१. देवताके चरणोंमें लीन भावसे नमस्कार करना
देवताके दर्शन करते समय उनके चरणोंमें लीन होनेका भाव रखें । उनके रूपको अपने नेत्रोंमें संजोनेका प्रयत्न करें । इससे शरीरके सभी अवधान देवताकी मूर्तिपर केंद्रित होते हैं, अपनी स्थूल देहका विस्मरण हो जाता है । साथ ही प्राणमयकोष तथा मनोमयकोषमें सत्त्वकणोंकी प्रबलता बढती है एवं अष्टसात्त्विक भाव जागृत होते हैं ।
२. देवताको नमस्कार करते समय पुरुषोंद्वारा सिरसे टोपी उतारना
देवताके प्रत्यक्ष दर्शनके समय टोपी धारण किए हुए पुरुष अपनी टोपी उतार दें । नमस्कार करते समय भ्रूमध्य अर्थात आज्ञाचक्रपर तथा छातीके पास अर्थात अनाहतचक्रपर हाथोंकी उंगलियोंका स्पर्श होता है । उस समय जो मुद्रा बनती है, उस कारण नमनकर्ताका आज्ञाचक्र जागृत हो जाता है – तथा छातीके पास अर्थात इस कारण शरीरमें सात्त्विकता अधिक मात्रामें प्रवेश कर सकती है । अनेक बार कुंडलिनीकी जागृतिके कारण सिरके माध्यमसे भी सत्त्वतरंगें शरीरमें आने लगती हैं । इन तरंगोंको ग्रहण करने हेतु पुरुष अपना सिर न ढकें ।
३. देवताको नमस्कार करते समय स्त्रियोंद्वारा अपना सिर आंचलसे ढकना
कुंडलिनीकी जागृतिके कारण सिरके माध्यमसे भी सत्त्वतरंगें शरीरमें आने लगती हैं; परंतु अनेक बार अनिष्ट शक्तियां इसका अनुचित लाभ उठानेका प्रयास करती हैं तथा वे सत्त्वतरंगोंमें काली शक्ति मिश्रित करती हैं । पुरुषोंकी अपेक्षा स्त्रियां अधिक संवेदनशील होती हैं तथा स्त्रियोंकी कुंडलिनीजागृतिकी क्षमता न्यून होती है । इसके कारण पुरुषोंकी तुलनामें स्त्रियोंपर काली शक्तिका प्रभाव एवं परिणाम अधिक होता है, तथा इससे उन्हें कष्ट हो सकता है । इसलिए स्त्रियां नमस्कार करते समय सिरपर आचल लें । इससे सिर तथा तरंगोंके बीच वस्त्रकी बाधा होती है तथा अनिष्ट स्पंदन शरीरमें प्रवेश नहीं कर पाते । इससे यह स्पष्ट होता है, कि ईश्वर प्रत्येक व्यक्तिका कितना ध्यान रखते हैं ।
४. कोई भी वस्तु देवताके चरणोंमें अर्पण करें
यदि मूर्ति दूर हो, तो ‘मूर्तिके चरणोंमें अर्पण कर रहे हैं’, ऐसा भाव रखकर देवताके सामने रखी थालीमें रखें; परंतु देवताके शरीरपर न फेंकें । कोई भी वस्तु देवताके चरणोंमें अर्पण करनेको कारण देवालयमें कुछ लोग दूरसे मूर्तिपर चढावन, उदा. पैसे, पुष्प आदि फेंकते हैं । उन्हें लगता है, कि, उनके द्वारा अर्पित वस्तु देवताके चरणोंमें गिरे; परंतु ऐसा करना अनुचित है । यदि हमें कुछ देते समय कोई वह वस्तु हमारे शरीरपर फेंके, तो क्या हमें अच्छा लगेगा ? हम किसी गरीब याचकका भी, कुछ फेंककर अपमान नहीं करते, उसके हाथोंमें कुछ रख देते हैं । ऐसेमें देवताके शरीरपर वस्तु फेंकना पूर्णतः अनुचित है ।
५. देवालयके गर्भगृहमें प्रवेश निषिद्ध होनेका कारण
कई देवालयोंके गर्भगृहमें दर्शनार्थियोंके लिए प्रवेश निषिद्ध होता है । इसका कारण यह है, कि ‘देवालयके गर्भगृहमें’ देवताका प्रमुख शक्तिस्रोत होता है । यहांसे सर्वत्र चैतन्य प्रक्षेपित होता है । यह चैतन्य सामान्य दर्शनार्थीको सहन नहीं होता । इसलिए सामान्यजनोंको गर्भगृहमें प्रवेश नहीं दिया जाता । इसके साथही सामान्य व्यक्तिके रज-तम प्रधान होनेके कारण गर्भगृहकी सात्त्विकता अल्प होनेकी आशंका रहती है ।
६. धर्मशास्त्रके अनुसार
मुख्य देवताके प्रत्यक्ष दर्शन करनेके उपरांत अग्निदेवताके दर्शन एवं सूर्यदेवताके दर्शन कर पुनः मुख्य देवताके दर्शन करते हैं । मुख्य देवताके दर्शनके उपरांत अग्निदेव एवं सूर्यदेवके दर्शन कर, पुन: मुख्य देवताके दर्शन करना । इसका प्रतीकात्मक अर्थ इस प्रकार है, प्रारंभमें मुख्य देवताके दर्शन करना अर्थात निर्गुण तत्त्वतक जाकर पुन: कनिष्ठ देवताके, अर्थात् अग्निदेव एवं सूर्यदेवके माध्यमसे सगुण कार्य करना, तदुपरांत मुख्य देवताके दर्शन करना अर्थात् मूल निर्गुण तत्त्वमें विलीन होना है । इसीको देवताका ‘अद्वैत-द्वैत सिद्धांत’ अथवा ‘ब्रह्मांडका एक चक्र’ कहते हैं । ‘अद्वैतसे द्वैतमें आना एवं पुन: अद्वैतमें जाना’, इस संपूर्ण चक्रके माध्यमसे ईश्वर ब्रह्मांडके लिए कार्य करते हैं ।’
संदर्भ – सनातनका ग्रंथ – ‘देवालयमें दर्शन कैसे करें ?’
ईश्वर का दर्शन करने के लिए आनेवालों की संख्या में हुई प्रचंड वृद्धि और समस्या...
देवालय का महत्त्व
देवालय की सात्त्विकता एवं भावपूर्ण दर्शन का महत्त्व
देवालयमें शिवजीके दर्शन कैसे करें ?
देवालयमें प्रवेश करनेसे पूर्व अपना सिर ढकें