सनातन संस्था के ४०वें संत पू. गुरुनाथ दाभोलकरजी (आयु ७९ वर्ष) की साधनायात्रा !

‘बाह्यरूप से संत होने का एक भी लक्षण दिखाई न देनेवाले पू. गुरुनाथ दाभोलकरजी आज गुरुपदपर विराजमान हैं’, इसे समझकर लेना अधिकांश लोगों के लिए असंभव है । उन्होंने साधकों के सामने यह एक बडा आदर्श रखा है । ‘उनकी अगली उन्नति भी इसी प्रकार से तीव्रगति से होती रहेगी’, इसके प्रति मैं आश्‍वस्त हूं ।’ – परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी

 

१. जन्म एवं बचपन

‘मेरा जन्म १५.२.१९४० (माघ शुक्ल पक्ष सप्तमी, रथसप्तमी) के दिन मळेवाड (तहसील सावंतवाडी, जनपद सिंधुदुर्ग) में हुआ । बचपन से ही घर का वातावरण आध्यात्मिक था ।

१ अ. मां और दादी को ‘मुंबई से काका आनेवाले हैं’, ऐसा बताया
जाना । उस रात को वास्तव में ही काका घर आना और इस प्रसंग को परात्पर गुरु
डॉ. आठवलेजी को बतानेपर उनके द्वारा ‘आपके पूर्वपुण्य के कारण आपको ऐसा लगा’, ऐसा बताया जाना

मैं जब ५ वर्ष का था, तब एक रात ९.३० बजे मां और दादी रोटियां सेंक रही थीं । मैने उनसे कहा, ‘आज मुंबई से नाना (काका) आनेवाले हैं ।’’ मां और दादी ने मेरी बातों को मजाक में लिया; परंतु तब सचमुच ही मेरे काका मध्यरात्रि में घर आए ।

जब मैंने परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी को यह प्रसंग बताया, तब उन्होंने कहा, ‘‘आपके पूर्वपुण्य के कारण आपको ऐसा लगा ।’’

१ आ. आयु के १४वें वर्ष से ‘मुझे गृहस्थी में न रहकर तीर्थस्थान जाना है’, ऐसा निरंतर लगना

सामान्यतः आयु के १४वें वर्ष से मुझे ऐसा निरंतर लगता था कि मुझे घर (गृहस्थी) में नहीं रहना है, अपितु किसी तीर्थस्थान, धर्मस्थल अथवा अज्ञातस्थान में जाना है । इसके संदर्भ में मैं हमारे पडोस में रहनेवाले एक लडके को बताता था । हम दोनों के विचार एक-दूसरे से मेल खाते थे । वह लडका मुझसे १०-१२ वर्ष छोटा था ।

१ इ. देवी का संचार होनेवाले एक व्यक्ति द्वारा ‘कुछ
समय पश्‍चात इसकी बहुत उन्नति होनेवाली है’, ऐसा बताया जाना

मेरे बचपन में मेरे पिता में देवी का संचार होता था । रात के ९ बजे के पश्‍चात संचार होनेवाले अन्य ३-४ लोग एकत्रित होते थे । उनमें से एक व्यक्ति मेरे संदर्भ में कहने लगा, ‘‘कुछ समय पश्‍चात इसके जीवन में बहुत कुछ उदय होनेवाला है ।’’

 

२. समस्टि साधना

अ. जब से मुझे साधना समझ में आई, तब से मैं आने-जानेवाले लोगों को नामजप करने के लिए बताने लगा । साधना के आरंभ में मैं कई बार बस में किसी व्यक्ति को देखकर उसके बाजू में बैठता था और उसका झुकाव देखकर धीरे-धीरे साधना के संदर्भ में बोलना आरंभ कर उसे साधना बताता था ।

आ. अध्यात्मप्रसार के अंतर्गत मैं ग्रंथप्रदर्शनी लगाना, दैनिक ‘सनातन प्रभात’ का वितरण, परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की जनसभाओं के संबंधित इत्यादि सेवाएं कीं ।

इ. कुडाळ में पूर्णकालीन साधना आरंभ कर वहां के सेवाकेंद्र में मैने स्वागतकक्षपर सेवा की ।

ई. अक्टूबर २०११ से मई २०१२ की अवधि में मैने जळगांव के साधकों के लिए नामजप किया । मैं आज भी समष्टि हेतु तथा आध्यात्मिक कष्ट से ग्रस्त साधकों के लिए नामजप कर रहा हूं ।

उ. मिरज आश्रम में मैने लगभग डेढ वर्षतक स्वागतकक्ष में सेवा की । उसके पश्‍चात मैं देवद (पनवेल) आश्रम आया । अभीतक मैं वहीं सेवारत हूं । वहां में स्वागतकक्ष, मांग-आपूर्ति इत्यादि सेवाएं की । अब में बांधनी की सेवा कर रहा हूं ।

 

३. सेवा करते समय की विचारप्रक्रिया

साधना में आनेपर मुझे मन से ऐसा लगता था कि मुझे दी गई सेवा मन से करनी है और उसके लिए मैने कभी भी रात और दिन की चिंता नहीं की ।

 

४. गुरुदेवजी के प्रति भाव

आजतक मुझमें, ‘चाहे कुछ भी हो; गुरुदेवजी उसे देख लेंगे और सबकुछ वहीं करेंगे’, यह भाव है । परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने साधना के संदर्भ में जो कुछ भी बताया, उसे मैं करता गया ।

 

५. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा साधना के संदर्भ में किया गया मार्गदर्शन

एक बार मैने परात्पर गुरु डॉक्टरजी से कहा, ‘‘जब मैं भाववृद्धि सत्संग में जाता हूं, तब सत्संग लेनेवाली साधिकाएं जो कुछ बताती हैं, वह मेरी समझ में नहीं आता ।’’ तब परात्पर गुरु डॉक्टरजी कहने लगें, ‘‘आपको अब भाववृद्धि सत्संग में नहीं बैठना है । हमें पुनः पीछे नहीं जना है ।’’

 

६. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा व्यक्त गौरवोद्गार !

मैं जब देवद आश्रमे में सेवारत था, तब एक बार मुंबई की कु. वत्सला रेवणकर से दूरभाषपर मैं बात कर रहा था । तब वे बीच में ही कहने लगीं, ‘‘काका, आप एक दिन हमसे मिलने आईए न !’’ तब मैने उनसे कहा, ‘‘मुझे वहां कौन पहचानता है ?’’ तब उन्होंने कहा, ‘‘काका, आप ऐसा क्यों कहते हैं ? गुरुदेवजी ने जहां मुंबई में स्वयं सत्संग लिए, वहां एक वाक्य सदैव बताया जाता है, मैं केवल श्री. गुरुनाथ दाभोलकर से मिलने हेतु ही सिंधुदुर्ग गया था ।’’ यह सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गए । आज भी जब-जब मुझे उस प्रसंग का स्मरण होता है, तब मेरा मन उमड आता है ।

 

७. देवद आश्रम आनेपर परात्पर गुरु पांडे महाराज की सेवा का अवसर मिलना

वर्ष २००३ में मैं देवद आश्रम आ गया । वहां जाने के कुछ वर्ष पश्‍चात मुझे परात्पर गुरु पांडे महाराज की सेवा करने का अवसर मिला । तब मैं सदैव उनके साथ था ।

 

८. संतपद

५.५.२०१४ को देवद आश्रम में मुझे संत के रूप में घोषित किया गया ।

 

९. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की कृपा से परिवारजनों की भी सर्वोपरी चिंता की जाना

एक बार मैं और मेरा भाई परात्पर गुरु डॉक्टरजी से मिलने गए थे । मेरे भाईपर ही हमारे परिवार का  दायित्व है । वह निरंतर सबकुछ छोडकर कहीं जाने के संदर्भ में बोल रहा था । जब मैने यह बात परात्पर गुरु डॉक्टरजी को बताई, तब वे मेरे भाई से कहने लगें, ‘‘कहीं और जाने की क्या आवश्यकता है ? आप रामनाथी आश्रम में रह सकते हैं अथवा पनवेल जाईए ! वहां तुम्हारे भाई हैं, आप वहां भी रह सकते हैं ।’’

 

१०. उत्स्फूर्तता से विचार सुझना

पूर्वजीवन में किसी प्रकार का लेखन किए बिना ही अनेक बार मुझे साधना, राष्ट्र, धर्म आदि के संदर्भ में उत्स्फूर्तता से विचार सुझे हैं ।

 

११. स्वयं के अस्तित्व के कारण परात्पर गुरु
डॉ. आठवलेजी के छायाचित्र में आए अच्छे बदलाव

अ. वर्ष २०१७ में मेरे कक्ष के पूजाघर में स्थित परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का छायाचित्र गुलाबी बन गया था ।

आ. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा मुझे दिया गया उनका छायाचित्र मैने बैग में रखा था, वह भी गुलाबी बन गया था ।

इ. अब जो कक्ष के पूजाघर में परात्पर गुरु डॉक्टरजी का छायाचित्र है, उसमें भी बदलाव आए हैं, ऐसा कक्ष में आनेवाले साधक बताते हैं ।

 

१२. कृतज्ञता

अबतक की मेरी साधनायात्रा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मैं असमर्थ हूं । कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु मेरे पास शब्द ही नहीं हैं ।’

– पू. श्री गुरुनाथ दाभोलकरजी, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल (३१.१२.२०१८)

 

पू. दाभोलकरकाकाजी का साधकों के प्रति प्रेमभाव !

‘पू. दाभोलकरकाकाजी का प्रेममय हास्य ही हम साधकों को बहुत कुछ देकर जाता है । उनमें हम साधकों के प्रति प्रेमभाव अमूल्य है । उन्होंने आते-जाते हमारी साधना की ओर जो ध्यान दिया, वह हमें निरंपर प्रेरणा देती है ।’

– श्रीमती आनंदी पांगुळ, सनातन आश्रम, देवद, पनवेल (३१.१२.२०१८)
संदर्भ : दैनिक सनातन प्रभात