अध्यात्म में सर्वाेच्च पद पर विराजमान होते हुए भी अखंड शिष्यावस्था में रहनेवाली महान विभूति !

प.पू. डॉक्टरजी परात्पर गुरु के सर्वाेच्चपद पर विराजमान हैं । इतनी उच्च स्थिति में होते हुए भी प.पू. डॉक्टरजी ने अपना शिष्यत्व बनाए रखा है । उनके अनेक कृत्यों से यह सीखने को मिलता है । इनमें से कुछ उदाहरण आगे दे रहे हैं ।

 

१. भेंट लेने आए संतों के सामने भी शिष्यभाव में रहनेवाले प.पू. डॉक्टरजी !

कुछ वर्ष पूर्व एक संत अपने कुछ शिष्यों के साथ प.पू. डॉक्टरजी से भेंट करने आए थे । प.पू. डॉक्टरजी रात्रि डेढ-दो बजे तक उनसे वार्तालाप कर रहे थे । मिलने जाते समय प.पू. डॉक्टरजी ने कुछ वस्तुओं से भरा बक्सा जिसमें दैवी परिवर्तन हुए थे तथा अनिष्ट शक्तीयों के आक्रमण हुए थे, उन संत को दिखाने हेतु ले गए । भेंट समाप्त होने तक उन संतों के शिष्य बाहर खडे उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे । भेंट समाप्त होने पर आश्रम के अधिकांश साधक सो गए थे । प.पू. डॉक्टरजी उस बक्से को हाथ में लेकर कक्ष का दीप एवं पंखा बंद कर बाहर आए । उस समय उन संत ने प्रश्न किया कि, क्या आपके शिष्य ये कार्य नहीं करते ? इसका उत्तर देते हुए प.पू. डॉक्टरजी ने कहा कि मैं भी आश्रम का एक शिष्य ही हूं । मैं आश्रम में प.पू. भक्तराज महाराज के शिष्य के समान ही रहता हूं । उन संत को बहुत आश्चर्य हुआ । यह प्रसंग प.पू. डॉक्टरजी ने एक बार साधकों को बताया । उस समय उन्होंने कहा कि सदैव शिष्यावस्था में रहने से हम आनंद में रह सकते हैं । शिष्य अर्थात सीखने की अवस्था में !

 

२. प.पू. डॉक्टरजी का गुरु के प्रति भाव !

२ अ. निरीहता एवं कृतज्ञताभाव

१. प.पू. डॉक्टरजी एवं प.पू. जीजी (प.पू. डॉक्टरजी के सद्गुुरु प.पू. भक्तराज महाराजजी की धर्मपत्नी) की भेंट की वीडियो सीडी देखते समय प.पू. डॉक्टरजी का प.पू. बाबा के प्रति भाव सीखने को मिला । प.पू.डॉक्टरजी, प.पू. जीजी को अपनी साधना का प्रवास बता रहे थे । उस समय प.पू. डॉक्टरजी के आचरण एवं संभाषण में बालक के समान निरीहता और कृतज्ञताभाव प्रतीत हो रहा था ।

२. वे सदैव कृतज्ञताभाव से कहते हैं कि प.पू. बाबा के संकल्प एवं कृपाशीर्वाद के कारण ही सनातन का कार्य इतना बढ रहा है ।

२ आ. भक्तिभाव

प.पू. डॉक्टरजी के कक्ष के पूजाघर में रखा प.पू. बाबा का छायाचित्र प.पू. डॉक्टरजी के भाव के कारण सजीव हो गया है एवं उसमें दिन-प्रतिदिन अनेक दैवी परिवर्तन हो रहे हैं ।

२ इ. निष्ठापूर्वक आज्ञापालन

१. प.पू. डॉक्टरजी को प.पू. बाबा ने धर्मप्रसार की सेवा दी । उसमें उन्हें अनेक अडचनों का सामना करना पडा एवं विरोध भी हुआ । तब भी उन्होंने पूर्ण निष्ठा से गुरु की आज्ञा का पालन किया एवं अभी भी वे यह कार्य कर रहे हैं ।

२. प.पू. डॉक्टरजी की प्राणशक्ती अत्यल्प है; परंतु गुरु द्वारा दिए गए ग्रंथलेखन के आशीर्वाद अर्थात आज्ञा के अनुसार दिन में अधिकांश समय ग्रंथलेखन की सेवा करते हैं ।

२ ई. शिष्यभाव

प.पू. बाबा का छायाचित्र यदि किसी प्रसार साहित्य पर लिया हो, तो वह अधिक अच्छे से दिखे इस दृष्टि उसमें परिवर्तन बताते हैं । एक बार भजनों की ध्वनि-चक्रिका के मुखपृष्ठ पर (सीडी के कवर पर) प.पू. बाबा भजन करते हुए गद्दे पर बैठे हुए, ऐसा छायाचित्र था । प.पू. डॉक्टरजी ने उनके पीछे तकिया एवं बाजू में लोड रखने हेतु कहा । उस समय उनके बताए गए सुधार से मेरे ध्यान में यह बात आई कि प्रत्यक्ष बाबा बैठे हैं तो उन्हें आराम से वैâसे बिठा सकते हैं, ऐसे शिष्यभाव से वे विचार करते हैं ।

 

३. प.पू. डॉक्टरजी का अन्य संतों के प्रति भाव !

सनातन की सहायता करनेवाले संतों से संबंधित प्रत्येक कृत्य भी प.पू. डॉक्टरजी भावपूर्ण ही करते हैं । वे संतों द्वारा बताए हुए  आध्यात्मिक उपाय एवं अनुष्ठान भी नियमित कृतज्ञताभाव से पूर्ण करते हैं ।

– श्रीमती अवनी आळशी, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा

संदर्भ : दैनिक सनातन प्रभात

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