प्राचीन काल की लकडी से मूर्ति बनाने की अध्यात्मशास्त्रीय पद्धति

कु. प्रियांका लोटलीकर

‘भारत को ऋषि-मुनियों की महान परंपरा प्राप्त है । ऋषि-मुनियों द्वारा लिखे गए वेद, उपनिषद, पुराण इत्यादि मनुष्य को सर्वांगीण ज्ञान प्रदान करते हैं । उनमें मनुष्य के लिए आचारधर्म, उपासना, साधना, संरक्षण इत्यादि सभी विषय अंतर्भूत हैं । ऋषि-मुनियों को यह ज्ञान उनके आध्यात्मिक सामर्थ्य के कारण मिला था । साधना में पूर्णता आने के पश्‍चात उन्हें ईश्‍वर से ज्ञान प्राप्त हुआ । भारत पर मुगल, अंग्रेज, डच एवं पुर्तगालियों द्वारा किए गए निरंतर आक्रमणों के पश्‍चात भारतीय संपत्ति, समृद्धि और वैभव की लूटपाट हुई; परंतु भारत देवभूमि होने से आज भी भारत में कुछ मात्रा में ज्ञानरूपी वैभव टिका हुआ है । लाखों वर्ष पूर्व लिखे गए ग्रंथ आज भी कुछ मात्रा में टिके हुए हैं । इसका कारण है उनमें विद्यमान शाश्‍वत ज्ञानसामर्थ्य और चैतन्य ! भारत में प्राचीन काल से चली आ रही नृत्यकला, चित्रकला, आयुर्वेद, संरक्षणकला, वनस्पतिशास्त्र, तंत्रविद्या इत्यादि विद्याएं इसमें अंतर्भूत हैं ।

छायाचित्र में वृक्ष का पूजन करते हुए उसमें प्रकाशरूप में देवतातत्त्व आकर्षित होना और उसके वृक्ष से पूजक की ओर आकर्षित होता हुआ दिखाई दे रहा है ।

 

१. देवता की मूर्ति अथवा पादुका तैयार करने हेतु
वृक्ष का पूजन एवं प्रार्थना कर उसके तने में मूर्ति उत्कीर्ण (कोरी जाना)
और उसके पश्‍चात भी यदि वह वृक्ष जीवित रहा, तो उस मूर्ति की प्रतिष्ठापना की जाना

हम केरल राज्य के त्रिशूर में श्री. एल्.के. गिरीश से प्राचीन भारतीय संस्कृति के संदर्भ में जानकारी लेने हेतु गए थे । श्री. गिरीश स्वयं एक तंत्रविद्या उपासक एवं अभ्यासी हैं । उन्होंने हमें प्राचीन काल की लकडी से देवताओं की मूर्तियां और पादुका तैयार करने की प्रक्रिया बताई । प्राचीन काल में जिस वृक्ष से देवता की मूर्ति बनानी हो, पहले उसका पूजन किया जाता था और फिर वृक्ष से प्रार्थना कर, उसके तने में मूर्ति उत्कीर्ण की जाती थी । तदुपरांत उत्कीर्ण मूर्तिवाले भाग को वृक्ष से अलग किया जाता था और कटे हुए भाग पर औषधि लगाकर, उसे कपडे से बांध दिया जाता था । उसके पश्‍चात भी यदि वह वृक्ष जीवित रह जाता, तो उससे बनी मूर्ति की प्रतिष्ठापना की जाती थी । इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण देखने मिला है केरल के एर्नाकुलम् जनपद के कोरंकट्ट स्थित १६ वीं शताब्दी के भगवती मंदिर में । जब ध्वज प्रतिष्ठापना हेतु वृक्ष की खोज कर रहे थे, तब वृक्ष को बांधे हुए तथा मंत्र से भारित लाल कपडे में एक श्‍वेत प्रकाश आकर्षित होता हुआ छायाचित्र में आ गया है ।

 

२. ऋषि-मुनियों द्वारा बहुत पहले ही प्रत्येक जीव एवं
चराचर में ईश्‍वरीय तत्त्व अंतर्भूत होने का सिद्धांत सिखाया जाना

आजकल के आधुनिक युग में विविध स्वार्थों के लिए बडी मात्रा में पेडों की कटाई की जाती है; परंतु पहले भारतीय परंपरा कितनी विकसित थी, यह इस उदाहरण से ध्यान में आता है । इस प्रकार से प्रत्येक जीव और चराचर में ईश्‍वरीय तत्त्व होता है और उसमें अध्यात्म कैसे होता है, इसे ऋषि-मुनियों ने बहुत पहले ही सिखाया है । ऋषि-मुनियों द्वारा प्रदान इस अपूर्व ज्ञान के कारण उनके चरणों में जितनी कृतज्ञता व्यक्त की जाए, उतनी अल्प ही है ।

– कु. प्रियांका लोटलीकर, महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय, गोवा (२७.४.२०१९)