साधिका के मन की भाव स्थिती
गोपियों के हाथ से कृष्ण मक्खन खाते हैं; उन्हें प्रत्यक्ष भगवान के साथ रहने के लिए मिलता है’,ऐसा प्रतीत होकर, स्वयं भी साधना करने का विचार मन में आना एवं श्रीकृष्ण की कृपा से प्रत्यक्ष उनका संसार करना
गोपियों के हाथ से कृष्ण मक्खन खाते हैं; उन्हें प्रत्यक्ष भगवान के साथ रहने के लिए मिलता है’,ऐसा प्रतीत होकर, स्वयं भी साधना करने का विचार मन में आना एवं श्रीकृष्ण की कृपा से प्रत्यक्ष उनका संसार करना
श्रीलंका के हिन्दू अधिकांश उत्तरी श्रीलंका में रहते हैं । इनमें से अधिकांश हिन्दू तमिल भाषी हैं । उत्तरी श्रीलंका का हिन्दू संस्कृति से संबंधित महत्त्वपूर्ण नगर है जाफना ! इस नगर से ३० कि.मी. दूरीपर कीरीमैला नामक एक छोटा गांव है । यह गाव समुद्र क तटपर बंसा है ।
रावणासुर के संहार के पश्चात श्रीराम पुष्पक विमान से अयोध्या लौट रहे थे, तब उनके विमान के पीछे एक काला बादल आ रहा है, ऐसा उनके ध्यान में आता है । तब शिवजी प्रकट होकर श्रीराम से कहते हैं, यह काला बादल आपको ब्रह्महत्या के कारण लगे पाप का प्रतीक है ।
अतः आगामी भीषण आपातकाल में अल्प मूल्य की बहुगुणी विविध औषधीय वनस्पतियां सहजता से उपलब्ध हों, इसके लिए उन्हें अभी से घर के आसपास अथवा खेत में रोपना आवश्यक है
बौद्ध पंथ एक उपासनापद्धति है तथा वह विशाल हिन्दू धर्म का ही एक अंग है, ऐसा भारतियों का दृष्टिकोण है; परंतु श्रीलंका में बौद्ध पंथ के लोग बहुसंख्यक होने के पश्चात जिहादियों की भांति हिन्दू धर्मपर ही आक्रमण कर रहे हैं ।
अनेक औषधीय वनस्पतियों का साग अच्छा बनता है । कुछ औषधीय पौधों में फल भी लगते हैं । कुछ कंदवर्गीय वनस्पतियों के कन्द पेट भरने के लिए भी खाए जा सकते हैं ।
परीक्षण के समय यज्ञकुंड का तापमान १४६.५ अंश सेल्सियस था । उस समय यज्ञकुंड में समर्पित प.पू. रामभाऊस्वामीजी के शरीरपर ओढी हुई शॉल का तापमान ३९.५ अंश सेल्यियस था |
अधिकांश तमिल भाषियों की कुलदेवता कार्तिकेय स्वामी हैं । तमिलनाडू में कार्तिकेय स्वामी के ६ स्थान विख्यात हैं । उसके पश्चात भारत के बाहर का कार्तिकेय स्वामी का सबसे विख्यात तथा जागृत मंदिर है श्रीलंका के कदरगामा में ! ‘कदरगामा’ एक बौद्ध नाम है ।
जो लोग सदनिकाआें (फ्लैट्स) अथवा किराए के घरों में रहते हैं वे निम्नांकित १० वनस्पतियां गमलों में अथवा प्लास्टिक की थैलियों में रोपकर, घर के बरामदे में रख सकते हैं ।
जुनागड कृषि विद्यापीठ के संशोधकों ने यह दावा किया है कि, गोमूत्र के कारण मुंह, यकृत, मूत्रपिंड, त्वचा तथा स्तन का कर्करोग ठीक हो सकता है । कृषि विद्यापीठ की श्रद्धा भट, रुकमसिंग तोमर तथा कविता जोशी ने पूरे वर्ष संशोधन कर यह निष्कर्ष निकाला है ।