वराहज्वर (स्वाइन फ्लू) और आयुर्वेदीय चिकित्सा
वराहज्वर के लक्षण सर्वसामान्य बुखार की भांति ही होते हैं ।
वराहज्वर के लक्षण सर्वसामान्य बुखार की भांति ही होते हैं ।
विकार-निर्मूलन हेतु बक्सों से उपचार सामान्यत प्रतिदिन १ से २ घंटे करें । कुछ दिन प्रतिदिन १ से २ घंटे बक्सों से उपचार करने पर भी विकार घट न रहे हों अथवा नियंत्रित न हो रहे हों, तो उपचारों में वृद्धि करें ।
ब्रह्मांड में विद्यमान प्राणशक्ति (चेतना) कुंडलिनीचक्रों द्वारा मनुष्य के शरीर में ग्रहण की जाती है आैर उस चक्रविशेष द्वारा वह शरीर की संबंधित इंद्रिय तक पहुंचाई जाती है । इंद्रिय में प्राणशक्ति के (चेतना के) प्रवाह में बाधा आने पर विकार उत्पन्न होते हैं ।
रिक्त बक्से में रिक्ति होती है । इस रिक्ति में आकाशतत्त्व होता है । आकाशतत्त्व के कारण आध्यात्मिक उपचार होते हैं । आध्यात्मिक उपचारों के लिए बक्से का उपयोग करने से व्यक्ति के देह, मन तथा बुद्धि पर आया कष्टदायक शक्ति का आवरण, तथा व्यक्ति में विद्यमान कष्टदायक शक्ति बक्से की रिक्ति में खिंचकर नष्ट हो जाती है ।
‘तांबे के स्वच्छ बर्तन में २ घंटे से अधिक काल रखे हुए जल को ‘ताम्रजल’ कहते हैं ।
यदि प्रत्येक व्यक्ति नारियल तेल को अपने जीवन का अविभाज्य अंग बना ले, तो दूसरी किसी भी औषधि की आवश्यकता नहीं लगेगी
वर्तमान कलियुगके रज-तमात्मक वातावरणमें जन्म लेनेवाले प्रत्येक जीवमें कोई-न-कोई विकार होता ही है । किसीके भी मनमें यह प्रश्न उठ सकता है कि ‘विकार दूर करनेके ‘एलोपैथी’, ‘होमियोपैथी’ समान आधुनिक तथा प्राचीन आयुर्वेद उपचारपद्धति उपलब्ध होनेपर भी, ‘सूचीदाब (एक्यूप्रेशर)’ उपचारपद्धति क्यों आवश्यक है ।’
आयुर्वेद में न केवल उपचार होता है बल्कि यह जीवन जीने का ऐसा तरीका सिखाता है, जिससे जीवन लंबा और खुशहाल होता है।
प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने हाथ की तर्जनी की नोक का तलुवे से स्पर्श करें तथा अंगूठा, मध्यमा और अनामिका इन उंगलियों की नोकों को एक-दूसरे से लगाएं और यह मृत संजीवनी मुद्रा प्रतिदिन ३० मिनटोंतक करती है, तो उससे उसका हृदय सशक्त रहेगा ।
अतः आगामी भीषण आपातकाल में अल्प मूल्य की बहुगुणी विविध औषधीय वनस्पतियां सहजता से उपलब्ध हों, इसके लिए उन्हें अभी से घर के आसपास अथवा खेत में रोपना आवश्यक है
