साधकों, जो कुछ होता है, वह अच्छे के लिए ही होता है और हम अपने मन को सतत ईश्वर के सान्निध्य में रहना सिखाएंगे तो उससे हमारी साधना होती है !

‘मेरी ओर कोई ध्यान नहीं देता’, ऐसा विचार नहीं करना है । हम जो कुछ भी करते हैं, उस प्रत्येक बात का लेखा-जोखा भगवान के पास होता है । हमें ऐसा लगना; अर्थात अपने मन में असुरक्षितता की भावना है । हमारे संदर्भ में जो कुछ भी होता है, वह अच्छे के लिए ही होता … Read more

एक परिवार का एक व्यक्ति यदि साधना में होगा, तब भी वह साधक और उसका परिवार बहुत पुण्यवान होता है !

‘कलियुग में साधना करनेवाले व्यक्ति मिलना कठिन है और साधना करनेवाले साधक मिलना उससे भी अधिक कठिन है । किसी परिवार में एक साधक साधना में होगा, तब वह साधक और उसका परिवार बहुत पुण्यवान है । उस पुण्य को कृतज्ञतापूर्वक नमस्कार करने के लिए हमें उन साधकों से मिलना पडता है ।’ -श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) … Read more

साधना का चैतन्य !

हम अपने व्यक्तित्व के कारण औरों के ध्यान में नहीं रहते, अपितु साधना के चैतन्य के कारण ध्यान में रहते हैं ! – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

अध्यात्मशास्त्र एक अथांग सागर समान अमर्याद है !

अध्यात्मशास्त्र एक अंतहीन सागर समान अमर्यादित है । जितना भी हम अध्यात्म में सीखें, वह अल्प ही है । सीखने के लिए अनेक जन्म भी अपर्याप्त हैं । इसलिए अध्यात्म का बुद्धि से अध्ययन करने की अपेक्षा तत्त्व समझकर उसका शास्त्र समझना आवश्यक है ।

अध्यात्म को जानना एवं जीना, इसका अर्थ क्या है ?

अध्यात्म में जो सीखा है, उसे तुरंत कृति में लाना, यही ‘अध्यात्म को जानना एवं जीना’ है । अध्यात्मशास्त्र को ईश्वर के प्रति भावभक्ति से ही समझा जा सकता है ।

अध्यात्म को जानना एवं जीना, इसका अर्थ क्या है ?

अध्यात्म में जो सीखा है, उसे तुरंत कृति में लाना, यही ‘अध्यात्म को जानना एवं जीना’ है । अध्यात्मशास्त्र को ईश्वर के प्रति भावभक्ति से ही समझा जा सकता है ।

काल को ईश्वर समझने पर प्रारब्ध पर सहजता से विजय पाना संभव !

काल (समय) हमें अध्यात्म सिखानेवाला उत्तम शिक्षक है । वह हमारे लिए परिस्थिति, परिणाम, प्रारब्ध के कारण आनेवाले सुखद-दुःखद प्रसंग लेकर आता रहता है । यदि हमने काल (समय) को ही ईश्वर समझकर स्वीकार लिया, तो जीवन में आए दिन ही होनेवाली घटनाओं का कुछ भी नहीं लगता । इस प्रकार हम अपने प्रारब्ध पर … Read more

विज्ञान के प्रयोग में त्रुटि हो सकती है; किन्तु अध्यात्म का कोई भी प्रयोग न तो चूकता है, न ही निष्फल होता है !

अध्यात्म की श्रेष्ठता एवं विज्ञान की मर्यादाएं कलियुग में अनेक लोग विविध वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं । यह आवश्यक नहीं कि वे सभी प्रयोग सफल हों । कई बार विज्ञान के प्रयोग में त्रुटि होने के कारण उसके लिए उपयोग किया गया मनुष्यबल, आर्थिक निवेश एवं समय, इस प्रकार समस्त ऊर्जा प्रयोग के अंत में … Read more

विज्ञान के प्रयोग में त्रुटि हो सकती है; किन्तु अध्यात्म का कोई भी प्रयोग न तो चूकता है, न ही निष्फल होता है !

अध्यात्म की श्रेष्ठता एवं विज्ञान की मर्यादाएं कलियुग में अनेक लोग विविध वैज्ञानिक प्रयोग करते हैं । यह आवश्यक नहीं कि वे सभी प्रयोग सफल हों । कई बार विज्ञान के प्रयोग में त्रुटि होने के कारण उसके लिए उपयोग किया गया मनुष्यबल, आर्थिक निवेश एवं समय, इस प्रकार समस्त ऊर्जा प्रयोग के अंत में … Read more

मनुष्य जन्म में साधना करने का महत्त्व

अनेक जन्मों के पश्चात मनुष्य जन्म प्राप्त होता है एवं ‘अनेक जन्मों में की गई साधना के फलस्वरूप परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी जैसे ‘गुरु’ उस मनुष्य के जीवन में आते हैं । मनुष्य की आयु अल्प है । इसलिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी साधकों को इसका सतत भान कराते हैं एवं मनुष्य के जन्म को … Read more