गुरुसंबंधी आलोचना अथवा अनुचित विचार एवं उनका खंडन !

उद्देश्य

विश्‍व के आरंभ सेेें भूतल पर विद्यमान सनातन वैदिक धर्म (हिन्दू धर्म), हिन्दुओं के धर्मग्रंथ, देवता, धार्मिक विधि, अध्यात्म आदि पर अनेक लोगों द्वारा आलोचना की जाती है । कुछ लोगों को यह आलोचना सत्य प्रतीत होती है, तो कुछ को ‘यह आलोचना विषैली है’, यह ध्यान में आने पर भी आलोचना का खंडन करना संभव नहीं हो पाता । कुछ विद्वानों या अभ्यासियों द्वारा भी अज्ञानवश अयोग्य विचार प्रस्तुत किए जाते हैं ।

ऐसे सर्व अयोग्य विचार तथा आलोचना का योग्य प्रतिवाद न करने से धर्म के प्रति हिन्दुआें की श्रद्धा दोलायमान होती है एवं इससे धर्महानि होती है । इस धर्महानि को रोकने के लिए हिन्दुओं को बौद्धिक बल प्राप्त हो, इस हेतु अयोग्य विचार तथा आलोचनाओं का खंडन आगेे दिया है ।

१. कहते हैं, ग्रंथों के रहते गुरु की क्या आवश्यकता है ?

अयोग्य विचार : हमारे पास अध्यात्मशास्त्र के एक से बढकर एक ग्रंथ हैं, उनमें सर्व सूत्रों का विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है । उनके आधार पर जिज्ञासु अंततक पहुंच सकता है । ऐसे मेें गुरु की क्या आवश्यकता ?

खंडन : अ. शल्यकर्म की कितनी भी पुस्तकें पढ लें, जबतक स्वयं किसी के मार्गदशर्र्न में शल्यकर्म नहीं करते, तबतक शल्यकर्म का तंत्र वास्तव में आत्मसात नहीं होता । उसी प्रकार मात्र ग्रंथ पढकर ईश्‍वरप्राप्ति करना अत्यंत कठिन है; इसलिए प्रत्यक्ष मार्गदर्शन करनेवाले गुरु की आवश्यकता होती है ।

आ. शिष्य की वास्तविक प्रगति गुरु के संकल्प से ही होती है । ग्रंथ संकल्प नहीं कर पाता ।

२. कहते हैं, वस्त्रों की भांति गुरुको भी जांच-परखकर चुनना चाहिए !

अयोग्य विचार : हम कुर्ता खरीदते समय दस कुर्ते देखकर उनमें से एक, साडी सैकडों में एक खरीदते हैं, उसी प्रकार गुरु भी जांच-परखकर ही चुनने चाहिए । गुरु की पात्रता अल्प होने पर शिष्य की प्रगति भी अल्प होती है ।

खंडन अ. वस्त्र हम अपनी रुचि से लेते हैं; परंतु औषधि अपनी रुचि से नहीं लेते, जो आधुनिक वैद्य (डॉक्टर) बताते हैं, वही लेते हैं । गुरु को परखना सामान्य व्यक्ति के लिए संभव नहीं । कोई आधुनिक वैद्य ही यह बता सकता है कि दूसरा आधुनिक वैद्य अच्छा है अथवा नहीं । उसी प्रकार कोई गुरु ही सूक्ष्म स्तर पर जानकर यह बता सकते हैं कि दूसरे गुरु योग्य हैं अथवा नहीं । साधारण व्यक्ति में सूक्ष्म का ज्ञान नहीं होता, इसलिए वह इस विषय में कोई निर्णय लेने में अक्षम होता है ।

आ. अध्यात्म में शिष्य गुरु को नहीं चुनते; अपितु गुरु ही शिष्य को स्वीकारते हैं, अर्थात वे ही शिष्य को चुनते एवं उसकी सिद्धता (तैयारी) करते हैं । साधक का आध्यात्मिक स्तर ५५ प्रतिशत से अधिक होने पर गुरु स्वयं उसके पास आकर उसे शिष्य के रूप में स्वीकारते हैं । साधक का आध्यात्मिक स्तर ४० प्रतिशत हो एवं मुमुक्षुत्व (लगन) तीव्र हो, तो भी उसे गुरुप्राप्ति होती है । संक्षेप में, गुरु खोजने की अपेक्षा शिष्य के रूप में पात्र होने के लिए साधक को प्रयत्न करने चाहिए ।

स्त्रोत : सनातनका ग्रंथ ‘ गुरुका महत्त्व, प्रकार एवं गुरुमंत्र ‘