आयुर्वेद – विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा

विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है आयुर्वेद । आयुर्वेद तन, मन और आत्‍मा के बीच संतुलन बनाकर स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार करता है। आयुर्वेद में न केवल उपचार होता है बल्कि यह जीवन जीने का ऐसा तरीका सिखाता है, जिससे जीवन लंबा और खुशहाल होता है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में वात, पित्‍त और कफ जैसे तीनों मूल तत्‍वों के संतुलन से कोई भी बीमारी आप तक नहीं आ सकती। लेकिन जब इनका संतुलन बिगड़ता है, तो बीमारी शरीर पर हावी होने लगती है और आयुर्वेद में इन्‍हीं तीनों तत्‍वों का संतुलन बनाया जाता है। साथ ही आयुर्वेद में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने पर बल दिया जाता है ताकि किसी भी प्रकार का रोग न हो। आयुर्वेद में विभिन्‍न रोगों के इलाज के लिए हर्बल उपचार, घरेलू उपचार, आयुर्वेदिक दवाओं, आहार संशोधन, मालिश और ध्‍यान का उपयोग किया जाता है।

 

आयुर्वेदिक चिकित्सा के लाभ

    • आयुर्वेदीय चिकित्सा विधि सर्वांगीण है।
    • आयुर्वेदिक चिकित्सा के उपरान्त व्यक्ति की शारीरिक तथा मानसिक दोनों में सुधार होता है।
    • आयुर्वेदिक औषधियों के अधिकांश घटक जड़ी-बुटियों, पौधों, फूलों एवं फलों आदि से प्राप्त की जातीं हैं। अतः यह चिकित्सा प्रकृति के निकट है।
    • व्यावहारिक रूप से आयुर्वेदिक औषधियों के कोई दुष्प्रभाव (साइड-इफेक्ट) देखने को नहीं मिलते।
    • अनेकों जीर्ण रोगों के लिए आयुर्वेद विशेष रूप से प्रभावी है।
    • आयुर्वेद न केवल रोगों की चिकित्सा करता है बल्कि रोगों को रोकता भी है।
    • आयुर्वेद भोजन तथा जीवनशैली में सरल परिवर्तनों के द्वारा रोगों को दूर रखने के उपाय सुझाता है।

 

एलोपैथी औषधि (विषम चिकित्सा) रोग के प्रबंधन पर केंद्रित होती है, जबकि आयुर्वेद रोग की रोकथाम और यदि रोग उत्पन्न हुआ तो कैसे उसके मूल कारण को निष्काषित किया जाये, उसका ज्ञान प्रदान करता है।

आयुर्वेद पर सबसे पुराने ग्रन्थ चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय हैं। यह ग्रंथ अंतरिक्ष में पाये जाने वाले पाँच तत्व-पृथ्वी, जल वायु, अग्नि और आकाश, जो हमारे व्यतिगत तंत्र पर प्रभाव डालते हैं उसके बारे में बताते हैं। यह स्वस्थ और आनंदमय जीवन के लिए इन पाँच तत्वों को संतुलित रखने के महत्व को समझते हैं।

 

आयुर्वेद – अनादि एवं शाश्‍वत मनुष्य जीवन का शास्त्र

आयुर्वेद का अर्थ जीवन का वेद अथवा मनुष्य जीवन का शास्त्र । उसमें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य कैसे रखा जाना चाहिए, इसका मार्गदर्शन है । जीवन के लिए हितकारी तथा अहितकारी आहार, विहार और आचारों का विवेचन किया गया है । मनुष्य जीवन का लक्ष्य एवं वास्तविक सुख किसमें है, इसका भी विचार किया गया है । साथ ही रोगों के कारण, लक्षण, चिकित्सा तथा रोग ही न हों; इसके लिए उपाय दिए गए हैं । केवल इसी जन्म में ही नहीं, अपितु आगे के जन्मों में भी सर्वांगीण उन्नति कर मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य दुख से शाश्‍वत मुक्ति तथा सच्चिदानंद स्वरूप की निरंतर अनुभूति कैसे प्राप्त की जाती है, इसका भी मार्गदर्शन आयुर्वेद ने किया है । संक्षेप में कहा जाए, तो मनुष्य जीवन का सर्वांगीण विकास करनेवाला एवं सफल, दीर्घ और स्वास्थ्यसंपन्न जीवन कैसे जीना चाहिए, इसका मार्गदर्शन करनेवाला शास्त्र है आयुर्वेद !

आयुर्वेद एक नित्य, अनादि, शाश्‍वत एवं निरंतर गतिशील शास्त्र है । ‘न चैव हि अस्ति सुतराम् आयुर्वेदस्य पारम् । (चरकसंहिता विमानस्थान, अध्याय ८, श्‍लोक १४) श्‍लोक का अर्थ है आयुर्वेद के ज्ञान की सीमा नहीं है । निरंतर वृद्धिंगत होना ही आयुर्वेद का स्वभाव है । ‘सोऽयमायुर्वेदः शाश्‍वतो निर्दिश्यते अनादित्वात् स्वभावसंसिद्ध-लक्षणत्वात् । (चरकसंहिता, सूत्रस्थान, अध्याय ३०, श्‍लोक २५) का अर्थ आयुर्वेद अनादि एवं स्वयंसिद्ध होने से वह शाश्‍वत है । आयुर्वेद आयुष्य का वेद है तथा आयुष्य का ज्ञान है । प्राचीन ऋषिमुनियों का यह विशाल दृष्टिकोण था कि जिस-जिस शास्त्र में मनुष्य जीवन तथा स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त जानकारी है, वह शास्त्र आयुर्वेद में ही अंतर्निहित होता है । ऐसा प्रत्येक शास्त्र आयुर्वेद का अभिन्न विभाग है । इस दृष्टि से विचार किया, तो होमिओपैथी, अक्युपंक्चर, आधुनिक चिकित्सीय शास्त्र, इलैक्ट्रोथेरपी, नैचरोपैथी, मैग्नेटोथेरपी आदि शास्त्र आयुर्वेद में ही अंतर्निहित हैं, यह ध्यान में आता है । अधिक से अधिक उन्हें आयुर्वेद की शाखाएं कहा जा सकता है । आयुर्वेद के विशाल वृक्षतले प्रत्येक शाखा अपनी विशेषता को अवश्य टिकाए रखकर अपनी-अपनी शाखा का विस्तार करें । इस असीम आयुर्वेद के अध्ययन हेतु उसके मूलतत्त्वों का अध्ययन करना आवश्यक है ।

‘न अनौषधं जगति किंचित द्रव्यम् उपलभ्यते ।’ (चरकसंहिता, सूत्रस्थान, अध्याय २६, श्‍लोक १२) का अर्थ जगत में ऐसा कोई द्रव्य नहीं है, जिसका औषधि के रूप में उपयोग किया न जा सकता हो । आयुर्वेद ने वनस्पतियों के गुणों का वर्णन उसके मनुष्य शरीरपर होनेवाले परिणामों के आधारपर किया है, उदा. पिपली गर्म है, तो आमला ठंडा है । इसका अर्थ पिप्पली का तापमान अधिक और आमले का अल्प है, ऐसा नहीं है । वो स्पर्श में गर्म अथवा ठंडे नहीं हैं । गर्म द्रव्य कोशिका में चयापचय की क्रिया को अल्प बढाते हैं, तो शीत द्रव्य चयापचय की क्रिया अल्प बनाते हैं । गर्म द्रव्यों के कारण शरीर की नलिकाएं चौडी होती हैं, तो शीत द्रव्यों से सिकुडती हैं । आयुर्वेद ने मधुर, खट्टे, नमकीन, तीखे, कटू और कसैले स्वादवाले अन्न का एवं द्रव्यों के दोष का धातू एवं मलपर कैसे परिणाम होता है, इसका बडा अच्छा वर्णन किया है । आयुर्वेद में बताई गई कई वनस्पतियां गांव में भी मिलती हैं; इसलिए सदैव मिलनेवाली वनस्पतियों का रोगनिवारण हेतु तथा स्वास्थ्यमय जीवन जीने के लिए कैसे उपयोग करना चाहिए, इसकी जानकारी आयुर्वेद में मिलेगी ।

चरत सुश्रुत के काल में वनस्पतियों के अंगों का औषधि के रूप में उपयोग किया जाता था । कई वनस्पतियों के संस्कृत नाम उनके गुण एवं कार्य को दर्शाते हैं, उदा. कुष्ठ नामक वनस्पति कुष्ठरोगपर उपयोगी है । ब्राह्मी ब्राह्मण की बुद्धि हेतु उपयोगी, अश्‍वगंधा घोडे जैसे गंधवाली, अश्‍व पुरुषत्व का प्रतीक है; इसलिए वह पुरुषों के जननेंद्रियों को बल प्रदान करनेवाली वनस्पति है । सोया को संस्कृत में शतपुष्पा कहते हैं । पुष्प का अर्थ फूल । यह वनस्पति महिलाओं के पुष्पेंद्रियपर अर्थात जननेंद्रियपर काम करनेवाली है । मेदा एवं महामेदा के कारण शरीर में मेदधातू बढता है तथा उससे वजन बढने में सहायता होती है ।

 

१. हिन्दू धर्म की अद्वितीय देन आयुर्वेद का महत्त्व

‘आयुर्वेद जीव को काल एवं प्रकृति के अनुसार यम-नियमों के बंधनों के अनुरूप आचरण सिखाकर उसकी आध्यात्मिक उन्नति हेतु सहायता करनेवाली एक उपासनापद्धति ही है । अतः प्रारब्ध के कारण रोग होने के पश्‍चात भी आयुर्वेद में विशद आचरण करने से जीव का वह भोग सहज बन जाता है तथा अनिष्ट शक्ति का कष्ट न होते हुए आध्यात्मिक उन्नति करना संभव होता है ।

– श्री. निषाद देशमुख

 

२. आयुर्वेद चिकित्सीय पद्धति साधनापद्धति का ही एक अंग

‘प्राचीन ऋषि-मुनियों को सर्वोच्च सुख अर्थात आनंद केवल साधना से ही संभव है’, यह ज्ञात होने से उन्होंने साधना की दृष्टि से विविध पद्धतियां और शास्त्रों की निर्मिति की । आयुर्वेद चिकित्सीय पद्धति भी इसका अपवाद नहीं है । उसके कारण सर्वसामान्य उपासनापद्धति में अंतर्निहित गुणविशेषताएं आयुर्वेद में भी दिखाई देती हैं । इसका विश्‍लेषण आगे दिया गया है ।

२ अ. आयुर्वेद के द्वारा काल के अनुसार तथा प्रकृति के अनुसार मार्गदर्शन किया जाना

आयुर्वेद में जीव को काल एवं प्रकृति के अनुसार आवश्यक आचरण तथा पथ्य का मार्गदर्शन किया जाता है, उदा. किस ऋतु में कौन से अन्नपदार्थ प्रमुखता से और कितनी मात्रा में सेवन करना चाहिए, वृद्धावस्था की दृष्टि से किन बातों का ध्यान रखना चाहिए इत्यादि । इस प्रकार से जीव काल के अनुसार आचरण करता है तथा उससे उसकी साधना का उपयोग शारीरिक, मानसिक एवं अन्य विकारों को दूर करने हेतु न होकर आध्यात्मिक उन्नति हेतु किया जाता है ।

२ आ. आयुर्वेद में बताए गए यम-नियमों का पालन करने से जीव का मनोलय होने हेतु सहायता मिलना

आयुर्वेद में औषधिय चिकित्सा के साथ ही पथ्यपालन को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है । उससे जीव को औषधियोंसहित यम-नियमों का भी पालन करना पडता है । औषधियों से संबंधित यम-नियमों के पालन के कारण जीव का अपने मन के अनुसार आचरण न्यून होकर कुछ मात्रा में उसका मनोलय होने में सहायता मिलती है ।

२ इ. शारीरिक स्तर के साथ मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर के कष्ट न्यून होने हेतु सहायता होना

प्राचीन काल के वैद्यों में जीव को होनेवाले रोगों का मूल कारण जानने की क्षमता थी । उसके कारण वे जीवन को विविध मंत्रों से युक्त औषधि देते थे, जिससे कि जीव को शारीरिक कष्टोंसहित मानसिक तथा आध्यात्मिक स्तर के हो रहे कष्ट न्यून होने में भी सहायता मिलती थी । उसी प्रकार से किस कृत्य से मन को कष्ट हो सकता है, उसे टालने हेतु भी आयुर्वेद में मार्गदर्शन किया गया है, उदा. संभोग कौन से ऋतु में करना चाहिए और किस ऋतु में नहीं करना चाहिए इत्यादि । संक्षेप में कहा जाए, तो आयुर्वेदीय चिकित्सीय पद्धति के कारण शारीरिक स्तरसहित मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर के कष्ट भी न्यून हो जाते हैं ।

२ ई. शरीर में जिन तत्त्वों की न्यूनता है, उन तत्त्वों को प्राप्त करा देनेवाली साधना का मार्गदर्शन करना

अनेक योगमार्ग ईश्‍वर के साथ एकरूप होने हेतु आवश्यक तत्त्व प्राप्त करा देनेवाली साधना बताते हैं, वही कार्य कुछ मात्रा में आयुर्वेद भी करता है । पंचतत्त्व ईश्‍वर की पराशक्ति है । जीव में विद्यमान पंचतत्त्व के समीकरण में बदलाव होनेपर जीव के कफ, वात और पित्त में वृद्धि होकर वह विविध रोगों से ग्रस्त हो जाता है । आयुर्वेद इन तीनों का संतुलन सिखाता है अर्थात पंचतत्त्वों में से जिसका अभाव होता है, उस तत्त्व को बढाता है । उसी प्रकार से आयुर्वेद के अष्टतंत्र में भूतविद्या एक तंत्र है । इस तंत्र में देैयवता एवं ग्रहों के कारण उत्पन्न विकार अर्थात दैवीय शक्ति के न्यून हो जाने से उत्पन्न विकार और उनकी चिकित्सा अंतर्निहित हैं ।

 

३. प्रारब्ध के कारण विकार होते हुए भी आयुर्वेद की निर्मिति का कारण

जीव को होनेवाले सभी रोग प्रारब्ध के कारण नहीं होते, अपितु कुछ रोग जीव के क्रियमाणकर्म के कारण भी उत्पन्न होते हैं । इन दोनों के कारण उत्पन्न रोगों को भोगकर समाप्त करने हेतु ईश्‍वर ने समष्टि को आयुर्वेद का ज्ञान प्रदान किया है ।

 

४. प्रारब्ध के कारण उत्पन्न रोगों में आयुर्वेदीय चिकित्सीयपद्धति का लाभ

४ अ. आयुर्वेदीय चिकित्सीयपद्धति के कारण जीव के साधना की हानि होना

जब जीव रोग से ग्रस्त होता है, तब उसके शरीर में कार्यरत प्राणशक्ति पहले रोग न्यून करने हेतु कार्यरत होती है । रोग के जंतू शक्तिशाली हो, तो प्राणशक्ति को उनको हराना संभव न होने से रोग बढता है । रोगी साधना करनेवाला हो, तो उसकी मनशक्ति जागृत होती है । अधिकांश रोगियों को विकार के कारण उत्पन्न स्थिति को स्वीकारना संभव नहीं होता और प्रारब्ध को भोगकर समाप्त करना साधना की दृष्टि से अधिक उचित है, इसका उन्हें ज्ञान नहीं होता । उसके कारण वे धीमे प्रारब्ध के कारण उत्पन्न रोग को अपनी मनशक्ति के बलपर दूर करते हैं, जिससे कि उनके पास उपलब्ध जन्म-जन्म की साधनारूपी शक्ति का व्यय होता है और इस प्रकार से रोग आदि कारणों के लिए साधना का व्यय होनेपर जीव की आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती तथा कई बार आध्यात्मिक अधोगति होती है । ७१ प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर के आगे उत्पन्न विकार प्रारब्ध के कारण अथवा क्रियमाण के कारण हुआ है, यह सहजता से ज्ञात होता है, साथ ही इस स्तर को जीव का मनोलय होने से वह रोग की ओर साक्षीभाव से देखता है और उससे उसके मन में प्रारब्ध के कारण उत्पन्न विकार स्वस्थ करने के विचार नहीं आते । ७१ प्रतिशत स्तर से न्यून आध्यात्मिक स्तर के जीवों को रोग होनेपर उनकी साधना की हानि न हो; इसके लिए आयुर्वेद का प्रयोजन है । आयुर्वेद साधनापद्धति का ही एक प्रकार होने से उसके पालन से उत्पन्न होनेवाली शक्ति रोग को न्यून करने हेतु उपयोग में लाई जाती है और जीव जो साधना करता है, उसकी साधना रोग को ठीक करने में उपयोग न होकर जीव की आध्यात्मिक उन्नति हेतु उपयोग में लाई जाती है । अतः आयुर्वेद चिकित्सीयपद्धति से धीमे प्रारब्ध के कारण उत्पन्न रोग दूर होते हैं, मध्यम प्रारब्ध के कारण रोगों की तीव्रता अल्प होती है, तो तीव्र प्रारब्ध के कारण उत्पन्न रोग भोगने की शक्ति प्राप्त होकर साधना की हानि नहीं होती ।

४ आ. आयुर्वेदीय चिकित्सीयपद्धति के कारण
जीवपर अनिष्ट शक्तियों का (सूक्ष्म का) आक्रमण अल्प मात्रा में होना

जीव के विकारग्रस्त होनेपर उसके रज-तम गुणों में वृद्धि होती है, साथ ही अनिष्ट शक्तियों के प्रतिकार हेतु उसकी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षमता न्यून हो जाती है । इसका लाभ उठाकर अनिष्ट शक्ति उस जीवपर आक्रमण कर नियंत्रण स्थापित करते हैं और अगले कई वर्षोंतक उसका उत्पीडन करते हैं । मृत्यु के समय भी जीव की स्थिति दुर्बल हो जाती है । वर्तमान आधुनिक चिकित्सा और प्रौद्योगिकी के कारण जीव की प्राणशक्ति बडी मात्रा में अधोगामी होती है । इससे शरीर में विविध अपशिष्ट वायु उत्पन्न होकर प्राणशक्ति घटकर प्राणशक्तिवहन संस्था में विविध बाधाएं उत्पन्न होती हैं । उसके कारण लिंगदेह को प्राण छोडकर जाना कठिन होता है, साथ ही अनिष्ट शक्तियों को लिंगदेहपर नियंत्रण स्थापित कर उसे लाखों वर्षोंतक दास बनाकर रखना संभव होता है । इसके विपरीत आयुर्वेद चिकित्सा के कारण जीव की प्राणशक्ति अधिक मात्रा में उर्ध्वगामी हो जाती है । प्राणशक्ति के उर्ध्वगामी होनेपर प्राणशक्तिवहन संस्था में प्राणशक्ति का प्रवाह कार्यरत होने से बाधाएं उत्पन्न नहीं होती और उससे मृत्यु के समय प्राणशक्ति के बलपर लिंगदेह को छोडना सहज बनकर उसकी अनिष्ट शक्तियों से रक्षा भी होती है ।

४ इ. आयुर्वेद चिकित्सीयपद्धति के कारण जीव की
देहबुद्धि न्यून होने से उसे सहजता से आगे की गति प्राप्त होना

वर्तमान आधुनिक चिकित्सा एवं प्रौद्योगिकी पद्धति के कारण जीव का देहभाव जागृत रहता है । उसके कारण उसे मृत्यु के समय शरीर तथा उससे संबंधित आसक्ति को त्यागना कठिन बन जाता है । इसके विपरीत आयुर्वेद चिकित्सीय पद्धति में विद्यमान प्रार्थना, मंत्र, पथ्य जैसी चिकित्सापद्धतियों का जीव के मनपर परिणाम होकर उसके ईश्‍वर के अनुसंधान में रत होने से जीव में ‘मैं और मेरा शरीर अलग है’, यह भाव उत्पन्न होने से देहबुद्धि न्यून होने में सहायता होती है और उसके कारण जीव मृत्यु के समय शरीर में न फंसकर उसे आगे की गति मिलना सहजता से संभव होता है ।

४ ई. आयुर्वेद चिकित्सीय पद्धति के कारण जीव की आध्यात्मिक उन्नति में सहायता होना

आयुर्वेद चिकित्सीय पद्धति के कारण रोगसग्रस्त भाग में भी प्राणशक्ति का संचार होता है । उसके कारण यदि जीवन का शरीर भले ही प्रारब्ध के कारण विकार भोग रहा हो; परंतु अनिष्ट शक्तियों को उसके रोगग्रस्त भागपर आक्रमण कर वहां स्थान बनाना संभव नहीं होता । आयुर्वेदीय चिकित्सीयपद्धति के कारण शरीर में प्राणशक्ति का आवश्यक मात्रा में उर्ध्व एवं अधो, इन दोनों प्रकार से संचारण होता है । उर्ध्वगामी प्राणशक्ति के प्रवाह के कारण कुंडलिनीचक्र संवेदनशील बनते हैं और उससे जीव के अस्वस्थ होते हुए भी साधना का परिणाम संबंधित कुंडलिनीचक्रपर होने से उस चक्र की जागृति होकर जीव को आध्यात्मिक उन्नति करना संभव होता है । इसके साथ ही अधोगामी प्राणशक्ति के प्रवाह के कारण विविध वायुओं की निर्मिति होकर शरीर का कार्य सुचारू रूप से चलने में सहायता मिलती है । संक्षेप में कहा जाए, तो आयुर्वेद चिकित्सापद्धति के कारण जीव की आध्यात्मिक उन्नति हेतु सहायता मिलती है ।

४ उ. निष्कर्ष

रोगरूपी कठिन प्रारब्ध में भी जीव को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक इन तीनों स्तर पे आधार प्राप्त होकर उसकी साधना का व्यय न होकर शारीरिक अस्वस्थता की स्थिति में भी उसे आध्यात्मिक उन्नति करना संभव हो; इसके लिए ईश्‍वर ने समष्टि को आयुर्वेद का ज्ञान प्रदान किया है ।’

– श्री. निषाद देशमुख (सूक्ष्म से प्राप्त ज्ञान), सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा

 

५. विकार प्रारब्ध के कारण होते हैं, तब भी आयुर्वेद का क्या प्रयोजन है ?

१. अधर्म ही सभी विकारों का मूल कारण है । सत्ययुग में धर्म उसके सत्य, शौच, तप एवं दान इन चारों पादोंपर खडा था । उस समय किसी भी प्रकार का विकार नहीं था । त्रेतायुग में धर्म का ‘सत्य’ नामक पाद क्षीण हुआ और तब अधर्म के कारण विकारों की उत्पत्ति हुई । विकारों के कारण ऋषियों की साधना में बाधा उत्पन्न होने लगी । यह बाधा दूर होकर ठीक से साधना करना संभव हो; इसके लिए भारद्वाज ऋषी ने इंद्र से आयुर्वेद सिखकर उसे अन्य ऋषियों को सिखाया ।’ ( संदर्भ : चरकसंहिता, सूत्रस्थान, अध्याय १) ’ उसके कारण साधना में उत्पन्न विकाररूपी बाधाएं दूर होने हेतु ही आयुर्वेद पृथ्वीपर अवतरित हुआ है ।

२. प्रारब्ध तो भोगना ही पडता है; किंतु साधना से उसकी तीव्रता को अल्प किया जा सकता है । इसके लिए आयुर्वेद में दैवव्यपाश्रय चिकित्सा बताई गई है । दैवव्यपाश्रय चिकित्सा का अर्थ है नामजप, मंत्र, नियम, प्रायश्‍चित्त, यज्ञ, शांति आदि साधना

३. सभी विकार केवल प्रारब्ध से नहीं होते । कुछ विकार अयोग्य क्रियमाणकर्म के कारण भी होते हैं । इन विकारों को योग्य क्रियमाण से टालना संभव हो अथवा ग्रस्त विकार ठीक हों; इसके लिए आयुर्वेद है ।

४. इस जन्म का क्रियमाण अगले जन्म का प्रारब्ध है । अतः इस जन्म में क्रियमाण न चूके तथा अगले जन्म प्रारब्ध प्रभावित न करे; इसके लिए आयुर्वेद के अनुसार आचरण करना चाहिए ।’

– वैद्य मेघराज पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा

 

रोग के मूल कारण की खोज कर उसकी चिकित्सा बतानेवाला आयुर्वेद !

आधुनिक चिकित्साशास्त्र आयुर्वेद
१. औषधियों का परिणाम औषधियां रासायनिक अथवा तात्कालीन होने के कारण अधिक समयतक सेवन करने से शरीर के अंग निष्प्रभावी हो जाना । इसमें उपयोग में लाई जानेवाली वनस्पतियों की मनुष्य शरीर के साथ समानता होने के कारण बिना किसी दुष्परिणाम से शरीर द्वारा उसका संपूर्णरूप से पाचन करना संभव होना ।
२. औषधियों का परिणाम किसपर होता है ? भौतिक शरीर शरीर एवं मन
३. चिकित्सा की पद्धति केवल लक्षण के आधारपर चिकित्सा की जाती है । आयुर्वेद उपवेद होने से रोग के कारक वात, पित्त एवं कफप्रधान प्रकृति के अनुसार मूल कारणपर उपाय कर स्वास्थ्यलाभ प्राप्त किया जा सकता है ।
४. अधिदैविक चिकित्सा, साथ ही ग्रहबाधा की चिकित्सा न होना होना
५. गर्भधारणा के पूर्व ही स्त्री बजी तथा पुरुष बीज उत्तम गुणवत्तावाला हो; इसके लिए चिकित्सा न होना ‘प्रजोत्पादन से भावी पीढी को सशक्त बनाने हेतु गर्भधारणा से पहले ही स्त्री एवं पुरुष बीज सारवान हो, साथ ही गर्भधारणा के पश्‍चात सानुमासिक काढे से गर्भ का अच्छा पोषण होकर गर्भ सशक्त बने; इसके लिए उपाय बताए गए हैं ।
स्रोत : दैनिक सनातन प्रभात