देवालयमें दर्शनकी योग्‍य पद्धति

सारणी

१. देवालयमें दर्शन कैसे करें ?

२. देवालयमें दर्शनकी योग्य पद्धति

२ अ. देवालयमें प्रवेशेसे पहले आवश्यक कृतियां

२ आ. देवालयके प्रांगणसे सभामंडपकी ओर जाना

२ इ. देवालयकी सीढियां चढना

२ ई. सभामंडपमें प्रवेश करना

२ उ. सभामंडपसे गर्भगृहकी ओर जानेकी पद्धति

२ ऊ. देवता-दर्शनसे पूर्व आवश्यक कृति

३. देवताकी मूर्तिके दर्शन करते समय आवश्यक कृतियां

४. देवताकी परिक्रमा लगाना

५. तीर्थ और प्रसाद ग्रहण करना

 


 

१. देवालयमें दर्शन कैसे करें ?

 `देवालय’ अर्थात् जहां भगवानका साक्षात् वास है । दर्शनार्थी देवालयमें इस श्रद्धासे जाते हैं कि, वहां उनकी प्रार्थना भगवानके चरणोंमें अर्पित होती है और उन्हें मन:शांति अनुभव होती है ।

 

२. देवालयमें दर्शनकी योग्य पद्धति

२ अ. देवालयमें प्रवेशेसे पहले आवश्यक कृतियां

१. शरीरपर धारण की हुई चर्मकी वस्तुएं उतार दें ।

२. देवालयके प्रांगणमें जूते-चप्पल पहनकर न जाएं; उन्हें देवालयक्षेत्रके बाहर ही उतारें । देवालयके प्रांगण अथवा देवालयके बाहर जूते-चप्पल उतारने ही पडें, तो देवताकी दाहिनी ओर उतारें ।

३. देवालयमें व्यवस्था हो, तो पैर धो लें । हाथमें जल लेकर `अपवित्र: पवित्रो वा’, ऐसा तीन बार बोलते हुए अपने संपूर्ण शरीरपर तीन बार जल छिडकें ।

४. किसी देवालयमें प्रवेश करनेसे पूर्व पुरुषोंद्वारा अंगरखा (शर्ट) उतारकर रखनेकी पद्धति हो, तो उस पद्धतिका पालन करें । (यद्यपि यह व्यावहारिक रूपसे उचित न लगे, तब भी देवालयकी सात्त्विकता बनाए रखने हेतु कुछ स्थानोंपर ऐसी पद्धति है ।)

५. देवालयमें दर्शन हेतु जाते समय पुरुष भक्तजनोंको टोपी तथा स्त्रीभक्तोंको पल्लूसे अपने सिरको ढकना चाहिए ।

६. देवालयके प्रवेशद्वार और गरुडध्वजको नमस्कार करें । प्रांगणसे देवालयके कलशका दर्शन करें एवं कलशको नमस्कार करें ।

 

२ आ. देवालयके प्रांगणसे सभामंडपकी ओर जाना

प्रांगणसे सभामंडपकी ओर जाते समय हाथ नमस्कारकी मुद्रामें हों । (दोनों हाथ अनाहतचक्रके स्थानपर जुडे हुए और शरीरसे कुछ अंतरपर हों ।) भाव ऐसा हो कि, `अपने परमश्रद्धेय श्री गुरुदेव या आराध्य देवतासे प्रत्यक्ष भेंट करने जा रहे हैं’ ।

 

२ इ. देवालयकी सीढियां चढना

देवालयकी सीढियां चढते समय दाहिने हाथकी उंगलियोंसे सीढीको स्पर्श कर हाथ अपने आज्ञाचक्रपर रखें ।

 

२ ई. सभामंडपमें प्रवेश करना

१. सभामंडपमें प्रवेश करनेसे पूर्व सर्वप्रथम सभामंडपके द्वारको दूरसे नमस्कार करें ।

२. सभामंडपकी सीढियां चढते समय दाहिने हाथकी उंगलियोंसे सीढीको स्पर्श कर हाथ आज्ञाचक्रपर रखें ।

३. सभामंडपमें पदार्पण करते समय प्रार्थना करें, `हे प्रभु, आपकी मूर्तिसे प्रक्षेपित चैतन्यका मुझे अधिकाधिक लाभ होने दें’ ।

 

२ उ. सभामंडपसे गर्भगृहकी ओर जानेकी पद्धति

सभामंडपकी बाईं ओरसे चलते हुए गर्भगृहतक जाएं । (देवताके दर्शनके उपरांत लौटते समय सभामंडपकी दाहिनी ओरसे आएं ।)

 

२ ऊ. देवता- दर्शनसे पूर्व आवश्यक कृति

१. जहांतक संभव हो घंटानाद न करें । यदि नाद करना ही हो तो, अति मंदस्वर में ऐसे भावसे करें मानो `घंटानादसे अपने आराध्य देवताको जगा रहे हों ।

२. शिवालयमें पिंडीके दर्शन करनेसे पूर्व नंदीके दोनों सींगोंको हाथ लगाकर नंदीके दर्शन करें ।

३. साधारणत: गर्भगृहमें जानेकी मनाही होती है; परंतु कुछ देवालयोंके गर्भगृहमें प्रवेशकी सुविधा है । ऐसेमें गर्भगृहके प्रवेशद्वारपर श्री गणपति हों, तो उन्हें नमस्कार करनेके उपरांत ही गर्भगृहमें प्रवेश करें ।

 

३. देवताकी मूर्तिके दर्शन करते समय आवश्यक कृतियां

१. देवताके दर्शन करते समय, देवताकी मूर्ति और उनके सामने प्रतिष्ठित कच्छपकी प्रतिमाके बीच तथा शिवालयमें पिंडी और उसके सामने प्रतिष्ठित नंदीकी प्रतिमाके बीच खडे न रहें और न ही बैठें । कच्छप अथवा नंदीकी प्रतिमा तथा देवताकी मूर्ति अथवा पिंडीको जोडनेवाली रेखाकी एक ओर खडे रहें ।

२. देवताके दर्शन करते समय पहले चरणमें देवताके चरणोंपर दृष्टि टिकाए, नतमस्तक होकर प्रार्थना करें । दूसरे चरणमें देवताके वक्षपर, अर्थात् अनाहतचक्रपर मन एकाग्र कर देवताको आर्त्तभावसे पुकारें । दर्शनके तीसरे अर्थात् अंतिम चरणमें देवताके नेत्रोंकी ओर देखें और उनके रूपको अपने नेत्रोंमें बसाएं ।

३. नमस्कार करते समय पुरुष सिर न ढकें (सिरसे टोपी हटाएं); परंतु स्त्रियां सिर ढकें ।

४. देवताको जो वस्तु अर्पित करनी हो, वह देवताके ऊपर न डालें; अपितु उनके चरणोंमें अर्पित करें । यदि मूर्ति दूर हो, तो `मूर्तिके चरणोंमें अर्पित कर रहे हैं’, ऐसा भाव रखकर उसे देवताके सामने रखी थालीमें रखें ।

 

४. देवताकी परिक्रमा लगाना

अ. परिक्रमा आरंभ करनेसे पूर्व गर्भगृहके बाह्य भागमें बाईं ओर खडे रहें । (परिक्रमा पूर्ण करनेपर दाहिनी ओर खडे होकर देवताके दर्शन करें ।)

आ. देवताकी परिक्रमा करनेसे पहले देवतासे प्रार्थना करें, `हे ….. (देवताका नाम) परिक्रमामें प्रत्येक पगके साथ आपकी कृपासे मेरे पूर्वजन्मोंके पापोंका शमन हो और आपसे प्रक्षेपित चैतन्यको मैं अधिकाधिक ग्रहण कर सकूं ।’

इ. परिक्रमा मध्यम गतिसे एवं नामजप करते हुए लगाएं ।

ई. परिक्रमाके दौरान गर्भगृहको बाहरसे स्पर्श न करें । देवताकी मूर्तिके पीछे रुककर नमस्कार करें ।

उ. साधारणत: देवताओंकी परिक्रमा सम संख्यामें (उदा. २, ४, ६) एवं देवीकी परिक्रमा विषम संख्यामें (उदा. १, ३, ५) करनी चाहिए । यदि अधिक परिक्रमाएं करनी हों, तो न्यूनतम परिक्रमाकी गुणाकार संख्यामें करें (उदा. न्यूनतम संख्या २ है, तो ४, ६, ८, १० परिक्रमाएं कर सकते हैं) ।

ऊ. प्रत्येक परिक्रमाके उपरांत देवताको नमन करके ही अगली परिक्रमा लगाएं ।

ए. परिक्रमा पूर्ण होनेपर शरणागतभावसे देवताको नमस्कार करें और तदुपरांत मानस प्रार्थना करें ।

 

५. तीर्थ और प्रसाद ग्रहण करना

अ. परिक्रमाके उपरांत दाहिने हाथसे तीर्थ प्राशन कर, वही हाथ आंखों, ब्रह्मरंध्र, मस्तक और गर्दनपर लगाएं ।

आ. प्रसादको दाहिने हाथमें लेते हुए नम्रतासे झुकें ।

इ. देवालयमें ही बैठकर कुछ समय नामजप करें और तदुपरांत प्रसाद ग्रहण करें ।

ई. खडे होकर देवताको मानस नमस्कार करें ।

उ. स्वच्छ वस्त्रमें लपेटकर प्रसाद घर ले जाएं ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘देवालयमें दर्शन कैसे करें ?’