समष्टि मौन

‘अनावश्यक न बोलना, अर्थात खरे अर्थ में समष्टि मौन !’ – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

अनेक से एक में जाना

‘अनेक से एक मेंं जाना’, इस अध्यात्म के सिद्धांत अनुसार अनेक विचारों की अपेक्षा भगवान के नामजप का एक ही विचार महत्त्वपूर्ण है और वही हमें अद्वैत में ले जाता है ।’ – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

प्रतिदिन सीखें और नदी के बहते पानी समान प्रगति कर एक दिन मोक्ष नामक सागर में जाकर विलीन हों !

‘अपना आध्यात्मिक जीवन नदी के पानी के प्रवाह समान होना चाहिए । रास्ते में असंख्य पत्थर-शिलाएं, मिट्टी, वृक्ष इत्यादि पानी के प्रवाह का मार्ग अवरुद्ध करते हैं । अनेक गांवों से बहते-बहते नदी आगे-आगे जाती है और एकदम अंत में कभी न कभी वह समुद्र में जाकर मिल जाती है । यहीं पर उसका प्रवास … Read more

भगवान का नामजप सतत करने से देह का देवत्व जागृत होकर अध्यात्म में शीघ्र उन्नति होती है !

मंत्रोपचार के कारण मूर्ति में शीघ्र सजीवता आती है, अर्थात वह जागृत होती है । एकदम इसी पद्धति से यदि हम भी भगवान का नामजप सतत करेंगे तो हमारी देह का भी देवत्व शीघ्र जागृत होता है, अर्थात हमारी अध्यात्म में शीघ्र उन्नति होती है ! – श्रीचित्‌शक्‍ति सौ. अंजली गाडगीळ

गुरु

‘गुरु तत्त्वस्वरूप होते हैं । वे काल के परे चले जाने से उनके लिए जीवन और मृत्यु समान ही होते हैं । जीवन अर्थात प्रसंगों की उत्पत्ति और मृत्यु अर्थात प्रसंगों का लय । सुख की उत्पत्ति और दुःख का लय, इसे साधनेवाला स्थितिवाचक आनंद देनेवाले अर्थात गुरु !’ – श्रीचित्‌शक्‍ति (श्रीमती) अंजली गाडगीळ

काल को ईश्वर समझ लेने पर प्रारब्ध पर सहजता से मात करना संभव होता है

काल हमें अध्यात्म सिखानेवाला उत्तम शिक्षक है । वह हमारे लिए परिस्थिति, परिणाम, प्रारब्ध के कारण आनेवाले सुख-दुःख, सभी कुछ लेकर आता है । काल को ईश्‍वर समझकर सामना करने पर, जीवन की नित्य होनेवाली बातों का हमें कुछ भी नहीं लगता । इससे हम प्रारब्ध पर सहजता से मात कर पाते हैं । – … Read more

प्रायोगिक जानकारी मिलना और आनंदावस्था शीघ्र प्राप्त होना

अध्यात्म में कृति का महत्त्व सनातन संस्था में सप्ताह, पारायण नहीं होता, अपितु साधना में कृति कर आगे जाने के लिए स्वभावदोष-निर्मूलन एवं अहं-निर्मूलन सत्संग एवं साधना का ब्योरा लेना, यह नियमित होता है । पारायण से केवल तात्त्विक जानकारी मिलती है; परंतु स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन प्रक्रिया से अहं शीघ्र अल्प होने से ईश्वरविषयी … Read more

किसी प्रसंग का कार्यकारणभाव समझने की अपेक्षा सतत सीखने की स्थिति में रहकर साधना में आगे जाना चाहिए !

कई बार साधकों को उनके भाव के कारण स्थूल से और सूक्ष्म स्तर पर अनेक अनुभूतियां होती हैं । कई बार साधक संतों से इस विषय में पूछते हैं कि ऐसे कैसे हुआ ? वैसे क्यों हुआ ? स्वप्न में जो दिखाई दिया, उसका कारण क्या है ? इत्यादि । इन विचारों का साधकों के … Read more

आध्यात्मिक अधिकारी व्यक्ति के दर्शन अर्थात ईश्वरीय ऊर्जा के दर्शन !

हम किसी आध्यात्मिक अधिकारी व्यक्ति के दर्शन लेते हैं, तब वह केवल उस व्यक्ति के दर्शन न होकर उसके स्थान पर ईश्वरीय ऊर्जा के दर्शन होते हैं । – श्रीचित्‌शक्‍ति श्रीमती अंजली गाडगीळ

देवदर्शन एवं देवस्मरण में भेद !

देवदर्शन को स्थूल के बंधन हैं ; परंतु देवस्मरण को उसका बंधन नहीं । हम जहां हैं, वहां उसे अनुभव कर सकते हैं । उसके लिए हमारी उतनी श्रद्धा एवं लगन की आवश्यकता है । – श्रीचित्‌शक्‍ति श्रीमती अंजली गाडगीळ