गायन का सूर यदि अंतरंग के आनंदमय कोष से न आए तो श्रीकृष्ण के आने का मार्ग अवरुद्ध होता है ! – प.पू. देवबाबा, किन्नीगोळी, मंगळूरू

 

१. संगीत से साधना करनी हो, तो सूर से सूर का मिलना
आवश्यक होना, बेसुरे गायन से सुरों के माध्यम से अंतरंग में न जा पाना

‘गायन का सुर अपने अंतरंग के आनंदमय कोष से आना चाहिए । सूर इस प्रकार से नहीं मिला, तो श्रीकृष्ण के आने का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है । संगीत से साधना करनी हो, अंतरंग में जाना होे , तो सूर से सूर मिलना चाहिए। गायन बेसुरा न हो । बेसुरे गायन से सुरों के माध्यम से अंतरंग में नहीं जा सकते । हम जिस पट्टी में (टीप) गाते हैं, उस पट्टी में गाते समय हमारा सूर ठीक से मिलना चाहिए ।

(टीप : ‘गायन अथवा वादन में स्वरों के अलग अलग ऊंचाई से प्रारंभ करते हैं । इन स्वरों की विशिष्ट ऊंचाई चुनकर उस सप्तक में गाना अथवा वादन करना, इसे ही गायन अथवा वादन की ‘पट्टी’ अथवा ‘स्केल’, कहते हैं ।’ – कु. तेजल पात्रीकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.)

 

२. सूर और ताल, अर्थात् राधा और कृष्ण

गायन सूर में हो, तो ही वह ईश्‍वर तक पहुंचता है । सूर और ताल,अर्थात् राधा और कृष्ण । सूर न मिला, तो कृष्ण विना राधा और ताल नहीं मिला, तो राधा विना कृष्ण, ऐसा हो जाएगा ।’

– प.पू. देवबाबा, किन्नीगोळी, मंगळूरू  ॐ
स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात

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