार !)

 

८. संस्कार विधि में संकल्प का महत्त्व

प्रत्येक विधि के आरंभ में संकल्प होता ही है, क्योंकि विधि की परिणामकारकता में संकल्प का भाग ७० प्रतिशत और प्रत्यक्ष कृत्य का भाग केवल ३० प्रतिशत रहता है । ऐसा होने पर भी प्रत्यक्ष कृत्य अथवा क्रिया महत्त्वपूर्ण होती है; क्योंकि केवल संकल्प से आनंद नहीं मिलता, अपितु कृत्य से आनंन्दप्राप्ति होती है । इसलिए पुनः वह कृत्य करने का संकल्प मन में आता है ।

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ सोलह संस्कार