आत्मनिवेदन भक्ति
साधना में आत्मनिवेदन का विशेष महत्त्व है; क्योंकि इसी माध्यम से हम अद्वैत की भी अनुभूति कर सकते हैं ।
साधना में आत्मनिवेदन का विशेष महत्त्व है; क्योंकि इसी माध्यम से हम अद्वैत की भी अनुभूति कर सकते हैं ।
प्रत्येक कृती करते समय सद्गुरु (कु.) अनुराधा वाडेकरजी के द्वारा रखा गया भाव सभी को सिखने के लिए योग्य तथा विशेषतापूर्ण है ।
‘स्वयं में भाव उत्पन्न होना ईश्वरप्राप्ति की तडप, अंतकरण में ईश्वर के प्रति बना केंद्र और प्रत्यक्षरूप से साधना, इन घटकोंपर निर्भर होता है । कृती बदलने से विचार बदलते हैं और विचारों को बदलने से कृती बदलती है’, इस तत्त्व के अनुसार मन एवं बुद्धि के स्तरपर निरंतर कृती करते रहने से भाव शीघ्र होने में सहायता मिलती है ।
रामायण का काल अर्थात लाखों वर्ष प्राचीन है । उससे हिन्दू संस्कृति की महानता और प्राचीनता की प्रचीती होती है ।
कार्यशाला के पहले सत्र में ‘युवक-युवतियां : अपेक्षाएं एवं वास्तविकता’ विषयपर सनातन संस्था की श्रीमती क्षिप्रा जुवेकर ने मार्गदर्शन किया ।
कुंभपर्व में सनातन संस्था एवं हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से आयोजित धर्मशिक्षा प्रदर्शनी का अवलोकन करनेवाले जिज्ञासु एवं धर्मप्रेमियों से संपर्क करने हेतु सनातन संस्था एवं हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से हाल ही में संयुक्तरूप से हिन्दू राष्ट्र संपर्क अभियान चलाया गया।
जिस स्तोत्रका पाठ करनेवालोंका श्रीरामद्वारा रक्षण होता है, वह स्तोत्र है श्रीरामरक्षास्तोत्र । जो इस स्तोत्रका पाठ करेगा वह दीर्घायु, सुखी, संततिवान, विजयी तथा विनयसंपन्न होगा’, ऐसी फलश्रुति इस स्तोत्रमें बताई गई है ।
पणजी (गोवा) की संत भक्तराज महाराजजी ने उनकी गोवा की भक्त श्रीमती स्मिता राव को स्वयं उपयोग की गई चरणपादुकाएं (चप्पल) प्रसाद के रूप में प्रदान की थीं । दोपहर ४.३० बजे इन चरणपादुकाओं का रामनाथी आश्रम में शुभागमन हुआ ।
हिन्दू राष्ट्र की स्थापना हो, परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का महामृत्युयोग टले तथा उन्हें स्वास्थ्यपूर्ण दीर्घायु प्राप्त हो, साथ ही साधकों की साधना में उत्पन्न सभी बाधाएं दूर हों; इस संकल्प से आरंभित ५५ यज्ञों का समापन हुआ ।
‘प्रकृति में विद्यमान मूलस्थान के दोषों को दूर करना संस्कृति को विकसित करना है । भारतीय संस्कृति मनुष्य जीवन एवं प्रकृति के दोषों को दूर कर विकसित हुई है ।