हिन्दू जनजागृति समिति एवं सनातन संस्थाद्वारा आदर्श गणेशोत्सव जनजागृति अभियान !

गणेशोत्सव के उपलक्ष्य में हिन्दू जनजागृति समिति एवं सनातन संस्था के संयुक्त तत्वावधान में आदर्श गणेशोत्सव प्रबोधन अभियान चलाया गया। इस अभियान को पुणे के अनेक गणेशोत्सव मंडल एवं समाज के नागरिकोंद्वारा उत्तम प्रतिसाद मिला।

मंदिरों के धन का उपयोग धर्मकार्य हेतु ही हो ! – श्री. सतीश कोचरेकर, सनातन संस्था

महाराष्ट्र राज्य के चिकित्सा शिक्षा मंत्री गिरीश महाजन ने कुछ ही दिन पहले मुख्यमंत्री से मांग की थी कि सरकार श्री साई संस्थानसहित राज्य के दूसरे देवस्थानों का ५० प्रतिशत धन स्वास्थ्य सुविधाएं जुटाने के लिए दे । उनकी इस मांग का अनेक लोग विरोध कर रहे हैं ।

स्वतंत्रतादिवस पर सनातन संस्था एवं हिन्दू जनजागृति समिति का राष्ट्रध्वज का सम्मान करें अभियान !

यहां १ से १५ अगस्त की कालावधि में राष्ट्रध्वज का आदर करें यह अभियान चलाया गया । इसे पुलिस, प्रशासन, समाचारपत्र और राष्ट्रप्रेमियों से सकारात्मक प्रतिसाद मिला । आगरा के जिलाधिकारी कार्यालय ने प्लास्टिक के राष्ट्रध्वज बेचना प्रतिबंधित करनेवाला आदेश जारी किया है ।

सनातन के धर्मकार्य का रजत महोत्सव !

मानवजाति के कल्याण हेतु सनातन संस्था के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवले द्वारा प्रारंभ किए गए धर्मकार्य का यह रजत जयंती वर्ष है । गत २५ वर्षों में सनातन की यह ऊंची उडान आश्‍चर्यजनक है ।

भगवान श्रीकृष्ण की विशेषताएं एवं कार्य

श्रीकृष्ण द्वारा बताया हुआ तत्त्वज्ञान गीता में दिया है । उन्होंने अपने तत्त्वज्ञान में प्रवृत्ति (सांसारिक विषयों के प्रति आसक्ति) एवं निवृत्ति (सांसारिक विषयों के प्रति विरक्ति) के बीच योग्य संयोजन दर्शाया है ।

गुरुकृपा होने के लिए गुरु पर पूर्ण श्रद्धा होना आवश्यक !

यदि किसी में लगन हो, तो उसे गुरु की कृपा अपनेआप मिलती है । गुरु को उसके लिए कुछ करना नहीं पडता । केवल संपूर्ण श्रद्धा होना आवश्यक है । गुरु ही उसे उसके लिए पात्र बनाते हैं ।

गुरुके कौन-कौनसे प्रकार हैं ?

८.१०.१९९५ के दिन इंदौरमें मैंने (डॉ. जयंत आठवलेने) बाबासे (प.पू. भक्तराज महाराजजीसे) कहा, ‘‘जब आप बीमार होते हैं, तो आपके पास रहकर आपकी सेवा करनेके विचारकी अपेक्षा ग्रन्थ लिखनेके विचार अधिक आते हैं । सगुण देहकी सेवा मनसे नहीं होती ।’’ इसपर बाबा बोले, ‘‘तुम्हें लगता है कि ग्रन्थ लिखना चाहिए, वही ठीक है । वह ईश्‍वरीय कार्य है ।

शिष्य के जीवन में गुरुका अनन्यसाधारण महत्त्व !

गुरु का महत्त्व ज्ञात होने पर नर से नारायण बनने में अधिक समय नहीं लगता; क्योंकि गुरु देवता का प्रत्यक्ष सगुण रूप ही होते हैं, इसलिए जिसे गुरु स्वीकारते हैं उसे भगवान भी स्वीकारते हैं एवं उस जीव का अपनेआप ही कल्याण होता है ।