आत्मनिवेदन भक्ति

साधनामार्गपर चलते समय हमारे लिए प्राणप्रिय तथा हमारा मित्र भगवान ! मन का द्वंद्व अथवा विचार हम उसके बिना और किसे कहेंगे ? कहते हैं न कि बिल्ली के गले में बंधी हुई घंटी का स्वर यदि ईश्‍वरतक पहुंच सकता है, तो हमारा स्वर उनतक क्यों नहीं पहुंचेगा ? उनके सामने मन खुला करने से हम तो हल्के बन जाते ही हैं । तो इसे कोई ईश्‍वर/भगवान से बोलना, तो कोई ईश्‍वर के सामने मन खुला करना कहते हैं, तो कोई इसे आत्मनिवेदन भी कहते हैं । साधना में आत्मनिवेदन का विशेष महत्त्व है; क्योंकि इसी माध्यम से हम अद्वैत की भी अनुभूति कर सकते हैं ।

सनातन के साधक भी प्रतिदिन भगवान से आत्मनिवेदन करते हैं । हमने भी भगवान के साथ बोलने का प्रयास किया, तो हमें भी ‘भगवान’ का निश्‍चितरूप से अनुभव करना संभव होगा । आत्मनिवेदन किस प्रकार से करें, इसके २ प्रातिनिधिक उदाहरण आगे दे रहे हैं ।

 

श्री. विनायक (दादा) दामले, कुडाळ (जनपद सिंधुदुर्ग, महाराष्ट्र)

श्री. विनायक (दादा) दामले

‘हे भगवान, मुझे मोक्ष आदि कुछ नहीं चाहिए । मुझे केवल गुरुदेवजी के ईश्‍वरीय राज्य की स्थापना का कार्य करना है तथा मुझे उनके विजय की ध्वजा तीनों लोकों में फहरानी है । आप उसके लिए मुझे बल प्रदान करें । मैं घुटने की पीडा के कारण ठीक से १० कदम चल भी नहीं सकता । आपकी सहायता के बिना मैं कुछ नहीं कर सकूंगा । मेरी शारीरिक क्षमता लगभग ९८ से ९९ प्रतिशततक समाप्त हो चुकी है और जो १-२ प्रतिशत बची है, उसे शरीर के रहनेतक प्रारब्धभोगों को भोगकर समाप्त करने हेतु बचाए रखें । आप मुझे बल प्रदान करें ।

आप मुझे गुरुकार्य करने हेतु प्रेरणा और चैतन्य प्रदान करें । आजतक मुझसे हुई साधना केवल गुरुकृपा के कारण ही हुई है । वे ही कर्ता-धर्ता हैं । मैं उनके ऋण में ही रहना चाहता हूं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूं । आजतक मुझ से व्यष्टि साधना हुई; किंतु समष्टि साधना शेष रह गई है । उसके लिए मैं और क्या कर सकता हूं ? इसका आप ही मुझे मार्गदर्शन करें ।’

 

श्रीमती रजनी साळुंके, सनातन आश्रम, गोवा

श्रीमती रजनी साळुंके

हे गुरुदेवजी, मैं कुछ नहीं करता, मुझ से ठीक से साधना नहीं होती और मुझ में कुछ करने की क्षमता नहीं । मैं आपसे कुछ मांगने के लिए पात्र नहीं, अपितु आपने मुझे अनेक संकटों से बचाकर जीवित रखा । ऐसा होते हुए भी मुझसे ‘आप मुझे निरंतर आपके चरणों में रखें और मेरी उंगली न छोडें’, यह प्रार्थना होती है; किंतु आप मेरी उंगली जोर से पकडें, इसके लिए मैं कुछ भी नहीं करती । मैं किसी मील के पत्थर जैसी जहां हूं, वही हूं । हे ईश्‍वर, आप ही ने मेरा पालन किया और मुझे जीवित रखा । मेरी कोई योग्यता न होते हुए भी आपने मेरा हाथ पकडा है और मुझे अपने पास रखा है’, इस विचार से धन्य होकर शरणागत होकर यह प्रार्थना करती हूं, ‘‘हे कृपालु दयाघन, आप ही इस जीव की अनेक जन्मों की निर्धनता को मिटाकर इस जीव का उद्धार करें !’

 

आत्मनिवेदन का महत्त्व !

‘जो हो रहा है, उसे बताते रहें । आत्मनिवेदन महत्त्वपूर्ण है । उससे जो रहा है, वह उचित है अथवा अनुचित है, यह बताना संभव होता है, अन्यथा ‘मुझे सब आता है, मुझे सब ज्ञात है’, ऐसा होता है ।

– परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी

 

हम कोई नहीं है, यही आत्मनिवेदन !

आत्मनिवेदन का अर्थ स्वयं का ईश्‍वर को समर्पित हो जाना । ‘मैं कौन ?’, इसका विचार करने से ‘मैं कुछ भी नहीं हूं’, यह ध्यान में आने से आत्मनिवेदन सरल बन जाता है । ‘मैं कुछ नहीं हूं, ईश्‍वर ही सत्य हैं, देवता और भक्त एक ही हैं’, यही आत्मनिवेदन है । इसे समझ लिए बिना सायुज्य मुक्ति नहीं है । यह अविनाशी मुक्ति है ।’ (श्री दासबोध, दशक ४)

स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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