प्रेमभाव, स्वयं को बदलने की तडप तथा परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के प्रति अपार श्रद्धा से युक्त पुणे की सनातन की ८१वीं संत पू. माया गोखलेदादीजी (आयु ७५ वर्ष) !

 

१. प्रेमभाव

अ. प्रेमभाव तो दादी का स्थाईभाव ही है । उनके मन में प्रत्येक साधक एवं परिजनों के प्रति प्रेमभाव ही है । उनके प्रत्येक कृत्य से प्रेमभाव प्रतीत होता है । उनमें किसी के भी प्रति पूर्वग्रह नहीं होता ।

आ. दादी ने मेरी मां के साथ कभी भी बहू के रूप में व्यवहार नहीं किया । उन्होंने सदैव ही उसपर  केवल अपनी लडकी की भांति नहीं, अपितु लडकी से भी अधिक प्रेम किया । हमारे कोई भी परिजन साधना में नहीं है; किंतु तब भी उन्हें ऐसा लगता है, ‘सांस हो तो ऐसी (अर्थात दादी जैसी) और मां हो, तो भी वह दादी के जैसी ही !’

इ. हमारे घर में अर्थात मां, पिताजी और दादी में आजतक कभी झगडा नहीं हुआ है । हमारे पडोसी और परिजनों को इसके संदर्भ में बहुत आश्‍चर्य लगता है ।

ई. दादी का व्यवहार केवल आध्यात्मिक स्तरपर ही नहीं, अपितु व्यावहारिक स्तरपर भी आदर्श ही था । अतः वह समाज के लोग और परिजनों की प्रशंसा के पात्र बनी

उ. दादी उनकी विनम्र बातें और प्रेमल स्वभाव के कारण सभी की लाडली है । सभी परिजन उनपर प्रेम करते हैं । उसने अपने ससुरालवालों को भी अपना बना लिया है ।

 

२. साधना में निरंतरता

दादी को जब से गुरुकृपायोग के अनुसार साधना समझ में आई, तब से अर्थात पिछले १५ वर्षों से वह प्रातःकाल उठकर मानसपूजा, नामजप, दैनिक ‘सनातन प्रभात’ का वाचन, सारणी लेखन आदि व्यष्टि साधना के प्रयास नियमितरूप से करती है । रात को सोने में भले कितना भी विलंब हुआ, तो भी वे सारणी लेखन कर ही सोती हैं और दूसरे दिन का नियोजन भी खंडित नहीं होने देती । उन्होंने उक्त प्रयास कभी खंडित होने नहीं दिए । अस्वस्थ होने के समय भी वह ये सभी प्रयास करती हैं । उसमें वह कभी छूट नहीं लेती । किसी दिन उसके द्वारा प्रयास नहीं हुए, तो उसके प्रति उसके मन में खेद होता है ।

 

३. सकारात्मक रहकर परिस्थिति का स्वीकार करना

३ अ. आनंद से और सकारात्मक रहकर गृहस्थी चलाना

दादी अपने बचपन में बडे घर में और एक बडे परिवार में रही और पली-बढी थी । विवाह के पश्‍चात किसी कारणवश उसे हमारे कुछ परिजनों के १-२ कक्षवाले छोटे घर में रहना पडा; किंतु उसके संदर्भ में उसने अपने पिताजी से कभी शिकायत नहीं की । उसने सदैव ही आनंद से और सकारात्मक रहकर गृहस्थी चलाई । वह सभी बातों को यथास्थिति में स्वीकार कर निरंतर साधना करती है ।

३ आ. प्रिय नाती का पूर्णकालीन साधना के लिए आश्रम में रहने की बात का सहजता से स्वीकार किया जाना

मैं बचपन से ही दादी के साथ हूं । उसे छोडकर मैं कभी नहीं गई थी । उसके कारण जब मैं साधना के लिए आश्रम जाते समय उसका मन उमड आया; किंतु उसने उसे भी मात दी । अब मैं जब कभी घर जाती हूं, तो वह मुझे कहती है, ‘‘तुम कुछ दिनों के लिए ही घर आओ; क्योंकि यहां तुम्हारा समय व्यर्थ जाता है । तुम्हें पूर्णकालीन साधना ही करनी चाहिए ।’’ मुझसे बहुत लगाव होते हुए भी मेरा पूर्णकालीन आश्रम में रहने की बात उसने बहुत सहजता से स्वीकार की और इससे उसने मुझे ‘त्याग में ही वास्तविक प्रेम है’, इसका भान कराया ।

 

४. सेवा की तडप

दादी पहले प्रसार के अंतर्गत वितरण कक्ष (स्टॉल) लगाना, दैनिक ‘सनातन प्रभात’ का वितरण करना जैसी सेवाएं करती थी । अब उसे यह संभव नहीं होता; इसलिए वह मुझे, मां और पिताजी से कहती है, ‘‘तुम सभी बाहर जाकर सेवा करो और घर में भी सेवा करो ।’’ बीच में कुछ दिन शारीरिक अस्वस्थता के कारण हम घर में रुकते थे । तब भी वह निरंतर ईश्‍वर से ‘हे भगवान, आप मुझे शीघ्र स्वस्थ बनाईए; क्योंकि मेरे कारण दूसरों की सेवा बाधित न हो ।’, यह प्रार्थना करती थी और हमें भी बोलती थी, ‘‘आप मेरे लिए घर में न रुकें । आप अपनी सेवाओं को ही प्रधानता दीजिए ।’’

 

५. सिखने की वृत्ति

वह दूरचित्रवाणीपर प्रसारित कार्यक्रम से साधना की दृष्टि से सिखने का प्रयास करती है । हम मनोरंजन के लिए कार्यक्रम देखते हैं; किंतु वह उससे भी सिखने का प्रयास करती है ।

 

६. अहं अल्प होना

दादी सदैव कुछ न कुछ पढती रहती है । साधना में आने से पहले ही उसे वाचन में बहुत रूचि है । उसने अनेक ग्रंथ और पुस्तक पढे हैं । उसके कारण उसे कई विषयों का ज्ञान है; किंतु उसमें इसका थोडा भी अहं नहीं है । उसकी बातों में सदैव ही ‘मुझे कुछ नहीं आता । मुझे कुछ समझ में नहीं आता’, यही वाक्य होते हैं ।

 

७. स्वयं को बदलने की तडप

बीच में कुछ दुखद घटनाओं के कारण दादी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी । तब २ वर्षोंतक उसका आध्यात्मिक स्तर ६९ प्रतिशत रहा था । वह उस स्थिति से बाहर निकलने का बहुत प्रयास कर रही थी । वह सदैव पू. काळेदादी एवं पू. दातेदादी को दूरभाष कर ‘इससे बाहर निकलने के लिए मैं कैसे प्रयास करूं ?’, ऐसा पूछती थी । हमारी (मैं, मां और पिताजी) की साधना उसकी अपेक्षा बहुत अल्प होते हुए भी वह हमसे सदैव अपनी चूकें पूछती थी । उस स्थिति से बाहर निकलने हेतु वह अखंडित परिश्रम उठा रही थी । ‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का चित्रमय जीवनदर्शन’ ग्रंथ में संतों के अनेक छायाचित्र थे; किंतु उसमें दादी का छायाचित्र नहीं था । तब मैने उससे कहा, ‘‘दादी, तुम संत बन गई, तो ग्रंथ में तुम्हारा भी छायाचित्र छपेगा ।’’ तब वह रोने की स्थिति में आकर कहने लगी, ‘‘उसके लिए मैं और क्या प्रयास कर सकती हूं, वह तुम मुझे बताओ ।’’

 

८. भावपूर्ण रसोई बनाना

दादी बहुत अच्छी रसोई बनाती है । अब वयस्क होने के कारण उसे अधिक समयतक खडे रहना संभव नहीं होता; किंतु वह सदैव कुछ न कुछ करती रहती है । उसने कोई पदार्थ खिलाया, तो केवल पेट ही नहीं, अपितु मन भी भर जाता है । वह पदार्थ किसी भोग की भांति लगता है और ‘उसमें उसका भाव संपूर्णरूप से उतर गया है’, ऐसा लगता है ।

 

९. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के प्रति श्रद्धा !

मैं जब छोटा था, तब ‘हमारे घर में कभी भी झगडा नहीं होता’, इस बात का मुझ में बहुत कौतुहल था; क्योंकि हमारे इर्द-गिर्द के घरों में होनेवाले झगडे हमें सदैव सुनाई देते थे । एक बार मैने दादी से पूछा, ‘‘दादी, हमारे घर में झगडे क्यों नहीं होते हैं ?’’ तब उसने मुझे दृढतापूर्वक बताया, ‘‘हम सभी साधक हैं और साधना करते हैं और हमारे जीवन में गुरुदेवजी हैं; इसलिए हमारे घर का वातावरण दूसरों के घरों की अपेक्षा अलग है ।’’ इस प्रसंग से मुझे उसमें परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के प्रति व्याप्त श्रद्धा, उसके समझ में आया हुआ साधना का महत्त्व और उसके साधना के दृढ दृष्टिकोण, ये गुण मेरे ध्यान में आ गए । वह माया से संपूर्णरूप से अलिप्त है । उसे मजे करना, खाना-पीना, घूमने जाना जैसी बातों में तनिक भी रूचि नहीं है । वह कहती है कि मेरा प्रत्येक क्षण गुरुदेवजी के लिए ही है ।

 

१०. परात्पर गुरु डॉक्टरजी के प्रति भाव

अ. दादी प्रतिदिन सुबह परात्पर गुरु डॉक्टरजी की मानसपूजा करती है । वह दिनभर उनका स्मरण करती है । वह जब परात्पर गुरु डॉक्टरजी के संदर्भ में बोलती है, तब कई बार उसका भाव जागृत होता है । तब हमें उसके मन में विद्यमान कृतज्ञताभाव के दर्शन होते हैं ।

आ. उसके संत बन जाने से पहले हमारे घर में कुछ दुखद घटनाएं हुईं; किंतु तब वह हमें बताती थी, ‘‘परात्पर गुरु डॉक्टरजी का हमारी ओर ध्यान है । वहीं हमें इससे मार्ग दिखाएंगे ।’’ इसमें उसमें विद्यमान गुरुदेवजी के प्रति का भाव ध्यान में आता है ।

इ. दादी शबरी की भांति परात्पर गुरु डॉक्टरजी के घर आने की प्रतीक्षा में है । उसे लगता है, ‘‘परात्पर गुरु डॉक्टर स्थूल रूप से घर आएंगे ।’’ इसलिए वह कहती है, ‘‘हम हमारे घर को आश्रम की भांति बनाएंगे ।’’

ई. ‘जब साधक घर आते हैं तब उनके रूप में परात्पर गुरु डॉक्टरजी ही घर आए हैं’, ऐसा उसे लगता है ।

उ. दादी कहती है, ‘‘भले हमारा घर वास्तुशास्त्र के अनुसार न बना हो; किंतु हमारे घर में परात्पर गुरुदेवजी का वास है; इसलिए हमारा घर साधना के लिए पूरक बना है ।’’ परात्पर गुरुदेवजी के प्रति उसकी अनन्य भक्ति के कारण वे घर में सूक्ष्मरूप से सदैव निवास करते हैं’, ऐसा उसे लगता है ।

 

११. पू. दादी में प्रतीत बदलाव

अ. पू. दादीजी की त्वचा बहुत मुलायम और चिकनी हुई है ।

आ. पू. दादी की आयु ७५ वर्ष होते हुए भी उसके बाल अभी काले हैं ।

इ. पू. दादी का मुखमंडल बहुत खिल गया है । उसके मुखमंडलपर एक अलग ही तेज आया है ।

ई. उसकी बातों में पहले से भी बहुत मिठास आई है । पहले भी वह विनम्रता से ही बातें करती थी; किंतु अब उसमें मुलायमता आई है ।

उ. वह प्रतिदिन पूजा-अर्चना करती है । पूजाघर में स्थित दत्तजी के चित्र में बदलाव प्रतीत होता है । वह चित्र अब श्‍वेत बना है । उस चित्र में स्थित ‘४  कुत्ते और गाय जिवंत हो गए हैं’, ऐसा लगता है । दत्तजी का वह चित्र अब निर्गुण अवस्था में है ।

ऊ. साधकों को ‘दादी को छोडकर कहीं जाना ही नहीं है’, ऐसा लगता है । उनके पैर घर से उठते नहीं ।

 

१२. पू. दादीजी के कारण घर में आए बदलाव

बाहर के व्यक्ति और साधकों को भी घर में आते ही शांति प्रतीत होकर उनके मन के विचार न्यून होते हैं । घर में आनेपर उन्हें सुगंध आना, प्रकाश दिखाई देना, नामजप अपनेआप आरंभ हो जाना जैसी अनेक अनुभूतियां होती हैं । ‘यह सभी परिवर्तन दादी की साधना के कारण ही आए हैं’, ऐसा लगता है ।

 

१३. कृतज्ञता और प्रार्थना

परात्पर गुरु डॉक्टरजी, ऐसी दादी मिलने के लिए न जाने कितने जन्मोंतक पुण्य करना पडता होगा । आपकी ही कृपा से आपने मेरे भाग्य में यह पुण्य दिया । दादी के संदर्भ में भले कितने ही लिखा जाए, तो भी वह अल्प ही है । इससे ईश्‍वर ने ही मेरे ध्यान में लाकर दिया कि उसके जैसे व्यक्ति को देखना और अनुभव करने का अवसर मिलने के लिए ईश्‍वर ने मेरे द्वारा पिछले जन्मों में साधना कर ली होगी ।’

परात्पर गुरु डॉक्टरजी, आपकी कृपा से ही इस प्रकार की अद्वितीय गुणों के भण्डारवाली दादी मुझे मिली । इसके लिए मैं आपके चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञ हूं । मेरे द्वारा ‘दादी के गुण मुझमें आएं’, इस दिशा में प्रयास हों, यह मुझे आशीर्वाद दें और आप ही मुझ से ‘आपको अपेक्षित प्रयास करवा लें’, यही आपके चरणों में शरणागतभाव से प्रार्थना है ।’

– कु. मधुरा पराग गोखले (पू. गोखलेदादी की नातिन), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा )आयु २० वर्ष) (२०.१०.२०१९)