प्राचीन हिन्दू आरोग्यशास्त्र आयुर्वेदका प्रसार और उसके माध्यमसे हिन्दू संस्कृतिका संवर्धन करना !
आयुर्वेदको पुनर्वैभव प्राप्त करानेके लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी कार्यरत हैं । उनकी प्रेरणासे सनातनने आयुर्वेदसम्बन्धी ग्रन्थमाला प्रकाशित की है ।
आयुर्वेदको पुनर्वैभव प्राप्त करानेके लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी कार्यरत हैं । उनकी प्रेरणासे सनातनने आयुर्वेदसम्बन्धी ग्रन्थमाला प्रकाशित की है ।
हिन्दू राष्ट्र की (सनातन धर्म राज्य की) स्थापना करने हेतु कुछ चुने हुए जीवों को प.पू. डॉक्टरजी अपने साथ लेकर आए हैं । उन्होंने अनेक सार्वजनिक सभाओं में हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने के विचार अनेक जीवों के अंतःकरण में बोए हैं ।
प.पू. डॉक्टरजी द्वारा लिखित गुरुकृपायोगानुसार साधना, इस ग्रंथ में गुरु के विविध प्रकार प्रतिपादित किए हैं । भाव रखकर पढनेका प्रयत्न करने पर ध्यान में आता है कि, ग्रंथ में वर्णित गुरु के सर्व रूप प.पू. डॉक्टरजी में समाहित हैं । आगे दिए अनुसार यह विषय शब्दबद्ध करने का प्रयत्न इस लेख में किया है ।
मराठी और हिन्दी भाषाआेंमें घुसे हुए अंग्रेजी, उर्दू, फारसी आदि विदेशी भाषाके शब्दोंका प्रयोग न कर, स्वभाषाके संस्कृतनिष्ठ पर्यायी शब्दोंका उपयोग किया जाए, इसके लिए परात्पर गुरु डॉक्टरजीने वीर सावरकरके पश्चात खण्डित हुआ भाषाशुद्धि अभियान पुनः आरम्भ किया ।
परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी वर्ष १९८२ से सूक्ष्म ज्ञानसम्बन्धी अध्ययन कर रहे हैं । उन्हें १५.७.१९८२ से, अर्थात साधना आरम्भ करनेके पहलेसे ही सूक्ष्मज्ञान अवगत होने लगा ।
अनेक प्रकारकी आध्यात्मिक महत्त्वकी वस्तुआेंका संरक्षण कर, परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी आध्यात्मिक विश्वके इतिहासमें एक नया अध्याय ही लिख रहे हैं ।
परात्पर गुरु डॉक्टरजीके मार्गदर्शनमें सनातनके साधक-कलाकार अपनी-अपनी कलाके सात्त्विक प्रस्तुतीकरणके सन्दर्भमें सूक्ष्म-स्तरीय अध्ययन और शोध कर रहे हैं ।
देवताकी सात्त्विक नामजप-पट्टीसे उस देवताकी शक्ति प्रक्षेपित होती है । इस शक्तिसे आध्यात्मिक उपचार होते हैं ।
समाज को धर्मशिक्षा मिले, समाज साधना करे, समाज में धर्म और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के विषय में जागृति हो आदि उद्देश्य सामने रखकर परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने वर्ष २००६ से वार्षिक सनातन पंचांग प्रकाशित करना आरम्भ किया । वर्ष २००६ से संस्कार-बही का उत्पादन आरम्भ हुआ है ।
परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी के मार्गदर्शन में साधना, अध्यात्म-सम्बन्धी शंकासमाधान, देवताआें के नामजप की उचित पद्धति और उपासनाशास्त्र (३ भाग), आरती, क्षात्रगीत आदि विषयोंपर श्रव्य-चक्रिकाआें का निर्माण किया गया है ।
