ईश्‍वर का दर्शन करने के लिए आनेवालों की संख्या में हुई प्रचंड वृद्धि और समस्या का उत्तर

सैकडों वर्ष पूर्व जब देवालयों का निर्माण किया गया, तब कुल जनसंख्या और दर्शन हेतु आनेवाले हिन्दुओं की संख्या मर्यादित थी । देवालय में दर्शन हेतु आनेवालों की संख्या को देखते हुए देवालय का आकार और रचना पूरक थी ।

देवालय का महत्त्व

प्रत्यक्ष ईश्वरीय ऊर्जा के आकर्षण, प्रक्षेपण एवं संचारण के केंद्र होते हैं ‘देवालय’ । इसलिए देवालय से ईश्वरीय ऊर्जा निरंतर आकर्षित होती है तथा उसका प्रक्षेपण सर्व दिशाओं में होता है ।

देवालय की सात्त्विकता एवं भावपूर्ण दर्शन का महत्त्व

देवता के दर्शन भावपूर्ण करने से ईश्‍वर की अनुभूति होती हैं । देवालय की सात्त्विकता दर्शन हेतु पोषक होती है ।

देवताके प्रत्यक्ष दर्शन करते समय ध्यान रखने योग्य कुछ महत्त्वपूर्ण बातें

देवताके दर्शन करते समय उनके चरणोंमें लीन होनेका भाव रखें । कोई भी वस्तु देवताके सामने रखी थालीमें रखें; परंतु देवताके शरीरपर न फेंकें ।

देवालयमें शिवजीके दर्शन कैसे करें ?

नंदीकी बाईं ओर साष्टांग नमस्कार करनेसे व्यक्तिमें शरणागतभाव जागृत होता है तथा देवालयमें विद्यमान चैतन्य तरंगें उसके देहमें प्रवाहित होने लगती हैं ।

देवालय के प्रांगणमें एवं सभामंडपमें कौनसे कृत्य करें ?

सभामंडपके निकट सीढियां हों, तो चढनेसे पहले दाएं हाथकी उंगलियोंसे प्रथम सीढीको स्पर्श कर नमन करें एवं उन उंगलियोंसे आज्ञा-चक्रको स्पर्श करें ।

दर्शनार्थियोंको देवालयकी सात्त्विकताका लाभ क्यों नहीं होता ?

सात्त्विक तरंगोंको अवरुद्ध करनेवाली चमडेकी वस्तुएं, जैसे कमरका पट्टा अर्थात बेल्ट इत्यादि धारण कर देवालयमें प्रवेश नहीं करना चाहिए । इसलिए ऐसी वस्तुएं द्वारपर ही उतार दें ।

देवालयमें प्रवेश करनेसे पूर्व पुरुषोंद्वारा अंगरखा अर्थात शर्ट उतारकर रखनेकी पद्धति हो, तो उसक

व्यावहारिक रूपसे भलेही यह उचित न लगे; परंतु देवालयकी सात्त्विकता बनाए रखनेके लिए कुछ स्थानोंपर ऐसी पद्धति है ।

देवालयमें दर्शनकी योग्‍य पद्धति

`देवालय’ अर्थात् जहां भगवानका साक्षात् वास है । दर्शनार्थी देवालयमें इस श्रद्धासे जाते हैं कि, वहां उनकी प्रार्थना भगवानके चरणोंमें अर्पित होती है और उन्हें मन:शांति अनुभव होती है ।