नगर जनपद के श्रद्धास्थान २०० वर्ष प्राचीन ‘श्री विशाल गणपति’ !

महाराष्ट्र में स्थित ‘नगर’ शहर के ‘ग्रामदेवता’ मालीवाडा के श्री सिद्धिविनायक का मंदिर विशाल और बहुत जागृत है । यह मंदिर २०० वर्ष पुराना है । ये, भक्तों की मनोकामना पूर्ण करनेवाले देवता के रूप में प्रसिद्ध हैं । यह मूर्ति साढे ग्यारह फुट ऊंची, पूर्वाभिमुखी और दाएं सूंड की है ।

मयूरेशस्तोत्रम्

यह स्तोत्र साक्षात् ब्रह्माजी ने ही कहा है । इसकी फलश्रुति का वर्णन गणेश भगवान ने इसप्रकार किया है – ‘इससे कारागृह के निरपराध कैदी ७ दिनों में मुक्त हो जाते हैं । स्तोत्र भावपूर्ण कहने से फलनिष्पति मिलती है ।

श्री गणेशजी के स्तोत्र !

‘गणपति अथर्वशीर्ष’ यह श्री गणेश का दूसरा सर्वपरिचित स्तोत्र है । ‘अथर्वशीर्ष’ का ‘थर्व’ अर्थात ‘उष्ण.’ अथर्व अर्थात शांति’ एवं ‘शीर्ष’ अर्थात ‘मस्तक’ । जिसके पुरश्‍चरण से शांति मिलती है, वह है ‘अथर्वशीर्ष’ ।

स्वयंभू गणेशमूर्ति

श्री विघ्नेश्‍वर, श्री गिरिजात्मज एवं श्री वरदविनायक की मूर्तियां स्वयंभू हैं । बनाई गईं श्री गणेशमूर्ति की तुलना में स्वयंभू गणेशमूर्ति में चैतन्य अधिक होता है । स्वयंभू गणेशमूर्ति द्वारा वातावरणशुद्धी का कार्य अनंत गुना अधिक होता है ।

अष्टविनायक

सिद्धटेक का श्री सिद्धीविनायक भीमा नदी पर बसे अष्टविनायकों का स्वयंभू स्थान है । इसका गर्भगृह की लंबाई-चौडाई काफी है । इसके साथ ही मंडप भी बडा और प्रशस्त है । पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होळकर ने जीर्णोद्धार कर मंदिर बनाया था ।

भक्तों के मन में भाव एवं भक्ति निर्माण करनेवाले कळंब (जिला यवतमाळ) के प्रसिद्ध श्री चिंतामणी की महिमा !

यवतमाळ-नागपुर राज्य महामार्ग पर यवतमाळ से २३ कि.मी. के अंतर पर श्री क्षेत्र कळंब गांव के प्रसिद्ध श्री चिंतामणी मंदिर लाखों भाविकों के श्रद्धास्थान हैं । इस प्रसिद्ध श्री चिंतामणी मंदिर के विषय में तथा श्री चिंतामणी की आख्यायिका जान लेते हैं ।

थेऊर में स्थापित चिंतामणि गणपति (अष्टविनायकों में से एक) !

आकाशवाणी द्वारा हुए आदेश से महर्षि गृत्समद ने विदर्भ छोडकर पुणे जिले के थेऊर को अपनी कार्यभूमि के रूप में चुना और तपश्‍चर्या प्रारंभ की । बारह वर्षों की तपस्या के उपरांत भगवान गणेश प्रकट हुए और उन्होंने महर्षि गृत्समद को अनेक वरदान दिए । उसी स्थान पर महर्षि गृत्समद ने श्री गणेश की स्थापना की ।

मोरगांव के मयुरेश्‍वर : भूलोक में अधिक आनंद देनेवाले स्थान !

ब्रह्मदेव के कमंडल का पानी नीचे पृथ्वी पर छलका और कर्हा नामक नदी का उदय हुआ । इस नदी के किनारे मयुरेश्‍वर आदि क्षेत्र अत्यंत प्राचीन काल से बसा है । मोरगांव के गणपति के रूप में विख्यात क्षेत्र पुणे जिले में आता है । यह क्षेत्र अविनाशी है ।

राजस्थान में सवाई माधोपुर के त्रिनेत्र श्री गणेश मंदिर की विशेषताएं

समुद्र की सतह से २ सहस्र फुट की ऊंचाई पर रणथंभोर के जंगल की एक पहाडी के किनारे से यह स्वयंभू गणपति प्रकट हुआ है । श्री गणेश की मूर्ति पूर्ण न होकर पहाडी से बाहर आए भाग में श्री गणेश का केवल मुख और सूंड का भाग हमें दिखाई देता है ।

ईश्‍वर की साक्ष देनेवाला चित्तूर (आंध्रप्रदेश) का कनिपकम् विनायक मंदिर !

आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले के कनिपकम् विनायक मंदिर का यह स्वयंभू गणेशमूर्ति अनेक आख्यायिकाआें के कारण जगभर में प्रसिद्ध है । बताया जाता है कि चोल वंश के राजा ने ११ वीं शताब्दी में यह मंदिर बनवाया था । विजयनगर के राजा ने वर्ष १३३६ में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया ।

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