कलियुग में विशेषतापूर्ण तथा साधकों से सभी अंगों से बनानेवाली सनातन संस्था की एकमात्रद्वितीय गुरु-शिष्य परंपरा !

गुरु-शिष्य परंपरा भारत की विशेषता है । इस परंपरा के कारण ही हिन्दू धर्म अनेक विदेशी आघातों में भी समर्थरूप से टिका हुआ है । सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने इस परंपरा को विशेषरूप से संजोया है । ‘गुरु अपने शिष्य को विविध प्रसंगों के माध्यम से अथवा अनुभितियों के माध्यम से सिखाते हैं, साथ ही वे केवल अपने अस्तित्व के कारण भी शिष्य की उन्नति करवा लेते हैं, इसकी प्रचीती हमें सनातन संस्था में देखने के लिए मिलती है । परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने सनातन संस्था के साधकों को सभी अंगों से बनाया है । उसके कारण ही आज १०० से भी अधिक साधक संत बन चुके हैं । निम्नांकित लेख से हम ‘सनातन के संत गुरु की भांति ही साधकों को कैसे बनाते हैं ?,’ इसका विवेचन देखेंगे ।

साधकों को व्यष्टि एवं समष्टि स्तरपर मार्गदर्शन करनेवाली सनातन की गुरु-शिष्य परंपरा के चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !

 

१. बाह्य आडंबर नहीं, अपितु सहजतावाले सनातन के संत !

पर्रात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का कोई बाहरी आडंबर नहीं है, वैसे वह सनातन संस्था के संतों का भी नहीं है । अन्य संतों के संदर्भ में अलग वेशभूषा, अच्छी सुविधाएं, उच्च आसनपर बैठके का प्रबंध, साथ में सेवक, फौज, फूल-मालाएं चढाना आदि चित्र देखने के लिए मिलता है; परंतु सनातन संस्था के संतों के संदर्भ में ऐसा कुछ नहीं है । सनातन संस्था के सभी संत किसी साधक अथवा शिष्य की भांति सभी साधकों से बातें करते हैं और बहुत ही सहजता से सभी में घुल-मिल जाते हैं । आश्रम में प्रसाद-महाप्रसाद के समय भी वे साधकों के साथ ही बैठते हैं । अतः उनके साथ बातें करते समय किसीपर तनाव नहीं होता । सनातन संस्था के संत स्वयं का अलगपन न संजोकर सभी में से ही एक होते हैं । आश्रम में सभी के लिए जो सुविधाएं हैं, उनका ही वे उपयोग करते है । वे स्वयं के लिए अलग सुविधाओं का उपयोग नहीं करते ।

– श्री. यज्ञेश सावंत

 

२. स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन की प्रक्रिया
अपनाकर साधकों को यथार्थ में बनानेवाले संत !

२ अ. साधकों को उनकी चूकों का भान करा देना

ईश्‍वर से एक भी चूक नहीं होती । अतः उसके साथ एकरूप होना हो, तो साधक को भी तडप के साथ प्रयास करने आवश्यक हैं । संत साधकों की चूकों की ओर अधिक ध्यान देकर उनकी चूकों के पीछे कौनसे स्वभावदोष हैं ?, यह बताते हैं । ‘साधक ने क्या किया ?’, इसकी अपेक्षा ‘उससे क्या रह गया ? और ‘उससे कहां चूक हुई ?’, इसकी ओर ध्यान देकर वे उनका मार्गदर्शन करते हैं । इसके कारण साधक की शीघ्र उन्नति होकर वह उत्तरोत्तर आनंदित होता जाता है ।

२ आ. ‘संत साधकों को कैसे बनाते हैं ?’, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण !

साधना का महत्त्वपूर्ण अंग है स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन की प्रक्रिया ! सनातन संस्था के संत इसीपर सर्वाधिक बल देते हैं । उससे लिए वे प्रत्येक साधक की बहुत तडप के साथ सहायता करते हैं । स्वभावदोष एवं अहं के निर्मूलन के बिना साधना में उन्नति ही नहीं, अपितु अधोगति ही होती है । अतः इस प्रक्रिया की ओर वे अधिक ध्यान देते हैं । एक साधक से एक ही प्रकार की बार-बार चूकें होती थीं, उदा. सेवाओं की निर्धारित कार्यपद्धति में अपने मन के अनुसार बदलाव करना, संदेश पहुंचाना भूल जाना, किसी ने भ्रमणभाष किया, तो उसे न उठाना आदि । एक संत बहुत शांति से उसे साधना के नए-नए दृष्टिकोण देकर उस साधक को उसकी चूकों का भान करा देते थे । वास्तव में किसी साधक से होनेवाली उसी प्रकार की चूकें सुनकर कोई त्रस्त हो जाएगा अथवा उसपर क्रोधित होगा; परंतु उस संतजी में ‘उस साधक को उस स्थिति से बाहर निकालना मेरी साधना है’, यह दृष्टिकोण होने से उनमें उस साधक को बनाने की बहुत तडप थी । उस संतजी द्वारा लिए गए कई सत्संगों से अन्य साधकों के मनपर भी चूकें न करने का महत्त्व अंकित किया गया । संत चूकों के प्रति समय पडनेपर कठोर भी हो जाते हैं; परंतु अगले ही क्षण वे संबंधित साधक से उतने ही प्रेम से बातें करते हैं । साधकों को बनाने की यह अलग पद्धति केवल और केवल सनातन संस्था में भी देखने को मिलती है ।

२ इ. चूकों का परिमार्जन करवा लेना

मन में आनेवाले अयोग्य विचारों को कैसे बदला जा सकता है ?, उसपर उचित दृष्टिकोण कैसे देने हैं ?, स्वभावदोष निर्मूलन एवं गुणसंवर्धन कैसे करना चाहिए ?’, इस विषय में संत साधकों को सिखाते ही हैं; परंतु चूकों का परिमार्जन कैसे करना चाहिए ?, इस संदर्भ में भी वे मार्गदर्शन करते हैं । चूक को स्वीकारना, संबंधित साधक से क्षमायाचना करना, फलकपर चूकें लिखना, खेद ताप्रतीत होना जैसे विविध माध्यमों से चूकों का परिमार्जन होता है । उसके कारण साधक का साधना में होनेवाला अधःपात समय रहते ही टल जाता है । उससे नया प्रारब्धकर्म नहीं बनता और वह साधक पुनः जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं फंसता ।

 

३. साधना के विविध तत्त्वों के संदर्भ में संतों द्वारा दी जानेवाली मार्गदर्शन शिक्षा !

३ अ. साधना, मन की निर्मलता एवं अध्यात्मिकरण के संदर्भ में बताना

व्यवहार एवं साधना में विद्यमान अंतर, प्रत्येक बात का अध्यात्मिकरण कैसे करना चाहिए ?, काल के अनुसार साधना कैसी करनी चाहिए ?, प्रकृति के अनुसार साधना कैसे करनी चाहिए ?, स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया के माध्यम से चित्तपर विद्यमान संस्कारों को कैसे दूर करना चाहिए ? आदि की शिक्षा संतों द्वारा ही मिलती है । मन को निर्मल और भावभक्तिमय बनाने की शिक्षा भी संतों द्वारा ही दी जाती है । इसके फलस्वरूप कला, संगीत, नृत्य, निर्माण जैसा कोई भी क्षेत्र हो, वहां सेवारत साधन साधना में तीव्रगति से आगे बढता है । इसके कारण ही विविध क्षेत्रों में कार्यरत साधक, साथ ही घरबैठे साधना करनेवाले कई साधक भी संत बन चुके हैं ।

३ आ. संतों द्वारा ‘गुरु की ओर तत्त्व के रूप में देखें’ का बोधामृत दिया जाना

पहले के युगों में गुरु-शिष्य संबंधोंपर विचार करनेपर तथा आज के कुछ संप्रदायों में देखा जाए, तो कोई गुरु शिष्यों को एकत्रित कर मार्गदर्शन कर रहे हैं, ऐसा चित्र सामने आता है । सनातन संस्था में ‘गुरु की ओर तत्त्व के रूप में देखें’ की शिक्षा दी जाती है । अतः साधक उसे मार्गदर्शन करनेवाले संतों की ओर अथवा अन्य सहसाधकों की ओर तत्त्व के रूप में देखता है । यहां कोई भी किसी में नहीं फंसता, साथ ही एक ही समय अनेक साधक साधना की दृष्टि से बन जाते हैं ।

श्री दत्तात्रेयजी ने जिस प्रकार से २४ गुणगुरुओं से सिखने का प्रयास किया, उसी प्रकार से साधक अपने साथके साधक से कुछ न कुछ सिखने का प्रयास करता है । प्रसार में कार्यरत साधक समाज के लोगों से सिखते हैं, साथ ही वे जो कुछ भी सिखते हैं, उसको प्रत्यक्ष आचरण में लाने से पूर्व संबंधित लोगों से भी पूछते हैं । इसके फलस्वरूप वे निरंतर सिखने की स्थिति में रहकर आगे बढते हैं । साधकों में सिखने की वृत्ति बढती है । गुरुदेवजी के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के बिना ही साधकों द्वारा सनातन प्रभात में दी जानेवाली प्रत्येक चौकट का आज्ञापालन किया जाता है । इससे गुरुदेवजी को प्रत्येक बार साधकों को प्रत्यक्षरूप से बताने की आवश्यकता नहीं पडती । आज्ञापालन का गुण शिष्य के सभी गुणों का राजा है । सनातन संस्था के साधकों ने इस गुण को अपनाया है; इसलिए वे उसका तुरंत क्रियान्वयन करते हैं ।

३ इ. संतों द्वारा ‘समस्या का दायित्व केवल संबंधित साधकों
का ही नहीं, अपितु वह उसे ज्ञात होनेवाले सभी का ही है’ यह सीख दी जाना !

एक बार एक आश्रम के बाहर जलभराव हुआ था । वहां से आने-जानेवाले कई साधकों ने भी इसे देखा था । एक संतजी ने सत्संग में इस विषय को उठाया । संतों ने साधकों से कहा, ‘‘यहां जलभराव हुआ है । उसमें सुधार का दायित्व संबंधित साधक का तो है ही; परंतु जिन साधकों ने जलभराव को देखकर भी कुछ कृत्य नहीं किया, वे भी उसके लिए उत्तरदायी हैं । इससे उनकी साधना की भी हानि हुई है ।’’ इस दृष्टिकोण के कारण साधकों को केवल ‘मेरी सेवा’ इतना ही न देखकर सामने दिखाई देनेवाली प्रत्येक चूक, भले ही वह कुछ भी हो; उसे समझ लेकर उसे स्वयं की चूक मानकर उसमें सुधार का प्रयास करने से ही हमारी साधना होगी, यह भान हुआ । इससे प्रत्येक घटना की ओर साधना के रूप में देखने का अंग विकसित होता है और यही समष्टि साधना भी है । इस चूक से ‘जो दिखता है, वही कर्तव्य है’, यह साधना का अंग साधकों के मनपर अंकित हुआ । उससे साधक में समाज एवं राष्ट्र की समस्याओं  की ओर देखने दृष्टिकोण विकसित होता है ।

३ ई. अपने आचरण से समष्टि जीवन की शिक्षा देनेवाले सनातन के संत !

एक संतजी के कक्ष में वातानुकूलन यंत्र है । गरमी के दिनों में उनके निवास के परिसर में बहुत गरमी होती है; परंतु उन संतजी ने अन्य स्थानोंपर साधकों के लिए वातानुकूलन यंत्र न होने से वे स्वयं भी वातानुकूलन यंत्र का उपयोग नहीं करते । इससे उन्होंने साधकों को समष्टि जीवन की शिक्षा दी है । इससे साधकों को ‘अन्यों को कोई सुविधा नहीं, तो उसे स्वयं भी उपयोग करना उचित नहीं होगा, इसका साधकों को बोध मिला, साथ ही उन्होंने स्वयं का अलगपन भी नहीं संजोया ।

 

४. संत एवं वामपंथ

‘सभी के लिए समानता होनी चाहिए’, ऐसा बताते हुए उत्पन्न वामपंथ के नाम से कंठशोष करनेवाले स्वयं धनी बने हैं और निर्धन वहीं के वहीं हैं । वामपंथी ही उनका शोषण करते हैं । इसके विपरीत संत अपने छोटे-छोटे कृत्यों से समष्टि का विचार करना सिखाते हैं । यही वास्तविक वामपंथ है ।

हमने सनातन संस्था के गुरु-शिष्य परंपरा की विशेषताएं संक्षेप में देखीं । वास्तव में ये विशेषताएं असीम और अनंत हैं, साथ ही गुरु-शिष्य परंपरा की अलग विशेषताओं के कारण वह एकमात्रद्वितीय प्रमाणित होती है । इस प्रकार की गुरुपरंपरा को स्थापित करनेवाले परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञता !’

श्री. यज्ञेश सावंत, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल

 

साधकों की व्यष्टि साधकों की समीक्षा कर
उन्हें साधना के अगले चरण में ले जानेवाले संत !

साधकों की व्यष्टि साधना की समीक्षा कर साधकों का सभी स्तरोंपर मार्गदर्शन करना सनातन संस्था के संतों की महत्त्वपूर्ण विशेषता है । साधना की समीक्षा करने से क्या वह ईश्‍वरप्राप्ति की दिशा में अग्रसर है ?, क्या उसकी साधना में कुछ शारीरिक, मानसिक और पारिवारिक समस्याएं तो नहीं हैं ?, क्या साधक को आनंद मिल रहा है ? इत्यादि के विषय में वे उसका अचूक मार्गदर्शन कर साधना के अगले चरण में ले जाते हैं । अंतर्यामी संतों को सबकुछ ज्ञात होता है; इसके कारण केवल वहीं साधकों का अचूकता से मार्गदर्शन कर सकते हैं । अतः वे साधकों का दिनभर के प्रत्येक कृत्य को साधना के रूप में अथवा ईश्‍वर को अपेक्षित होने के संदर्भ में मार्गदर्शन करते हैं ।

स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात