घर के बरामदे (बालकनी) में भी लगाए जाने योग्य कुछ चयनित औषधीय वनस्पतियां और उनका व्यापक उपयोग

१. प्रत्येक व्यक्ति घर के बरामदे (बालकनी) में भी लगा सके,
एेसी कुछ चयनित औषधीय वनस्पतियां और उनका व्यापक उपयोग

नगरों में अधिकांश लोग सदनिकाआें(फ्लैट्स) अथवा किराए के घरों में रहते हैं । इसलिए वे औषधीय वनस्पतियां नहीं लगा पाते । ऐसे लोग निम्नांकित १० वनस्पतियां गमलों में अथवा प्लास्टिक की थैलियों में रोपकर, घर के बरामदे में रख सकते हैं । इनमें से- गिलोय, जूही, खानेवाला पान, और हडजोड की लताआेंको फैलने के लिए आधार की आवश्यकता होती है । इसलिए इन्हें गमलों में रोपकर बरामदे में रख दें । ये १० वनस्पतियां अधिकांश विकारों में लाभदायक होती हैं । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को इन्हें अपने घर के आसपास रोपना चाहिए । जिनके पास भूमि है, वे इन वनस्पतियों को घर के बाहर लगाएं । इन लताआेंको परिसर के बडे वृक्षों के (यथासम्भव नीम के) तने पर अथवा बाड पर चढा दें ।

१ अ. तुलसी

लैटिन नाम : Ocimum tenuiflorum

१ अ १. औषधि के लिए उपयोगी अंग : पंचांग (टिप्प्णी)

टिप्प्णी – पंच अर्थात पांच और अंग अर्थात अवयव । इसप्रकार वनस्पति की जड, तना, पत्ते, फूल और फल, इन पांच अवयवों को एकत्रितरूप से पंचांग कहते हैं । छोटी औषधीय वनस्पतियों के विषय में पंचांग का अर्थ है, जडसहित संपूर्ण वनस्पति ।

१ अ २ . रोपण के लिए उपयोगी अंग : बीज अथवा तने के टुकडे

१ अ ३. विविध विकारों में उपयोग 

१. सर्दी : तुलसी के पत्ते छाया में सुखाकर उसका कपडछान चूर्ण बनाएं । इसका चुटकीभर चूर्ण सूंघनी की भांति सूंघें । सर्दी तुरंत घटने में सहायता होती है ।

२. व्रण (घाव) अथवा रक्तस्राव : तुलसी के पत्तों का रस लगाएं ।

३. कान में वेदना होना (कर्णशूल) : तुलसी और भृंगराज के पत्ते एक साथ पीसकर उनकी २- २ बूंद कान में डालें अथवा केवल तुलसी के पत्तों का २ बूंद रस कान में डालें ।

४. दमा : प्रतिदिन प्रातः खाली पेट तुलसी के ४ पत्ते चबाकर खाएं ।

५. भूख न लगना : भोजन से आधा घंटा पहले तुलसी के ४ पत्ते और मिश्री एक साथ चबाकर खाएं ।

१ आ. दूर्वा

लैटिन नाम : Cynodon dactylon

१ आ १. औषधि के लिए उपयोगी अंग : पंचांग

१ आ २. रोपण के लिए उपयोगी अंग : जडसमेत पौधे का टुकडा

१ आ ३. विविध विकारों में उपयोग :

१. शिरोवेदना : दूर्वा के रस में कपूर का चूर्ण मिलाकर माथे पर लेप लगाएं ।

२. नकसीर फूटना (उष्णता के कारण नाक से रक्त बहना) : दूर्वा का २- २ बूंद रस नाक के पटल पर दोनों ओर से डालें ।

३. बुरे सपने आना : रात्रि में सोते समय १ कटोरी दूर्वा का रस पीएं ।

१ इ. गेंदा

१ इ १. लैटिन नाम : Tagetes erecta

१ इ १. औषधिके लिए उपयोगी अंग : पत्ते और फूल

१ इ २. रोपणके लिए उपयोगी अंग : बीज (सूखे फूल की पंखुडियां)

१ इ ३. विविध विकारोंमें उपयोग 

१. व्रण (जखम) : जो घाव शीघ्र न भरता हो, उस पर गेंदे के पत्तों का रस लगाएं अथवा दूर्वा के तेल की ही भांति गेंदे के पत्तों का तेल बनाएं और उसमें कपास भिगोकर घाव पर रखें और पट्टी बांध दें ।

२. पित्ती (त्वचापर लाल चकत्ते उभरना) : गेंदे के फूल और पत्तों का रस शरीर पर मलें ।

१ ई. कालमेघ

लैटिन नाम : Andrographis paniculata

१ ई १. औषधिके लिए उपयोगी अंग : पंचांग

१ ई २. रोपणके लिए उपयोगी अंग : बीज

१ ई ३. विविध विकारोंमें उपयोग 

१.ज्वर

प्रत्येक प्रकार के ज्वर में, मुट्टीभर कालमेघ और चौथाई चम्मच सोंठ का चूर्ण २ प्याले पानी में मिलाएं । इसे इतना उबालें कि एक प्याला काढा बन जाए । इसका आधा-आधा प्याला दिन में दो बार पीएं ।

२. अम्लपित्त

सूखे कालमेघ का चूर्ण बनाकर रखें । गले अथवा छाती की जलन में आधा चम्मच कालमेघ का चूर्ण आधा चम्मच चीनी मिलाकर चूसें ।

१ उ. ऐरावती (जख्मे हयात)

लैटिन नाम : Bryophyllum pinnatum

१ उ १. औषधि के लिए उपयोगी अंग : पत्ता

१ उ २. रोपण के लिए उपयोगी अंग : पत्ता अथवा तने का टुकडा

१ उ ३. विविध विकारों में उपयोग 

१. पथरी : दिन में दो बार ऐरावती के पत्तों का एक चौथाई प्याला रस पीएं ।

२. दाह (जलन होना) : ऐरावती के पत्ते कूटकर शरीर के जलनवाले स्थान पर बांधें ।

१ ऊ. घृतकुमारी (ग्वारपाठा)

लैटिन नाम : Aloe vera

१ ऊ १. औषधि के लिए उपयोगी अंग : पत्ते का गूदा

१ ऊ २. रोपण के लिए उपयोगी अंग : जड के निकट उगनेवाले सकर्स

१ ऊ ३. विविध विकारों में उपयोग :

१. दमा (अस्थमा) : सांस लेने में कष्ट हो रहा हो, तब २- २ घंटे के अंतराल में एक चम्मच घृतकुमारी के रस में, आधा चम्मच मधु और आधा चम्मच घी मिलाकर पीएं । इससे शौच ठीक से होता है और सांस नहीं फूलती ।

२. अम्लपित्त : २ चम्मच रस में स्वादानुसार मिश्री मिलाकर पीएं ।

३. जलना : घृतकुमारी के गूदे में हलदी का चूर्ण मिलाकर शरीर के जले हुए स्थान पर लगाएं । इससे वहां विषाणुआेंका प्रवेश नहीं होगा और यदि थोडा जला हो, तो जलने का चिन्ह भी मिट जाएगा ।

१ ए. गिलोय

लैटिन नाम : Tinospora cordifolia

१ ए १. औषधि के लिए उपयोगी अंग : कांड (लता का टुकडा)

१ ए २. रोपण के लिए उपयोगी अंग : तने का टुकडा

१ ए ३. विविध विकारों में उपयोग 

१. ज्वर

किसी भी प्रकार के ज्वर में गिलोय का उंगली बराबर लंबा टुकडा लेकर कूट लें और उसका काढा बनाकर पीएं ।

२. पीलिया

गिलोय के आधी कटोरी रस में आधा चम्मच पीसी हुई मिश्री मिलाकर प्रतिदिन प्रातः खाली पेट एक सप्ताह पीएं ।

१ ऐ. जाही

लैटिन नाम : Jasminum officinale

१ ऐ १. औषधि के लिए उपयोगी अंग : पत्ते

१ ऐ २. रोपण के लिए उपयोगी अंग : तने के टुकडे

१ ऐ ३. विविध विकारों में उपयोग 

१. मुख में छाले होना : जाही के पत्ते ऊपर-ऊपर से चबाकर थूक दें ।

२. व्रण (घाव) : किसी भी प्रकार के घाव पर जाही के पत्ते पीसकर घाव का स्थान भर जाए, इस प्रकार लगाएं अथवा दूर्वा के तेल की ही भांति जाही के पत्तों का तेल बनाकर उस तेल में कपास भिगोकर घाव पर रखें और पट्टी बांधें । घाव तत्काल भर जाता है ।

१ ओ. पान के पत्तों की बेल

लैटिन नाम : Piper betle

१ ओ १. औषधि के लिए उपयोगी अंग : पत्ते

१ ओ २. रोपण के लिए उपयोगी अंग : तने के टुकडे

१ ओ ३. विविध विकारों में उपयोग 

१. गले में कफ जमा होना : बीडा खाएं ।

२. भूख न लगना, पीनस (सर्दी), कोलेस्ट्रॉल बढना, कैल्शियम की न्यूनता होना : प्रतिदिन बीडा खाएं ।

१ औ. हडजोड

लैटिन नाम : Cissus quadrangularis

१ औ १. औषधि के लिए उपयोगी अंग : कांड (लता का टुकडा)

१ औ २. रोपण के लिए उपयोगी अंग : तने का टुकडा

१ औ ३. विविध विकारों में उपयोग 

१. अस्थिभंग (फ्रैक्चर)

हड्डी टूट गई हो, तो उसे अच्छे से बिठाने के उपरांत २१ दिन, दिन में दो बार, आधा कटोरी हडजोड के कांड का रस लें । इसके लिए हडजोड की बेल कूटकर उसे पकाएं और पीसकर उसका रस निकालें । पका हुआ चोथा टूटी हुई हड्डी पर बाहर से बांधें । (हाथ पर प्लास्टर लगा हो, तो केवल रस पीएं ।)

उपरोक्त १० वनस्पतियों के १०० से अधिक विकारों में विस्तृत उपयोग जानने हेतु पढेें सनातन प्रकाशित ग्रंथ : स्थान की उपलब्धताके अनुसार औषधीय वनस्पतियोंका रोपण !

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘स्थानकी उपलब्धताके अनुसार औषधीय वनस्पतियोंका रोपण’