चतुर्थी तिथि का महत्त्व तथा गणेशजी के विविध अवतारों के नाम एवं उनका कार्य

१. शास्त्रकारों द्वारा सूर्य एवं चंद्रमा के परिणाम के अनुसार प्रत्येक तिथि के
देवता सुनिश्‍चित किए जाना और इसमें ‘चतुर्थी’ तिथि के देवता श्री गणेशजी होना


shriganapati

श्री गणेश

 

ज्योतिषशास्त्र एवं धर्मशास्त्र के अनुसार सूर्य प्राणशक्ति का और चंद्रमा मनःशक्ति का कारक होता है । सूर्य एवं चंद्रमा के कारण तिथियां बनती हैं । उनके भ्रमण के कारण अलग-अलग कोण बनते हैं । अमावस्या को चंद्रमा सूर्यकक्षा में विलीन होता है । पूर्णिमा के दिन दोनों ही एक-दूसरे के सामने १८० अंश में समरेखापर होते हैं । सूर्य एवं चंद्रमा के परिणाम के अनुसार शास्त्रकारों ने प्रत्येक तिथि के देवी-देवता सुनिश्‍चित किए हैं ।

उसमें ‘चतुर्थी’ तिथि के देवता श्री गणेशजी हैं; क्योंकि वे विघ्न दूर करनेवाले हैं । हमारी संस्कृति में श्रीगणेश एवं श्रीसरस्वती, इन दोनों देवताओं का बुद्धिदाता देवता के रूप में वर्णन है; परंतु इन दोनों देवताओं के कार्य भिन्न हैं । गणेशजी की कृपा से बुद्धि एवं ज्ञान बढता है, जबकि सरस्वतीजी की उपासना से प्राप्त ज्ञान को शब्दों के रूप में व्यक्त किया जा सकता है । इसलिए उन्हें ‘वाक्विलासिनी’ कहा गया है ।

 

२. गणेशजी के अलग-अलग अवतार एवं उन प्रत्येक अवतार का नाम और कार्य

अवतार का नाम अवतार का स्वरूप अवतार का कार्य
१. वक्रतुण्ड तेजःपुंज, शुंडधारी (सूंडवाले), सर्वांग को सिंदुर लेपित एवं क्रूर परिधान किए हुए सृष्टि-निर्माण के कार्य में जब विघ्न आने आरंभ हुए, तब ब्रह्माजी ने उनकी उपासना की, तब वे प्रकट हुए और उन्होंने सृष्टि निर्माण के कार्य को निर्विघ्नरूप से संपन्न होने दिया ।
२. कपिल चिंतामणी सिंहपर विराजमान; दिव्य आभूषण धारण किए हुए चतुर्भुज; हाथ में कमल, मोदक एवं गदा-परशु आदि शस्त्रधारी । कपिल मुनि के अनुष्ठान से यज्ञ से उत्पन्न होने के कारण उनका नाम ‘कपिल’ है । यह एक विशेषण है, जिसका अर्थ लाल सा (ब्राऊन) रंग ! उनके आकार का रूप बनानेपर ‘कपिला’ गाय दिखाई देती है । गाय का दूध, दही, गोमुत्र आदि सभी पदार्थ मनुष्य के लिए हितकारी होते हैं । उसी प्रकार से बुद्धिरूपी दही, ज्ञानरूपी घी आदि बातें मनुष्य को बुद्धि प्रदान कर सुदृढ बनाते हैं; इसलिए उनका ‘कपिला’ नाम सार्थक है । द्रविड देश के राजा अभिजीत और उनकी पत्नी गुणवती के पुत्र हैं । उसने गणदैत्य का वध कर कपिल ऋषि को ‘चिंतामणि’ नामक रत्नमणि लाकर दी । जिसे ऋषि ने उसी मणि को अपने कंठ में धारण किया और उसका नाम चिंतामणि रखा ।
३. गजानन भगवान शिव-पार्वतीजी के पुत्र ! इनका जन्म भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी को हुआ । गजासुर का मस्तक उडाने से उनका नाम ‘गजानन’ है । वे पीत वस्त्र, चतुर्बाहु, साथ ही सिद्धि से युक्त एवं मुकुट-कुंडल, दिव्य आयुध आदि धारण किए हुए हैं । इन्होंने सिंदुरासुर का वध किया । इस असुर की मृत्यु शस्त्र से न होने से उसका मर्दन कर और उसका चूर्ण बनाकर उसका वध किया । उन्होंने अपने शरीर को यह चूर्ण (सिंदूर) लगाया । तब से उन्हें सिंदूर प्रिय है ।
४. विघ्नेश्‍वर वरेण्य राजा एवं पुष्पिका के पुत्र ! पार्श्‍वमुनि के आश्रम में उनका संगोपन हुआ । उनका वाहन मूषक है । वे गजमुख एवं चतुर्भुज हैं तथा उनकी कांति दिव्य है । पाश, अंकुश, परशु एवं कमल उनके आयुध हैं । इन्होंने विघ्नासुर को शरणागत होने के लिए बाध्य बनाया । उसकी प्रार्थना के कारण उन्होंने ‘विघ्नराज’ नाम धारण किया ।
५. बल्लाळेश्‍वर वे दिव्य भीमस्वरूप धारण किए हुए एवं १० हाथोंवाले हैं तथा उनका रूप भयानक है । उनके दाहिने हाथ में पाश, अंकुश, परशु, कमल एवं चक्र; तो बाएं हाथ में गदा, खडग, त्रिशुल एवं डमरू हैं । शंखासुर एवं उसके भाई कमलासुर ने वेद आदि ग्रंथ लूट लिए । गजाननजी ने बल्लाळ नामक ब्राह्मण के वेश में प्रकट होकर वेदविद्या का उद्धार किया । आगे जाकर उन्होंने दशभुज (१० हाथोंवाला) रूप धारण कर कमलासुर का वध किया और मयुरेश्‍वर क्षेत्र की स्थापना की ।
६. धुमकेतू वे माधव एवं दुमरा के पुत्र हैं । वे रक्तवर्णी (लाल रंग के), दिव्य कांतिवाले, चतुर्बाहु एवं त्रिनेत्री (३ आंखोंवाले) हैं । उनके वस्त्र श्‍वेत हैं तथा उनके मस्तकपर मुकुट-कुंडल हैं । उन्होंने कमल, परशु, मोदक, साथ ही मोतियों की माला धारण की हैं । वे शुंडधारी, एकदंत एवं शूर्पकर्ण (सूप जैसे कान)वाले हैं । उन्होंने धूम नामक दैत्य का वध किया । उन्होंने विशाल मुख फैलाकर धूम को उसके सैन्यसहित निगल लिया । उससे उन्हें ‘धूमकेतू’ नाम पडा ।
७. गणेश त्रिपुरासुर का वध करने हेतु भगवान शिवजी ने एकाक्षर मंत्र की उपासना की । शिवजी के मुख से देवता प्रकट हुए । तब गणेशजी भी प्रकट हुए । वे पीतवर्णी, दशहस्तोंवाले और रत्नमौक्तिकधारी हैं । इन्होंने शिवजीपर प्रसन्न होकर उन्हें त्रिपुरासुर के वध का सामर्थ्य प्रदान किया ।

अभीतक अनेक बार गणेशजी की उत्पत्ति एवं लय हो चुके हैं । प्रत्येक बार गणेशजी ने उस प्रसंग के अनुरूप अवतार धारण किए हैं । इन अवतार चरित्रों में भिन्नता लगती है अथवा दिखाई देती है; परंतु वे सत्य हैं; क्योंकि व्यासजी ने उनका वर्णन किया है । श्रद्धा के साथ गणेशजी की उपासना करने से आज भी उसका फल मिलता है । अतः श्रद्धा के कारण भी मनुष्य का कल्याण होगा ।’

(संदर्भ : मासिक ‘विवेक’ १८.९.२००५)

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