देवालयमें शिवजीके दर्शन कैसे करें ?

सारिणी


१. देवालयके द्वार एवं नंदीके मध्यमें खडे रहकर दर्शन करनेका परिणाम

गर्भगृहमें विद्यमान ईश्वरीय सगुण-निर्गुण चैतन्यका प्रवाह एवं चैतन्यकण द्वारसे बाहर नंदीकी ओर प्रक्षेपित होते हैं । उसी प्रकार ईश्वरीय शक्तिके वेगवान प्रवाह एवं शक्तिके कण भी द्वारसे बाहर नंदीकी ओर प्रक्षेपित होते हैं । नंदी एवं शिवपिंडीके मध्यमें खडे होकर दर्शन करनेसे देवताकी शक्तिके कारण कोई कष्ट न हो, इस हेतु व्यक्तिमें विद्यमान तमोगुणका काला पट बनता है । यहां कष्टका अर्थ है, देवताकी शक्ति सहन न कर पाना । इस तमोगुणी पटके कारण देवतासे प्रक्षेपित चैतन्य एवं शक्तिके प्रवाहोंमें बाधा उत्पन्न होती है तथा रज-तमप्रधान तरंगें आडी-तिरछी प्रवाहित होने लगती हैं । दर्शनार्थीके अनाहत- चक्रके स्थानपर रज-तमोगुणी वलय कार्यरत होते हैं तथा उसका मन अस्थिर होता है । दर्शनार्थीके देहमें रज-तम कणोंका संचार होता है । आडी-तिरछी प्रवाहित होनेवाली रज-तमप्रधान तरंगोंसे वातावरणमें रज-तम कणोंका प्रक्षेपण होता है ।

 

२. देवालयमें शिवजीके दर्शन करनेसे पूर्व
नंदीकी बाईं ओरसे शिवजीको साष्टांग नमस्कार करना

गर्भगृहमें विद्यमान देवताकी प्रतिमासे सगुण-निर्गुण चैतन्यका वेगवान प्रवाह नंदीकी ओर प्रक्षेपित होता है । उसी प्रकार देवताकी प्रतिमासे सगुण-निर्गुण शक्तिका वेगवान प्रवाह तथा शक्तिके कण भी नंदीकी ओर प्रक्षेपित होते हैं । नंदीके चारों ओर निर्गुण तत्त्वका वलय भी विद्यमान रहता है । नंदीकी मूर्तिमें शक्तिका कार्यरत वलय उत्पन्न होता है । इस वलयका रूपांतर शीतल चैतन्यके वलयोंमें होता है । ये चैतन्यके वलय वातावरणमें प्रक्षेपित होते हैं । नंदीकी बाईं ओरसे दर्शन करनेसे दर्शनार्थीको इन वलयोंका लाभ होता है । नंदीकी बाईं ओर साष्टांग नमस्कार करनेसे व्यक्तिमें शरणागतभाव जागृत होता है तथा देवालयमें विद्यमान चैतन्य तरंगें उसके देहमें प्रवाहित होने लगती हैं । दर्शनार्थीके देहमें विद्यमान कुंडलिनीके चक्र कार्यरत होते हैं तथा इन चक्रोंके चारों ओर बना काला आवरण दूर होता है । इस प्रकार दर्शन करनेसे गर्भगृहके बाहर ही व्यक्तिके देहकी शुद्धि होती है एवं उसे गर्भगृहके चैतन्यका लाभ होता है ।

३. परिक्रमा लगाते समय देवताकी
मूर्तिके दर्शनीय भागसे दर्शनार्थीपर होनेवाला परिणाम

३अ. देवताकी मूर्तिमें अप्रकट रूपमें आनंद, शांति एवं निर्गुण तत्त्व, विद्यमान रहता है तथा शक्तिका कार्यरत वलय घूमता रहता है । गर्भगृहमें निर्गुण कणोंका प्रक्षेपण होता है । ब्रह्मांडसे देवताके निर्गुण तत्त्वसे देवालयके गर्भगृहमें विद्यमान मूर्तिकी ओर सगुण- निर्गुण स्तरपर चैतन्यका प्रवाह आकृष्ट होता है । ईश्वरसे प्रक्षेपित निर्गुण – सगुण प्रवाहसे देवताकी मूर्तिमें चैतन्यका वलय जागृत होकर वह कार्यरत रहता है । चैतन्यके इस वलयका सगुण-निर्गुण चैतन्यके वलयमें रूपांतर होता है तथा इस वलयसे वातावरणमें चैतन्यके प्रवाहोंका प्रक्षेपण होता है । गर्भगृहके बाहरके वातावरणमें चैतन्यके कणोंका प्रक्षेपण होता रहता है ।

३आ. ब्रह्मांडसे देवताके निर्गुण तत्त्वसे देवालयके गर्भगृहमें विद्यमान मूर्तिकी ओर सगुण-निर्गुण शक्तिका प्रवाह आकृष्ट होता है । इस कारण देवताकी मूर्तिके चारों ओर तारक शक्तिका कवच बनता है । ईश्वरसे प्रक्षेपित सगुण-निर्गुण प्रवाहसे देवताकी मूर्तिमें शक्तिका वलय जागृत होकर वह कार्यरत रहता है। देवताकी मूर्तिको देखनेसे परिक्रमा करनेवालेमें भावका वलय जागृत होता है । देवताकी मूर्तिमें विद्यमान चैतन्यके वलयोंद्वारा परिक्रमा करनेवालेकी ओर चैतन्यके सगुण-निर्गुण प्रवाहका प्रक्षेपण होता है । उसी प्रकार शक्तिके सगुण-निर्गुण प्रवाहका भी व्यक्तिकी ओर प्रक्षेपण होता है । इन प्रवाहोंके माध्यमसे वातावरणमें चैतन्यके एवं शक्तिके कणोंका प्रक्षेपण होता है । व्यक्तिके देहपर बना काला आवरण दूर होता है और वह देवतासे प्रक्षेपित चैतन्य ग्रहण कर पाता है ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘देवालयमें दर्शन कैसे करें ?’

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