कलियुग में विशेषतापूर्ण तथा साधकों से सभी अंगों से बनानेवाली सनातन संस्था की एकमात्रद्वितीय गुरु-शिष्य परंपरा !

सनातन संस्था में ‘गुरु की ओर तत्त्व के रूप में देखें’ की शिक्षा दी जाती है । अतः साधक उसे मार्गदर्शन करनेवाले संतों की ओर अथवा अन्य सहसाधकों की ओर तत्त्व के रूप में देखता है

गुरुसंबंधी आलोचना अथवा अनुचित विचार एवं उनका खंडन !

विश्‍व के आरंभ सेेें भूतल पर विद्यमान सनातन वैदिक धर्म (हिन्दू धर्म), हिन्दुओं के धर्मग्रंथ, देवता, धार्मिक विधि, अध्यात्म आदि पर अनेक लोगों द्वारा आलोचना की जाती है ।

गुरु का सांप्रतकालीन कर्तव्य क्या है ?

काल की आवश्यकता समझकर राष्ट्र तथा धर्मरक्षा की शिक्षा देना, यह गुरु का वर्तमान कर्तव्य है । जिस प्रकार साधकों को साधना बताना गुरु का धर्म है, उसी प्रकार राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा हेतु समाज को जागृत करना, यह भी गुरु का ही धर्म है ।

सनातन संस्थाके आस्थाकेंद्र ‘प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजी’ – द्रष्टा धर्मगुरु एवं राष्ट्रसंत !

गुरु श्रीकृष्णने शिष्य अर्जुनको न केवल मोक्षप्राप्तिके लिए धर्म सिखाया; अपितु ‘धर्मरक्षाके लिए अधर्मियोंसे लडना चाहिए’, यह क्षात्रधर्म भी सिखाया । शिष्यको मोक्षप्राप्तिके लिए साधना बतानेवाले आज अनेक गुरु हैं; परंतु ‘राष्ट्र एवं धर्मरक्षा कालानुसार आवश्यक साधना है’, ऐसी सीख देनेवाले गुरु गिने-चुने ही हैं ।

गुरुके कौन-कौनसे प्रकार हैं ?

८.१०.१९९५ के दिन इंदौरमें मैंने (डॉ. जयंत आठवलेने) बाबासे (प.पू. भक्तराज महाराजजीसे) कहा, ‘‘जब आप बीमार होते हैं, तो आपके पास रहकर आपकी सेवा करनेके विचारकी अपेक्षा ग्रन्थ लिखनेके विचार अधिक आते हैं । सगुण देहकी सेवा मनसे नहीं होती ।’’ इसपर बाबा बोले, ‘‘तुम्हें लगता है कि ग्रन्थ लिखना चाहिए, वही ठीक है । वह ईश्‍वरीय कार्य है ।

गुरु का छायाचित्र घर में लगाने से क्या लाभ होता है ?

गुरु के निरंतर स्मरण हेतु बैठक, रसोईघर अथवा कार्यालय इत्यादि में उनका छायाचित्र लगाया हो, तो अन्य छायाचित्र समान उसे मात्र छायाचित्र न समझकर, वहां प्रत्यक्ष गुरु ही हैं, ऐसा समझना चाहिए ।

गुरुप्राप्तिपूर्व एवं पश्‍चात, आध्यात्मिक उन्नति किस पर निर्भर है ?

गुरु के विषय में परिहासपूर्ण बोलने से शिष्य की अधोगति होती है । हम जैसे अपने माता-पिता के विषय में परिहास नहीं करते, उसी प्रकार गुरु के विषय में भी न बोलें ।

गुरुप्राप्ति पश्‍चात पूजाघर में क्या परिवर्तन करें ?

पूजाघर में गुरु का छायाचित्र अथवा मूर्ति रखनी चाहिए । उसे प्रतिदिन पोंछकर, देवताओं की पूजा करते समय जब अगरबत्ती दिखाते हैं, तो उन्हें भी अगरबत्ती दिखाएं तथा पूजा समाप्त होने पर जब नमस्कार करते हैं तो उन्हें भी नमस्कार करें ।

साधना में अति शीघ्र प्रगति का मार्ग कौन सा है ?

घर-द्वार का त्याग कर गुरुसान्निध्य में रहना साधना में अति शीघ्र प्रगति का मार्ग है । गुरु के प्रति खरे प्रेम की उत्पत्ति हेतु इस सान्निध्य की आवश्यकता है । गुरु के साथ रहने पर ही विषयों पर अंकुश रहता है ।

शिष्य

आध्यात्मिक उन्नति हेतु जो गुरु द्वारा बताई साधना करता है, उसे ‘शिष्य’ कहते हैं । शिष्यत्व का महत्त्व यह है कि उसे देवऋण, ऋषिऋण, पितरऋण एवं समाजऋण चुकाने नहीं पडते ।