विकार-निर्मूलन हेतु नामजप

वर्तमान में पूरे विश्व में प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं आैर आगामी काल में उनकी मात्रा आैर बढेगी । संत-महात्मा, ज्योतिषी आदि के मतानुसार संकटकाल प्रारंभ हो चुका है । इस भीषण संकटकाल में समाज को अनेक आपदाआें का सामना करना पडेगा । संकटकाल में अपनी, अपने परिजनों आैर देशबंधुआें की रक्षा करना, यह एक बडी चुनौती होती है । संकटकाल में यातायात के साधनों के अभाववश रोगी को चिकित्सालय पहुंचाना, डॉक्टर अथवा वैद्य से संपर्क करना और हाट से (बाजार से) औषधियां प्राप्त करना कठिन होता है । संकटकाल का सामना करने की तैयारी के एक खंड के रूप में ‘आगामी संकटकाल के लिए संजीवनी की भांति कार्य करनेवाली ग्रंथमाला’ प्रकाशित कर रहे हैं । ३१.८.२०१७ तक इस ग्रंथमाला में अंतर्भूत १७ ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं । इस ग्रथंमाला के  ‘विकार-निमर्लून हेतु नामजप’ (३ खडं ) इस नतून ग्रथं का परिचय इस लेखांक द्वारा करवा रहे हैं । नामजप की यह पद्धति केवल संकटकाल की दृष्टि से ही नहीं, अपितु सदा के लिए भी उपयुक्त है ।

मनुष्य के अधिकतर शारीरिक आैर मानसिक विकारों का मूल कारण आध्यात्मिक रहता है । यह कारण नष्ट करने के लिए आध्यात्मिक स्तर पर उपचार करना पडता है । ‘नामजप’ एक उत्तम आध्यात्मिक उपचार है । प्रत्येक देवता के विशिष्ट कंपन होते हैं । संबंधित देवता के नाम का जप करने से शरीर में विशिष्ट कंपन उत्पन्न होते हैं । इन कंपनों से विकार द्वारा शरीर में उत्पन्न अप्राकृतिक अथवा प्रमाणबाह्य कंपन सुधारने में सहायता होती है, अर्थात विकार- निर्मूलन में सहायता होती है । नामजप करने से केवल विकार ही ठीक नहीं होते, अपितु विकारों से होनेवाली वेदना आैर दुःख सहने हेतु मनोबल आैर शक्ति भी मिलती है । ‘नामजप’ सभी के लिए सुलभ उपचार-पद्धति है । नामजप को देशकाल, शौच-अशौच, मंत्रजप की भांति उचित उच्चारण आदि बंधन नहीं हैं । नामजप में योगयागादि साधना समान कठिनता भी नहीं है । भावी संकटकाल में कभी-कभी आैषधि वनस्पतियां नहीं मिल सकेंगी; परंतु नामजप के उपचार कहीं भी आैर कभी भी किए जा सकते हैं ।

‘विकार-निर्मूलन हेतु नामजप (खंड १)’ इस ग्रंथ में नामजप के विविध प्रकार (उदा. देवता की गुणविशेषताआें के अनुसार नामजप, देह के त्रिदोषों के अनुसार नामजप, इंद्रियों को होनेवाले विकार दूर करने के लिए संबंधित इंद्रियों के देवताआें के नामजप, ज्योतिषशास्त्रानुसार नामजप) आैर उनका शास्त्राधार बताया है । शास्त्र ज्ञात होने के कारण नामजप के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होने में सहायता मिलती है । इन विविध प्रकारों से प्रत्येक विकार के लिए उपयुक्त विविध नामजप प्राप्त होते हैं ।

ग्रंथ के दूसरे खंड में कुछ देवताआें के नामजप (विशेषकर अपनी उपास्यदेवता का नामजप) कौन से विकारों में उपयुक्त है, इसकी जानकारी एक ही दृष्टिक्षेप में मिल सके इसलिए ये नामजप सूची के स्वरूप में दिए हैं । विकार-निर्मूलन के लिए नामजप के साथ-साथ हाथ की मुद्रा आैर न्यास करने से अधिक लाभ होता है, यह बात भी ग्रंथ में बताई गई है । इसके अतिरिक्त, नामजप कितना करना चाहिए, भावसहित कैसे करना चाहिए आदि बातें भी ग्रंथ में बताई गई हैं ।

ग्रंथ के तीसरे खंड में ३०० से अधिक शारीरिक आैर मानसिक रोगों पर लाभकारी नामजप बताए गए हैं । इनमें स्त्रियों के रोग, बालकों के रोग आदि के विषय में अलग से विचार किया गया है । ग्रंथ में मुख्यरूप से देवताआें के नामजप दिए हैं, उसी प्रकार अगले चरण के शब्दब्रह्म (गायत्री मंत्र के शब्दों के नामजप), अक्षरब्रह्म (देवता का तत्त्व / शक्तियुक्त अक्षरों के नामजप), बीजमंत्र आैर अंकजप भी दिए हैं ।

किसी रोग को दूर करने के लिए बताए गए जपों में से अपने लिए अधिक उचित जप कैसे चुनें, इस बात का भी मार्गदर्शन किया गया है । ‘नामजप के उपचार कर अधिकाधिक रोगी शीघ्रातिशीघ्र विकारमुक्त हों’, एेसी श्री गुरुचरणों में आैर विश्व के पालनकर्ता श्री नारायण के चरणों में प्रार्थना !

संदर्भ : सनातन का ग्रंथ ‘विकार-निर्मूलन हेतु नामजप (भाग ३)

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