‘रज-तम प्रधान स्थान पर जानेपर कष्ट न हो’, इस हेतु साधक आगे दिए आध्यात्मिक स्तर पर उपाय करें !

कुछ साधकों को स्मशान अथवा अन्य रज-तम प्रधान स्थानों पर व्यक्तिगत कारणों के लिए अथवा समष्टि सेवा के लिए जाना पडता है ।उन्हें विविध प्रकार के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा आध्यात्मिक स्वरूप के कष्ट होने से वे साधना भी ठीक से नहीं कर पाते ।

आनेवाले आपातकाल में तर जाने के लिए पूर्वतैयारी के विषय में बतानेवाले एकमेवाद्वितीय परात्पर गुरु डॉ. आठवले !

‘वर्तमान में देश एवं धर्म के दृष्टिकोण से आपातकाल चल रहा है । प्राकृतिक आपत्तियां सतत आना, देशद्रोही एवं धर्मद्रोही की प्रबलता बढना, राजकीय अस्थिरता निर्माण करनेवाली घटनाएं होना, समाज, राष्ट्र एवं धर्म के हित के शुभ कार्य में विघ्न आना इत्यादि आपातकाल के भौतिक लक्षण हैं । ऐसे काल में सामान्य नागरिकों का दैनंदिन जीवन संघर्षशील होता है !

नामजप, देवी-देवता आदि के संबंध में कुछ टिप्पणी एवं उनका खंडन

अभ्यास एवं स्वानुभव न होते हुए भी पु.ल. देशपांडे ने किए नामजप के विषय के (नामस्मरण संबंधी) बेताल वक्तव्य ! मनोभाव से नामजप करने पर आचार में दोष नहीं रहता, यह सूर्यप्रकाश समान स्पष्ट है !

घर की फर्श पर पडे दागों की स्वच्छता कैसे करेंगे ?

‘फर्श पर तैलीय पदार्थ गिरा हो, तो सर्वप्रथम सूखे कपडे से उसे पोछ लें । इससे फर्श पर पडा हुआ तेल अथवा घी अन्यत्र फैलेगा नहीं । तदुपरांत छोटे से बर्तन में पानी लेकर उसमें ‘डिटर्जंट पाउडर’ मिलाएं । इस पानी को उबालें । तदुपरांत उसमें कपडा भिगोने डालें । फिर इस पानी को उबालें । तदुपरांत उसमें कपडा भिगोकर-भिगोकर उससे फर्श पोछें ।

आटा, धान्य एवं मसाले खराब न होने हेतु रखी जानेवाली सावधानी

रसोईघर में रखा हुआ आटा, अनाज एवं मसालों के भी खराब होने की संभावना होती है । कुछ समय उपरांत रखा हुआ आटा, अनाज एवं मसालों के भी खराब होने की संभावना होती है । कई बार आटे में पडनेवाले कीडे हमारे लिए कष्टदायी हो सकते हैं । इसलिए वर्षा में आनेवाले कीडे हमारे लिए कष्टदायक भी हो सकते हैं । इसलिए वर्षा में आटा एवं दालों को कीडों से बचाने के लिए कुछ सरल युक्तियां यहां दे रहे हैं ।

आयुर्वेद : रोगों का मूल एवं उस पर दैवीय चिकित्सा

कोई भी रोग, यह शरीर के वात, पित्त एवं कफ की मात्रा में परिवर्तन होने से होता है । आयुर्वेद के अनुसार कर्करोग से हृदयरोग तक एवं पक्षाघात से लेकर मधुमेह तक सर्व रोगों का मूल यही है । शरीर के त्रिदोषों में से किसी भी दोष की मात्रा बढने अथवा अल्प होने अथवा उनके गुणों में परिवर्तन होने से वे दूषित हो जाते हैं । फिर यही कण शरीर में रोग उत्पन्न करते हैं ।

आम्लपित्त : आजकल की बडी समस्या एवं उस पर उपाय !

आम्लपित्त के कष्ट के पीछे के कारणों का तज्ञों की सहायता से शोध लेकर उनपर कायमस्वरूपी उपचार करना अत्यावश्यक है । इसके लिए जीवनशैली में परिवर्तन करने की तैयारी होनी चाहिए ।

साधकों पर आनेवाला अनिष्ट शक्तियों का आवरण निकालने की एक लाभदायक पद्धति !

आवरण निकालते समय बिना प्रदीप्त सनातन की सात्त्विक उदबत्ती का उपयोग करें । उसे अपने जिस चक्र का आवरण निकालना है, उससे घडी के कांटे की दिशा से तथा घडी के कांटे की विपरीत दिशा से इस प्रकार दोनों ओर से तीन बार घुमाएं ।

खाद्यपदार्थाें के संदर्भ में विवेक जागृत रखें !

पोषणमूल्यहीन, चिपचिपे, तेल से भरे तथा ‘प्रिजर्वेटिव पदार्थाें का उपयोग किए गए तथा स्वास्थ बिगाडनेवाले पदार्थ खाने की अपेक्षा पौष्टिक, सात्त्विक तथा प्राकृतिक पदार्थ खाने चाहिए । चॉकलेट आदि पदार्थ कभी कभी खाना ठीक है; किंतु नियमित सेवन न करें ।’

पितृपक्ष में महालय श्राद्ध कर पितरों का आशीर्वाद प्राप्‍त करें !

पितृपक्ष में पितृलोक पृथ्‍वीलोक के सर्वाधिक निकट आने से इस काल में पूर्वजों को समर्पित अन्‍न, जल और पिंडदान उन तक शीघ्र पहुंचता है । उससे वे संतुष्‍ट होकर परिवार को आशीर्वाद देते हैं । श्राद्धविधि करने से पितृदोष के कारण साधना में आनेवाली बाधाएं दूर होकर साधना में सहायता मिलती है ।