विकारों के अनुसार विविध नामजप
भावी संकटकाल में कभी-कभी आैषधि वनस्पतियां नहीं मिल सकेंगी; परंतु नामजप के उपचार कहीं भी आैर कभी भी किए जा सकते हैं ।
भावी संकटकाल में कभी-कभी आैषधि वनस्पतियां नहीं मिल सकेंगी; परंतु नामजप के उपचार कहीं भी आैर कभी भी किए जा सकते हैं ।
नामजप में योगयागादि साधना समान कठिनता भी नहीं है । भावी संकटकाल में कभी-कभी आैषधि वनस्पतियां नहीं मिल सकेंगी; परंतु नामजप के उपचार कहीं भी आैर कभी भी किए जा सकते हैं ।
‘विकार-निमर्लून हेतु नामजप’ (३ खडं ) इस नतून ग्रथं का परिचय इस लेखांक द्वारा करवा रहे हैं । नामजप की यह पद्धति केवल संकटकाल की दृष्टि से ही नहीं, अपितु सदा के लिए भी उपयुक्त है ।
देवताआें का अनादर, संतों के विरुद्ध झूठे आरोप लगाकर उन्हें कारागृह में डाल देना, बलपूर्वक धर्मांतरण ऐसी घटनाआें को रोकने के लिए हिन्दुआें का संगठन तथा धर्मशिक्षा की आवश्यकता है ।
‘श्री भृगु महर्षिजी की आज्ञा से परात्पर गुुरु डॉ. आठवलेजी को स्वास्थ्यपूर्ण दीर्घायु प्राप्त हो, हिन्दू राष्ट्र की स्थापना में उत्पन्न अनिष्ट शक्तियों की बाधाएं दूर हों, साथ ही साधकों के कष्ट दूर हों, इसके लिए यहां के सनातन आश्रम में ७ नवंबर को शूलिनी पराक्रम यंत्र की स्थापना और पूजन कर उसके पश्चात हवन किया गया ।
पंचतत्त्वों का असंतुलन दूर करने के लिए नामजप के समान ही मुद्रा भी उपयुक्त है । मुद्राआें का ही न्यास किया जाता है । नामजप के साथ मुद्रा तथा न्यास करने पर उपचारों का लाभ अधिक होता है ।
लोहडी का त्यौहार पंजाबियों तथा हरियाणवी लोगों का प्रमुख त्यौहार माना जाता है । यह लोहडी का त्यौहार पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू काश्मीर और हिमाचल में धूम धाम तथा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं । यह त्यौहार पौष मास की अंतिम रात्रि और मकर संक्राति की पूर्वसंध्या को हर वर्ष मनाया जाता हैं ।
जो कुछ कियो सो तुम कियो, मैं कुछ कियो नाहीं । कहीं कहो जो मैं कियो, तुम ही थे मुझ माहीं ।। अहं के पूर्णतः अंत होनेपर ऐसा अनुभव होता है
‘कोची इंटरनैशनल बुक फेयर’ में सनातन संस्था द्वारा प्रकाशित धर्म, अध्यात्म, आयुर्वेद, बालसंस्कार, स्वभावदोष एवं अहं निर्मूलन आदि विषयोंपर आधारित ग्रंथो की प्रदर्शनी लगाई गई ।
जिस ईश्वर के कारण हम श्वास ले पाते हैं, उनके प्रति केवल शाब्दिक कृतज्ञता व्यक्त करने से पूर्ण लाभ नहीं होता । ईश्वर के प्रति कृतज्ञता हमारे आचरण में दिखाई देनी चाहिए । ईश्वर का नाम सदैव मुख में रहे, ईश्वर के बच्चों का अर्थात समस्त जनों का उद्धार हो, अर्थात ईश्वरप्राप्ति हेतु उन्हें अध्यात्मज्ञान अविरत देने से यह ईश्वर के प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी ।