परात्पर गुरु पांडे महाराज का छायाचित्रमय जीवनदर्शन
ईश्वर की कृपा से ही प.पू. बाबाजी के छायाचित्रों द्वारा दर्शाया गया यह अल्प परिचय उनके चरणों में सविनय अर्पण करते हैं !
ईश्वर की कृपा से ही प.पू. बाबाजी के छायाचित्रों द्वारा दर्शाया गया यह अल्प परिचय उनके चरणों में सविनय अर्पण करते हैं !
भारत ही सात्त्विक शक्ति का केंद्रीय भूतपूर्व स्थान है । इस सत्य को जानकर सात्त्विक शक्ति का जागरण एवं शौर्यबोध इन दोनों का जागृत करने का सनातन संस्था द्वारा हाथ में लिया गया कार्य बहुत ही प्रशंसनीय है ।
विज्ञान के माध्यम से अग्निहोत्र का वातावरणपर क्या परिणाम होता है ?, इसके अध्ययन हेतु महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय की ओर से एक परीक्षण किया गया । इस परीक्षण हेतु यू.टी.एस्. (युनिवर्सल थर्मो स्कैन) उपकरण का उपयोग किया गया ।
बेंगलुरु की प्रयोगशाला में किए गए परीक्षण से यह प्रमाणित हुआ है कि हम हवन और यज्ञ कर स्वयं को रोगों से दूर रख सकते हैं । एक दिन यज्ञ करने से १०० यार्ड क्षेत्र में १ मासतक प्रदूषण नहीं हो सकता ।
सृष्टिरचना के समय साक्षात ईश्वर ने ही आयुर्वेद का निर्माण किया; इसलिए आयुर्वेद के सिद्धांत विश्व के आरंभ से आजतक अबाधित हैं । युगों-युगों से प्रतिवर्ष वही ऋतु आते हैं और आयुर्वेद द्वारा बताई गई ऋतुचर्या भी वही है ।
अधिवक्ता नागेश जोशी ने मांग की है कि, आरोपी नीरज भारती के विरोध में अपराध प्रविष्ट कर उन्हें तत्काल बंदी बनाया जाए तथा गोवा की सुरक्षा की दृष्टि से इस प्रकरण की गहन जांच की जाए ।
ज्ञानयोगी एवं ऋषितुल्य परात्पर गुरु पांडे महाराजजी (आयु ९२ वर्ष) ने रविवार, माघ कृष्ण पक्ष द्वादशी, कलियुग वर्ष ५१२० अर्थात ३ मार्च २०१९ को सायंकाल ५ बजकर २२ मिनटपर यहां के सनातन आश्रम में देहत्याग किया ।
श्री. संतोष आळशी, समिति के कार्यकर्ता श्री. सुहास गरुड एवं श्री. गजानन नागपुरे ने यहां के श्री पंचदशमान जुना अखाडे के अनंत विभूषित श्री श्री १००८ महामंडलेश्वर श्री महेंद्रानंदगिरीजी महाराज से भेंट की ।
पू. अशोक पात्रीकरजी यवतमाळ (महाराष्ट्र) में शासन के ‘जीवन प्राधिकरण’ विभाग में ‘शाखा अभियंता’ के पद पर कार्यरत थे, तब वर्ष १९९७ में उनका संपर्क सनातन संस्था से हुआ ।
सनातन संस्था आज के समय में श्रद्धालुओ को धर्मशिक्षा देने का कार्य कर रही है । सरल भाषा में धर्मशिक्षा देना सनातन संस्था की विशेषता है । वृंदावन के कथावाचक तथा श्रीजीबाबा के शिष्य श्री. रमाकांत गोस्वामी ने ऐसा प्रतिपादित किया ।