आयुर्वेद के अनुसार तांबे-पीतल के बर्तनों का महत्त्व

१. ताम्रजल का आयुर्वेदोक्त लाभ

‘तांबे के स्वच्छ बर्तन में २ घंटे से अधिक काल रखे हुए जल को ‘ताम्रजल’ कहते हैं । ‘रसरत्नसमुच्चय’ यह आयुर्वेद के रसशास्त्र इस विषय पर एक प्रमाणभूत संस्कृत ग्रंथ है । इसका पांचवें अध्याय के ४६ वें श्लोक में तांबे धातु का आगे बताएनुसार गुणधर्म का वर्णन है ।

‘तांबा, पित्त और कफ नाशक है । तांबे के कारण पेटदर्द, त्वचा के विकार, जंतु होना, मोटापा, मूलव्याध, क्षय (टी.बी.), पंडुरोग (रक्त में हिमोग्लोबिन अल्प होना, अनीमिया) इत्यादि विकार दूर होने में सहायता होती है । तांबा शरीर की शुद्धि करनेवाला, भूख बढानेवाला और नेत्रों के लिए अत्यंत हितकारी है । तांबे के कारण रक्तभिसरण की बाधाएं दूर होकर उसमें सुधार होता है और हृदय का स्वास्थ्य उत्तम रहता है । कांति बढती है । ये सर्व लाभ स्वच्छ चमकते हुए तांबे के बर्तन में रखे हुए पानी के नियमित उपयोग से प्राप्त होते हैं ।

ताम्रजल समान ही पीतल के भांडे में रखा हुआ पानी शरीर के लिए लाभदायक है । पीतल, यह तांबे और यशद (जिंक) की मिश्रधातु है । यशद शरीर की अनेक क्रियाओं के लिए आवश्यक होता है । यशद की कमी के कारण बच्चों का सर्वांगीण विकास मंद हो जाता है । स्तनपान करानेवाली माताओं के लिए यशद की आवश्यकता अधिक मात्रा में होती है ।

 

२. तांबे-पीतल के बर्तनों में रखे हुए पानी पर हुआ आधुनिक शोध

अ. पितांबरी प्रॉडक्टस् प्रा. लि. नामक आस्थापन ने तांबे की औषधि गुणविशेषताओं का सखोल अभ्यास करने के लिए विविध परीक्षण किया है । ऐसा पाया गया है कि उसमें ई. कोलाय (E. coli) जुलाब के लिए कारणभूत जिवाणू तांबे के संपर्क में आने पर ढाई घंटे में ही नष्ट हो जाते हैं ।

आ. इंग्लैंड में नेचर नामक विज्ञान एवं संशोधन विषय पर मासिक ने नॉर्थम्ब्रिया विद्यापीठ के डॉ. रीड नामक सूक्ष्मजीवशास्त्रज्ञों की शोध संबंधी प्रसिद्धी की है । डॉ. रीड ने पीतल के और मिट्टी के बर्तनों के पानी में ई. कोलाय नामक जुलाब के जंतू छोडे और दोनों बर्तनों के पानी का ६, २४ एवं ४८ घंटों में परीक्षण किया । तब ऐसा ध्यान में आया कि पीतल के बर्तन में रखे हुए पानी में ई. कोलाय के जंतुओं की मात्रा वेग से घट रही है ।

 

३. तांबे-पीतल के बर्तनों में पानी रखने से
पूर्व वह बर्तन स्वच्छ साफ करना आवश्यक !

हम जिस तांबे-पीतल के बर्तनों में पानी रखेंगे, उसे प्रतिदिन स्वच्छ करना आवश्यक है । बर्तन स्वच्छ न करने से हवा में विद्यमान प्राणवायु के संपर्क से तांबे का ऑक्साईड बनता है और उसकी थर के कारण तांबे का गुणधर्म पानी में नहीं उतरता । इसके अतिरिक्त पानी का उपयोग अयोग्य होता है ।

 

४. पीने का पानी बासी नहीं होना चाहिए !

२४ घंटों के उपरांत एक बर्तन में रखा पानी बासी हो जाता है । ऐसा पानी पीने से वात, पित्त और कफ, ये तीनों दोष बढते हैं । इसके लिए तांबे के बर्तन में पानी भी २४ घंटे उपरांत बदल लें ।

– वैद्य मेघराज पराडकर, सनातन आश्रम, रामनाथी, गोवा.

संदर्भ : दैनिक सनातन प्रभात

 

५. आरोग्य के लिए लाभदायक तांबे के बर्तन में पानी !

पहले अपने यहां तांबे के बर्तन में पानी भरकर रखा जाता था । तांबे के बर्तन से पानी पीना अपने शरीर के लिए लाभदायक होता है । इसके शास्त्रीय कारण भी हैं । गुणकारी तांबे के बर्तन अब लुप्त होते जा रहे हैं । शहरों में ऐसे बर्तन मिलने ही दुर्लभ हो गए हैं । आधुनिकता के नाम पर हम स्वयं ही अपना अहित कर रहे हैं । अब इस गुणकारी तांबे के बर्तनों की उपयुक्तता देखेंगे,

अ. तांबे के बर्तन में से पानी पीने से शरीर का रक्त बढता है । इससे अनीमिया का संभावना नहीं होती ।

आ. इसके साथ ही तांबे के बर्तन से सवेरे और शाम को पानी पीने से जोडों की वेदना दूर हो गई ।

इ. तांबे के बर्तन में ८-१० घंटे रखा हुआ पानी पीने से कॉलेस्ट्रॉल का स्तर नियंत्रण में रहता है और हृदय की क्षमता बढती है, जिससे हृदयविकार दूर रहते हैं ।

ई. तांबे में प्रतिजैविक गुणधर्म होने से घाव शीघ्र ठीक होने में सहायता होती है । इसलिए किसी घाव के ठीक होने में प्रतिदिन तांबे के बर्तन में पानी पिएं ।

उ. तांबे के बर्तन में पानी पीने से शरीर के संप्रेरक (हार्मोन्स) संतुलित रहते हैं । इसकारण थायरॉइड का धोका दूर हो जाता है ।

ऊ. तांबे के बर्तन के पानी में पर्याप्त प्रमाण में एंटी-ऑक्सिडेंट्स होते हैं, जो कर्करोग से लडने में सहायक होते हैं । इसकारण कर्करोग की संभावना अल्प रहती है ।

ए. पित्त, गैस अथवा पेट की दूसरी समस्या हो, तो तांबे के बर्तन का पानी उपयुक्त होता है । तांबा होगा, तो तांबे के बर्तन में पानी उपयुक्त होता है । तांबे के बर्तन में न्यूनतम ८ घंटे रखा हुआ पानी पीने से शरीर के विषैले पदार्थ उत्सर्जित होकर पचनक्रिया में सुधार होता है ।

ऐ. तांबे के बर्तन का पानी पीने से निस्तेज त्वचा में कांति आती है । मृत त्वचा (डेड स्किन) निकल जाती है और चेहरा सतत कांतिमय दिखाई देता है ।

इससे शास्त्रसंपन्न अपनी परंपराओं की सखोलता ही स्पष्ट होती है । वर्तमान का मनुष्य सुधारवादी बनने के सयानापन दर्शाने के लिए अपनी पहले से चली आ रहीं बातों की उपेक्षा करते हुए आगे जाने का प्रयत्न कर रहे हैं । पुराना है वह सोना है, इसप्रकार अपने पूर्वजों द्वारा बनाई प्रथाएं सचमुच में अपने आरोग्य के लिए स्वास्थ्यवर्धक और उपयुक्त हैं; आज का मानव जब यह समझेगा वह सुदिन होगा !

संदर्भ : दैनिक लोकमत