गुरुसेवा कैसे करनी चाहिए ?

गुरु द्वारा कोई सेवा बताई जाने पर वह करना, यह मात्र चाकर (नौकर) अथवा दूत समान हुआ; परंतु गुरु को जो अभिप्रेत है (अर्थात ‘श्री’ गुरु की इच्छा जानकर), वह करना सद्शिष्य का लक्षण है ।

बाबा बंदा बहादुरजी को सदैव अपनी स्मृतियों में रखे !

पश्चात, मुगलों ने बाबा बंदा बहादुरजी को अनेक प्रकार के प्रलोभन दिखाए, जिससे वे सिख धर्म छोडकर इस्लाम धर्म अपनाएं । परंतु, बाबा बंदा बहादुरजी अपना धर्म छोडने के लिए तैयार नहीं हुए ।

कलियुग में विशेषतापूर्ण तथा साधकों से सभी अंगों से बनानेवाली सनातन संस्था की एकमात्रद्वितीय गुरु-शिष्य परंपरा !

सनातन संस्था में ‘गुरु की ओर तत्त्व के रूप में देखें’ की शिक्षा दी जाती है । अतः साधक उसे मार्गदर्शन करनेवाले संतों की ओर अथवा अन्य सहसाधकों की ओर तत्त्व के रूप में देखता है

वास्तविक गुरुके लक्षण क्या हैं ?

एक सर्वोत्तम शिक्षकके समान ही गुरुमें सर्व गुण विद्यमान होते हैं । गुरुका खरा गुण है आत्मानुभूति; परन्तु मात्र बुद्धिद्वारा उसका ज्ञान होना असंभव है ।

गुरुमंत्र किसे कहते हैं ? इससे आध्यात्मिक प्रगति शीघ्र होती है ! ऐसा क्यों?

गुरुमंत्र में केवल अक्षर ही नहीं; अपितु ज्ञान, चैतन्य एवं आशीर्वाद भी होते हैं, इसलिए प्रगति शीघ्र होती है । उस चैतन्ययुक्त नाम को सबीजमंत्र अथवा दिव्यमंत्र कहते हैं । उस बीज से फलप्राप्ति हेतु ही साधना करनी आवश्यक है ।

गुरुसंबंधी आलोचना अथवा अनुचित विचार एवं उनका खंडन !

विश्‍व के आरंभ सेेें भूतल पर विद्यमान सनातन वैदिक धर्म (हिन्दू धर्म), हिन्दुओं के धर्मग्रंथ, देवता, धार्मिक विधि, अध्यात्म आदि पर अनेक लोगों द्वारा आलोचना की जाती है ।

गुरु का सांप्रतकालीन कर्तव्य क्या है ?

काल की आवश्यकता समझकर राष्ट्र तथा धर्मरक्षा की शिक्षा देना, यह गुरु का वर्तमान कर्तव्य है । जिस प्रकार साधकों को साधना बताना गुरु का धर्म है, उसी प्रकार राष्ट्र एवं धर्म की रक्षा हेतु समाज को जागृत करना, यह भी गुरु का ही धर्म है ।

सनातन संस्थाके आस्थाकेंद्र ‘प.पू. डॉ. जयंत आठवलेजी’ – द्रष्टा धर्मगुरु एवं राष्ट्रसंत !

गुरु श्रीकृष्णने शिष्य अर्जुनको न केवल मोक्षप्राप्तिके लिए धर्म सिखाया; अपितु ‘धर्मरक्षाके लिए अधर्मियोंसे लडना चाहिए’, यह क्षात्रधर्म भी सिखाया । शिष्यको मोक्षप्राप्तिके लिए साधना बतानेवाले आज अनेक गुरु हैं; परंतु ‘राष्ट्र एवं धर्मरक्षा कालानुसार आवश्यक साधना है’, ऐसी सीख देनेवाले गुरु गिने-चुने ही हैं ।

गुरु-शिष्य संबंधित सामान्य शंकाओं का निरसन

सप्तसिंधु में नहाने से, अनेक तीर्थ करने से जो फलप्राप्ति होती है, वह सद्गुरु के चरणों के तीर्थ के एक सहस्रवें अंश के समान भी नहीं । (गुरुगीता पंक्ति ४४ का अनुवाद)

खरा ध्यान किसे कहते हैं और इसके लिए गुरु की आवश्यकता क्यों प्रतीत होती है ?

कभी-कभी ध्यानमार्ग का अनुसरण करनेवाले योगी ध्यान का आधार लेते हैं; परंतु जो आत्मप्रेरित है, सहज ही आरंभ होता है, वही खरा ध्यान है । यह सहजध्यान आरंभ करने हेतु गुरु की आवश्यकता प्रतीत होती है; क्योंकि केवल उन्हीं की अंतःस्थिति उच्च श्रेणी की होती है । गुरु के कारण आरंभ हुआ सहजध्यान ही अंत में योगी को पूर्णत्व की प्राप्ति करवा सकता है ।