सनातन संस्था के ४०वें संत पू. गुरुनाथ दाभोलकरजी (आयु ७९ वर्ष) की साधनायात्रा !
जब से मुझे साधना समझ में आई, तब से मैं आने-जानेवाले लोगों को नामजप करने के लिए बताने लगा ।
जब से मुझे साधना समझ में आई, तब से मैं आने-जानेवाले लोगों को नामजप करने के लिए बताने लगा ।
‘कला ईश्वर की देन है । कला के माध्यम से साधना कर ईश्वरप्राप्ति की जा सकती है ।
महर्षि अध्यात्म विश्वविद्यालय’ द्वारा ‘यूनिवर्सल ऑरा स्कैनर (यूएएस)’ उपकरण के माध्यम से किया गया देवता का यंत्र, देवताआें के सात्त्विक चित्र और सात्त्विक रंगोली का वैज्ञानिक परीक्षण
दादी को जब से गुरुकृपायोग के अनुसार साधना समझ में आई, तब से अर्थात पिछले १५ वर्षों से वह प्रातःकाल उठकर मानसपूजा, नामजप, दैनिक ‘सनातन प्रभात’ का वाचन, सारणी लेखन आदि व्यष्टि साधना के प्रयास नियमितरूप से करती है ।
रंगोलीकी सात्त्विकता बढनेपर देवतातत्त्व अधिक मात्रामें आकर्षित होनेमें सहायता मिलती है ।
सनातन हिंदू धर्म में अनेक त्यौहार हैं । उस दिन वातावरण में त्यौहार से संबंधित विशिष्ट देवता का तत्त्व प्रचुर मात्रा में कार्यरत रहता है । इस तत्त्व का लाभ अधिक से अधिक होने हेतु प्रयास किए जाते हैं ।
‘गायन का सुर अपने अंतरंग के आनंदमय कोष से आना चाहिए । सूर इस प्रकार से नहीं मिला, तो श्रीकृष्ण के आने का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है ।
समाज में ऐसे कई कलाकार होते हैं, जो जानते तो थोडा ही ; किन्तु अपनी बात से अपनी बढाई अधिक करते हैं । इस से ‘कलाकारों ने परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने बताई स्वभावदोष और अहं के निर्मूलन की प्रक्रिया का अवलंबन करना कितना महत्त्व का हैं’, यह ध्यान में आता हैं ।
भगवान दत्तात्रेय की पूजा से पूर्व तथा दत्त जयंती के दिन घर पर अथवा देवालय में दत्तात्रेय-तत्त्व आकर्षित और प्रक्षेपित करने वाली सात्त्विक रंगोलियां बनानी चाहिए ।
मंगलवार, शुक्रवार, कोजागरी पूर्णिमा, धनत्रयोदशी, यमदीपदान, देवदीपावली एवं श्री लक्ष्मीपूजनके शुभ प्रसंगमें लक्ष्मीतत्त्व की रंगोलियां बनाएं ।
