भारतियों का अत्यंत प्रगत प्राचीन जलव्यवस्थापन तथा पाश्चात्त्यों के अंधानुकरण के कारण निर्माण हुआ जल का दुर्भिक्ष्य !

‘जल का महत्त्व, उसका शोध तथा उसका नियोजन, इसका संपूर्ण विकसित तंत्रज्ञान हमारे देश में था । कुछ सहस्त्र वर्ष पूर्व हम वह प्रभावी पद्धति से उपयोग कर रहे थे तथा उसके कारण हमारा देश वास्तव में ‘सुजलाम् सुफलाम्’…

मलेशिया के ३ सिद्धों के जीवसमाधीस्थलों के दर्शन

‘२६.१.२०१९ को पू. (डॉ.) ॐ उलगनाथनीजी ने भ्रमणभाषपर बताया, ‘‘ सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी ६ से १३.३.२०१९ की अवधि में मलेशिया जाकर वहां के सिद्धों के समाधिस्थल खोजें ।’महर्षिजी द्वारा बताए जाने के अनुसार सद्गुरु (श्रीमती) अंजली गाडगीळजी तथा उनके साथ गए साधकों ने वहां जाकर सिद्धों के समाधिस्थलों का शोध किया । इसका समाचार यहां दे रहे हैं –

अखिल भारतवर्ष के कुंभपर्व का धार्मिक महत्त्व !

कुंभपर्व अत्यंत पुण्यकारी होने के कारण इस पर्व में प्रयाग, हरद्वार (हरिद्वार), उज्जैन एवं त्र्यंबकेश्‍वर-नासिक में स्नान करने से अनंत पुण्यलाभ मिलता है । इसीलिए करोडों श्रद्धालु और साधु-संत यहां एकत्रित होते हैं ।

ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवजी का रूप है प्रयागराज का लाखों वर्ष प्राचीन परमपवित्र अक्षयवट !

अमेरिका अथवा अन्य किसी देश में कोई प्राचीन वस्तु मिलनेपर उसका विश्व में ढिंढोरा पीटा जाता है; किंतु अतिप्राचीन अक्षयवट की महिमा संपूर्ण विश्व को गर्व प्रतीत होनेयोग्य होते हुए भी भारत के तत्कालीन कांगेस सरकार ने उसे दर्शन हेतु नहीं खोला ।

इंडोनेशिया के जावा द्वीपपर प्रंबनन मंदिर में रामायण नृत्यनाटिका !

भारत से दूर इंडोनेशिया में वहां के लोगों ने अभी तक रामायण नृत्यनाटिका के माध्यम से राम के आदर्शों को संजोया है । रामायण वास्तव में घटित हुए अनेक युग बीत गए; परंतु विश्‍व में अनेक स्थानों पर अलग-अलग रूप में रामायण की कथा बताई जाती है ।

श्रीलंका का नगर नुवारा एलिया में राम-रावण युद्ध का साक्षी रामबोडा तथा रावणबोडा पर्वत तथा एक संत द्वारा स्थापित गायत्रीपीठ आश्रम !

रामायण में जिस भूभाग को लंका अथवा लंकापुरी कहा गया है, वह स्थान है आज का श्रीलंका देश ! त्रेतायुग में श्रीमहाविष्णुजी ने श्रीरामावतार धारण किया तथा लंकापुरी जाकर रावणादि असुरों का नाश किया । वाल्मिकी रामायण में महर्षि वाल्मिकी ने जो लिखा, उसीके अनुरूप घटनाएं घटने के अनेक प्रमाण श्रीलंका में मिलते हैं ।

विश्‍व का सबसे बडा धार्मिक मेला : कुम्भ मेला

कुम्भ मेला एक प्रकार का धार्मिक मेला है । करोडों हिन्दुओं के जनसमूह की उपस्थिति में संपन्न होनेवाला कुम्भ क्षेत्र का मेला विश्व का सबसे बडा धार्मिक मेला है । कुम्भ मेले में सभी पंथों तथा संप्रदायों के साधु-संत, सत्पुरुष तथा सिद्धपुरुष लाखों की संख्या में एकत्र आते हैं ।

कुंभमेले में विद्यमान कुछ परंपराएं तथा उनका इतिहास !

कुंभपर्व के समय आयोजित धार्मिक सम्मेलन में शस्त्र धारण करने के विषय में निर्णय होकर एकत्रित होने के अखंड आवाहन किया गया ।

परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी की कृपा से हो रहा अध्यात्म और सनातन संस्कृति का विश्‍वव्यापी पसार !

विज्ञान नहीं, अपितु अध्यात्म ही मानव की खरी उन्नति कर सकता है और उसे आनंद और शांति दे सकता है । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय द्वारा किए जा रहे अध्यात्म के प्रसार का परिचय करवाने और अन्यों को इसमें सम्मिलित करने के लिए हमारी यात्रा चल रही है ।

इंडोनेशिया में पग-पग पर दिखाई देनेवाले प्राचीन हिन्दू संस्कृति के अवशेष

एक समय जहां समुद्रमंथन हुआ था, वह भूभाग आज का इण्डोनेशिया है ! १५ वीं शताब्दी तक इण्डोनेशिया में श्रीविजय, मातरम्, शैलेंद्र, संजया, मजपाहित जैसे हिन्दू राजाओं का राज्य था । पश्‍चात, मुसलमानों के आक्रमण से वहां की भाषा और संस्कृति में परिवर्तन हुआ ।

Donating to Sanatan Sanstha’s extensive work for nation building & protection of Dharma will be considered as

“Satpatre daanam”