परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी का अद्वितीय ग्रंथकार्य (परिचय एवं विशेषताएं)

पू. (श्री.) संदीप आळशी

‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी के गुरु सन्त भक्तराज महाराजजी ने उनसे एक बार कहा था, ‘‘मेरे गुरु ने मुझे आशीर्वाद दिया था कि तू किताबों पर किताबें लिखेगा ।’ किन्तु मैं भजन का एक ही ग्रन्थ लिख पाया । वह आशीर्वाद मैं आपको देता हूं । अनेक ग्रन्थ लिखना ।’’ गुरु का आशीर्वाद फलने के लिए शिष्य में उनके प्रति दृढ श्रद्धा, समर्पित भाव, आज्ञाधारिता, लोककल्याणकी तीव्र लगन, गुरुकार्य में निःस्वार्थता आदि गुण आवश्यक होते हैं । परात्पर गुरु डॉक्टरजी, इन गुणों को धारण करनेवाले आदर्श शिष्य हैं । इसीलिए उनका लगाया हुआ ग्रन्थरूपी पौधा तीव्र गति से बढ रहा है । सनातन के प्रकाशित ग्रन्थों की संख्या अब ३०० हो गई है । १८ मई २०१७ को जब परात्पर गुरु डॉक्टरजी का ‘अमृत महोत्सव’ मनाया जा रहा है । यह ‘अमृत महोत्सव’ और ‘सनातन का ३०० वां ग्रन्थ प्रकाशित होना’, इन दोनों शुभ योगोंका औचित्य साधकर प्रस्तुत लेख प्रकाशित कर रहे हैं ।

वर्ष २००७ से विविध रोग और प्राणशक्ति अत्यल्प होने के कारण अत्यंत कठिन शारीरिक स्थिति में भी अखिल मानवजाति के कल्याण हेतु ग्रंथरूपी ज्ञानयज्ञ अविरत आरंभ ही रखनेवाले परात्पर गुरु डॉक्टरजी के चरणों में कोटि-कोटि कृतज्ञता !

‘इस लेख द्वारा परात्पर गुरु डॉक्टरजी की महिमा को पहचानकर उनके ग्रंथों में किए मार्गदर्शन में साधना करने की जिज्ञासु और साधकों को प्रेरणा मिले और सभी अपने जीवन का उद्धार करें’, यह श्री गुरुचरणों में प्रार्थना !

– पू. (श्री.) संदीप आळशी, सनातन आश्रम रामनाथी, गोवा (सनातन के ग्रंथों के संकलक)

 

१. ग्रंथ-रचना का आरंभ (साइक्लोस्टाइल ग्रंथ)

‘वर्ष १९८६ से परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी अध्यात्म में रुचि रखनेवालों के लिए अध्यात्म पर अभ्यासवर्ग ले रहे थे । उस वर्ष उन्होंने अभ्यासवर्ग में आनेवालों के लिए बनाए नोट्स से ‘अध्यात्मशास्त्र’ नामक २०० पन्नों का चक्रमुद्रांकित (साइक्लोस्टाइल) ग्रंथ संकलित किया । उस समय संगणक न होने के कारण चक्रमुद्रांकित ग्रंथ प्रकाशित करना पडता था । कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, कुंडलिनीयोग, ऐसे विविध साधनामार्गों के साथ अध्यात्म के सर्वांग का परिचय करानेवाले इस चक्रमुद्रांकित ग्रंथ से ही आगे प्रत्येक विषय पर सनातन का स्वतंत्र ग्रंथ बना । इसलिए यह चक्रमुद्रांकित ग्रंथ सनातन के सर्व आध्यात्मिक ग्रंथों की नींव है ।

 

२. शीव (सनातन का मुंबई स्थित पहला
सेवाकेंद्र) के प्रारंभिक ग्रंथ-रचना की सेवा का इतिहास

२ अ. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी की सदनिका
(‘फ्लैट’) के एक छोटे से कमरे में ग्रंथकार्य का आरंभ !

शीव, मुंबई में पहले परात्पर गुरु डॉक्टरजी रहते थे । यही मुंबई का सनातन संस्था का आरंभिक सेवाकेंद्र था । दो फ्लैट में से एक फ्लैट में परात्पर गुरु डॉक्टरजी का चिकित्सालय था । इसके एक छोटे से कमरे में बैठकर परात्पर गुरु डॉक्टरजी ग्रंथ-लेखन करते ।

२ आ. ग्रंथ-रचना की सेवा संगणक पर आरंभ होने से पहले

१. परात्पर गुरु डॉक्टरजी ग्रंथ स्वयं कागज पर लिखते थे ।

२. ग्रंथों का लेखन विषयानुसार वर्गीकरण करने की प्रक्रिया : अनेक बार ग्रंथ का कोई लेखन विविध विषयों के लिए उपयुक्त होता; इसलिए उसका विषय के अनुसार वर्गीकरण कर रखना पडता । परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने ऐसे विविध विषयों की ‘फाईल्स’ कर रखी थीं । इसलिए यदि कोई लेखन ४ विषयों के लिए उपयुक्त हो, तो वह लेखन सुवाच्च अक्षर में ४ अलग-अलग कागजों पर लिखकर फिर ४ ‘फाईल्स’ में रखना पडता था । यह सेवा परात्पर गुरु डॉक्टरजी साधकों से करवाकर लेते । इससे साधकों को सेवा का अवसर मिलता और वे आध्यात्मिक ज्ञान भी सीख पाते; इसलिए सभी साधकों को यह सेवा बहुत अच्छी लगती ।

अब साधकों को सेवा के लिए संगणक उपलब्ध हो गए हैं । लेखन का संगणक पर टंकण हो जानेसे वह सुलभ और अत्यल्प समय में हो जाता है । इस पृष्ठभूमि पर परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने ग्रंथ-रचना के आरंभिक काल में कितनी मेहनत की होगी, यह हमारे ध्यान में आएगा ।

२ इ. ग्रंथ-रचना की सेवा संगणक पर आरंभ होने पर

१. ‘संत भक्तराज महाराजजी का चरित्र’ और ‘संत भक्तराज महाराजजी की सीख’ इन ग्रंथों के निमित्त ग्रंथ-रचना की संगणकीय सेवा का आरंभ : वर्ष १९९५ में परात्पर गुरु डॉक्टरजी के गुरु प.पू. भक्तराज महाराजजी का अमृत महोत्सव था । इस निमित्त परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने ‘संत भक्तराज महाराजजी का चरित्र’ और ‘संत भक्तराज महाराजजी की सीख’ ये दो ग्रंथ प्रकाशित करने का निश्‍चय किया ।

२. साधक द्वारा अर्पण किए हुए संगणकों पर ग्रंथकार्य का आरंभ : कभी-कभी शीव सेवाकेंद्र में आकर सेवा करनेवाले साधक स्व. राजेश धनावडेजी ने स्वयं पहले एक और कुछ मास में दूसरा संगणक संस्था को अर्पित किया । इस प्रकार ग्रंथ-रचना की संगणकीय सेवा आरंभ हुई । अमृत महोत्सव के निमित्त दोनों ग्रंथ समय पर पूर्ण हो पाए ।

‘ईश्‍वरीय कार्य हो, तो किसी न किसी के माध्यम से भगवान सहायता करते ही हैं’, इसकी प्रचिती सभी को हुई । आज सनातन के साधक अच्छे से सेवा कर पाएं, इसके लिए आवश्यकतानुसार अच्छी क्षमता के महंगे संगणक दानराशि से सहज खरीदे जा सकते हैं । इस पृष्ठभूमि पर यदि हम यह ध्यान में लें कि ‘संस्था का ग्रंथ-रचना का कार्य आरंभ हुआ, वह एक साधक के अर्पित एक सादी क्षमता के संगणक पर’, तो इस कार्य का मोल हम समझ पाएंगे ।

 

३. ग्रंथ-रचना की प्रक्रिया

अ. ग्रंथों का लेखन

परात्पर गुरु डॉक्टरजी को दिन में ४ – ५ घंटे चिकित्सालय के लिए समय देना पडता । साथ ही दिनभर में अध्यात्मप्रसार के अंतर्गत आनेवाली विविध सेवाएं भी रहती । यह सब संभालकर शेष समय वे ग्रंथों के लेखन की सेवा करते । इसके अंतर्गत ‘भारतीय संस्कृतिकोश’ जैसे ग्रंथ में से अपने ग्रंथों के लिए उपयुक्त सूत्र चिन्हित कर रखना, विविध संतों से सीखने मिले सूत्र ग्रंथों की दृष्टि से लिखना, साधना में हुए अनुभवों के आधार पर सूत्र लिखना इत्यादि सेवाएं परात्पर गुरु डॉक्टरजी करते ।

आ. संगणक पर टंकण

परात्पर गुरु डॉक्टरजी द्वारा लिखे सूत्रों का अथवा संदर्भ ग्रंथों में चिन्हित लेखन का संगणक पर टंकण करने की सेवा आरंभ में साधक श्री. मनोज कुवेलकर करते, वे एक कंपनी में नौकरी भी करते थे । आरंभ में एक ही संगणक और टंकण आनेवाले श्री. मनोज कुवेलकर ही थे । इसलिए और उन्हें दिन में नौकरी के लिए जाना पडता, इसलिए वे रात को देर तक जागकर टंकण की सेवा करते । आगे अन्य साधकों ने भी टंकण की सेवा सीख ली । परात्पर गुरु डॉक्टरजी के ग्रंथलेखन की गति इतनी होती कि एक भी दिन ऐसा न होता कि जिस दिन टंकण के लिए सेवा ही उपलब्ध न रहती ! दिन में ग्रंथ-विभाग में रखे १ – २ संगणकों पर साधकों को बारी-बारी से सेवा कर टंकण की सेवा पूर्ण करनी पडती । आज सनातन के आश्रमों में संगणकीय सेवा करनेवाले लगभग प्रत्येक साधक के पास निजी संगणक पर सेवा करने का अवसर उपलब्ध है । ‘गुरु ने साधकों की सेवा के लिए कितनी सुख-सुविधाएं दी हैं’, इसका विचार कर साधकों में कृतज्ञताभाव बढना चाहिए ।

इ. साधक टंकण हुई प्रतियां हस्तलिखित से जांचते ।

ई. संकलन

परात्पर गुरु डॉक्टरजी उस प्रति के शीर्षक काटकर उसे अभ्यासपूर्वक क्रम में लगाकर विषय की अनुक्रमणिका तैयार करते । उस अनुक्रमणिका के अनुसार फिर लेखन क्रम से लगाया जाता । फिर परात्पर गुरु डॉक्टरजी संपूर्ण लेखन की प्रति संकलन और व्याकरण की दृष्टि से जांचते । श्रीमती कुंदाजी (परात्पर गुरु डॉक्टरजी की पत्नी डॉ. (श्रीमती) कुंदा आठवले) भी ग्रंथ जांचने की सेवा में परात्पर गुरु डॉक्टरजी का बहुमूल्य सहयोग करतीं ।

उ. मुद्रितशोधन

संकलित लेखन पुनः व्याकरण की दृष्टि से जांचने की सेवा साधक करते थे । इस प्रकार ग्रंथ के लिए प्रत्येक लेखन ४ – ५ बार व्याकरण की दृष्टि से जांचा जाता । ‘प्रत्येक कर्म परिपूर्ण करना’, यह ईश्‍वर का गुण है; इसलिए परात्पर गुरु डॉक्टरजी कोई भी कृत्य परिपूर्ण करने को महत्त्व देते ।

ऊ. संगणकीय संरचना

ग्रंथ के लिए लेखन का संकलन पूर्ण होने पर लेखन का ग्रंथ स्वरूप में प्रस्तुतीकरण करने के लिए साधक संगणक पर लेखन की संरचना करते थे ।

ए. ‘बटर पेपर’ पर प्रति निकालना

ग्रंथ संगणक में तैयार होने पर उसे छपाई के लिए देने के लिए उसकी ‘बटर पेपर’ पर प्रति निकालनी पडती । ‘बटर पेपर’ पर प्रति निकालने के लिए लगनेवाला ‘लेजर प्रिंटर’ पैसों के अभाव में खरीद न पाने के कारण बाहर से यह कॉपी निकालनी पडती । (कुछ वर्ष उपरांत ‘लेजर प्रिंटर’ खरीदा गया ।) ‘बटर पेपर’ पर प्रति निकालकर लाने के लिए दुपहिए से १५ कि.मी. दूर जाना पडता । ये ‘बटर पेपर’ बाद में छपाई के लिए मुद्रणालय में भेजे जाते ।

ऐ. ग्रंथों के मुखपृष्ठ बनाना

आरंभ में ग्रंथ का मुखपृष्ठ संगणक पर बनाने की कुशलता साधकों में नहीं थी । इसलिए गोरेगांव, मुंबई के सनातन के एक हितचिंतक श्री. किशोर करमरकर सेवा के रूप में हाथ से मुखपृष्ठ का ‘आर्टवर्क’ बनाकर देते । सनातन के प्रत्येक ग्रंथ पर छपनेवाले गुरुकृपायोग का बोधचिन्ह भी उन्होंने ही बनाया था । यह बनाने के लिए ‘बोधचिन्ह में शिष्य गुरु को नमस्कार कर रहा है’, यह आकृति कैसी होनी चाहिए, यह परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने एक साधक को प्रत्यक्ष करके दिखाया । तदनंतर उस साधक ने श्री. करमरकर के घर जाकर उन्होंने वह स्थिति दिखाई । इस प्रकार श्री. करमरकर ने ‘आर्टवर्क’ बनाया ।

बाद में श्री. आशिष सावंत, श्रीमती जान्हवी शिंदे और कु. अनुराधा वाडेकर (वर्तमान में सद्गुरु (कु.) अनुराधा वाडेकर) इन साधकों ने संगणक पर मुखपृष्ठ बनाने की कुशलता अत्यंत परिश्रमपूर्वक सीखी । इसलिए आगे ग्रंथों के मुखपृष्ठ संगणक पर बनना आरंभ हुआ ।

– पू. (श्री.) संदीप आळशी

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