स्वयंभू गणेशमूर्ति

श्री विघ्नेश्‍वर, श्री गिरिजात्मज एवं श्री वरदविनायक की मूर्तियां स्वयंभू हैं । बनाई गईं श्री गणेशमूर्ति की तुलना में स्वयंभू गणेशमूर्ति में चैतन्य अधिक होता है । स्वयंभू गणेशमूर्ति द्वारा वातावरणशुद्धी का कार्य अनंत गुना अधिक होता है ।

माघी श्री गणेश जयंती (Ganesh Jayanti 2026)

गणेशलहरी जिस दिन प्रथम पृथ्वी पर आई, अर्थात जिस दिन गणेशजन्म हुआ, वह दिन था माघ शुद्ध चतुर्थी । तब से गणपति का और चतुर्थी का संबंध जोड दिया गया । माघ शुक्ल पक्ष चतुर्थी ‘श्री गणेश जयंती’ के रूप में मनाई जाती है ।

कुछ विशिष्ट उद्देश्यों के लिए श्री गणेशजी की उपासना करते समय पठने आवश्यक मंत्र !

‘हमारे जीवन में कहीं तो न्यूनता है अथवा हमारी इच्छा अपूर्ण है’, ऐसा लगना, इसे उच्छिष्ट कहा जाता है ।

मयूरेशस्तोत्रम्

यह स्तोत्र साक्षात् ब्रह्माजी ने ही कहा है । इसकी फलश्रुति का वर्णन गणेश भगवान ने इसप्रकार किया है – ‘इससे कारागृह के निरपराध कैदी ७ दिनों में मुक्त हो जाते हैं । स्तोत्र भावपूर्ण कहने से फलनिष्पति मिलती है ।

श्री गणपति अथर्वशीर्ष

‘गणपति अथर्वशीर्ष’ यह श्री गणेश का दूसरा सर्वपरिचित स्तोत्र है । ‘अथर्वशीर्ष’ का ‘थर्व’ अर्थात ‘उष्ण.’ अथर्व अर्थात शांति’ एवं ‘शीर्ष’ अर्थात ‘मस्तक’ । जिसके पुरश्‍चरण से शांति मिलती है, वह है ‘अथर्वशीर्ष’ ।

चतुर्थी तिथि का महत्त्व तथा गणेशजी के विविध अवतारों के नाम एवं उनका कार्य

‘चतुर्थी’ तिथि के देवता श्री गणेशजी हैं; क्योंकि वे विघ्न दूर करनेवाले हैं । हमारी संस्कृति में श्रीगणेश एवं श्रीसरस्वती, इन दोनों देवताओं का बुद्धिदाता देवता के रूप में वर्णन है; परंतु इन दोनों देवताओं के कार्य भिन्न हैं ।

श्रीगणेशजी को अडहुल के पुष्प अर्पण करें

देवताओंको पुष्प अर्पित करनेका मुख्य उद्देश्य : देवताओंसे प्रक्षेपित स्पंदन मुख्यतः निर्गुण तत्त्वसे संबंधित होते हैं । देवताओंको अर्पित पुष्प तत्त्व ग्रहण कर पूजकको प्रदान करते हैं, जिससे पुष्पमें आकर्षित स्पंदन भी पूजकको मिलते हैं । 

गणेशपूजनमें दूर्वाका विशेष महत्त्व

दुः + अवम्, इन शब्दोंसे दूर्वा शब्द बना है । ‘दुः’ अर्थात दूरस्थ एवं ‘अवम्’ अर्थात वह जो पास लाता है । दूर्वा वह है, जो श्री गणेशके दूरस्थ पवित्रकोंको पास लाती है ।

श्री गणेशजी का कार्य, विशेषताएं एवं उनका परिवार

विभिन्न साधनामार्गों के संत विभिन्न देवताओं के उपासक होते हैं, फिर भी सब संतों ने श्री गणेश की शरण जाकर याचना की है, उनका भावपूर्ण स्तवन किया है । सर्व संतों के लिए श्री गणेश अति पूजनीय देवता रहे ।