कुछ विशिष्ट उद्देश्यों के लिए श्री गणेशजी की उपासना करते समय पठने आवश्यक मंत्र !


Shriganapati
 

श्री गणपति

 

१. संतान गणेश

संतान प्राप्ति हेतु इस गणेशजी से प्रार्थना की जाती है ।

१ अ. प्रार्थना करते समय करना आवश्यक मंत्र का पाठ

सन्तानगणपतये नमः ।

 

२. उच्छिष्ट गणपति

‘हमारे जीवन में कहीं तो न्यूनता है अथवा हमारी इच्छा अपूर्ण है’, ऐसा लगना, इसे उच्छिष्ट कहा जाता है । इस गणेशजी के पूजन से अपने सभी इच्छित बातों की आपूर्ति होती है । उसी प्रकार ऋणमुक्ति, निर्धनता का नाश, निरंतर आर्थिक एवं व्यावसायिक उन्नति, लक्ष्मीप्राप्ति, साथ ही आई हुई संपत्ति का योग और विनियोग, ये सभी इच्छाएं उच्छिष्ट गणेशजी की साधना से पूर्ण होती हैं । सामान्यरूप से किसी भी बुधवार अथवा गणेश चतुर्थी के दिन इसकी साधना करना अच्छा होता है ।

२ अ. गणेशजी की आराधना का मूलमंत्र

‘ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नोदन्ती प्रचोदयात ॥

 

३. विघ्नहर्ता गणेश

‘संकट में फंसे भक्त को विघ्नमुक्त करना’, इस गणेश उपासना का उद्देश्य है । इस गणेशजी की प्रतिमा अपने घर में लगाकर उनका आवाहन एवं पूजन करने से वे भक्त की सहायता के लिए दौडे चले आते हैं ।

३ अ. गणेशजी की आराधना का मंत्र

‘ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नोविघ्नः प्रचोदयात् ॥’

 

४. चिंतामणि गणेश

आज प्रत्येक व्यक्ति को भले वह धनवान हो अथवा निर्धन, उसे कोई न कोई चिंता तो होती ही है । ‘मुझे कोई चिंता नहीं’, ऐसा कहनेवाला व्यक्ति मिलना असंभव ! व्यक्ति कई चिंताओं से ग्रस्त होता है । किसी को व्यापकार, अध्ययन, संपत्ति, स्वास्थ्य, विवाह अथवा संतानप्रास्ति आदि चिंताएं होती हैं, तो किसी को अपने बच्चों के भविष्य की चिंता होती है । ऐसी चिंताओं के निर्मूलन हेतु हमें चिंतामणि गणेशजी की आराधना करनी चाहिए ।

४ अ. आराधना का मंत्र

इसके लिए ॐ नमो विघ्नहराय गं गणपतये नमः । मंत्र का ११ बार जाप करें ।

 

५. विद्याप्रदाता गणेशजी

जिस घर में उद्दंड बच्चे हैं, जिन बच्चों का अध्ययन में ध्यान नहीं लगता और किए हुए अध्ययन का स्मरण नहीं रहका, उस घर के परिवार के प्रमुख को अपने प्रवेशद्वारपर किसी शुभमुहूर्तपर विद्याप्रदाना गणेशजी की मूर्ति की स्थापना करनी चाहिए ।

५ अ. मूर्ति की प्रतिष्ठापना के पश्‍चात पठने आवश्यक मंत्र

‘ॐ ज्ञानरूपाय नमः ।, ‘ॐ विद्यानिर्हाय नमः । और ‘ज्ञानमुद्रावते नमः ।

(संदर्भ : मासिक ‘विवेक’, १८.९.२००५)
  • श्री गणेशजी के २ स्तोत्र सुपिरिचित हैं । उनमें से एक है संकष्टनाशन स्तोत्र ! देवर्षि नारदजी ने इस स्तोत्र की रचना की है । इसमें गणेशजी के १२ नामों का स्मरण किया गया है । इस स्तोत्र का पठन सुबह, दोपहर और सायंकाल में करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं । 
  • गणपति अथर्वशीर्ष’ यह श्री गणेशजी का दूसरा स्तोत्र सुपरिचित है । ‘अथर्वशीर्ष’ में से ‘थर्व’ का अर्थ है ‘शांति’ और ‘शीर्ष’ का अर्थ ‘मस्तक’ । जिसके पुरश्‍चरण से शांति मिलती है, वह है अथर्वशीर्ष ! इस स्तोत्र की रचना गणकऋषि ने की है । अथर्वशीर्ष में आरंभ में श्री गणेशजी की स्तुति की गई है और उसके पश्‍चात उसका ध्यान किया गया है । अथर्वशीर्ष का पाठ करने से सभी विघ्न दूर होते हैं और सभी पापों से मुक्ति मिलती है, साथ ही धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है । 

Leave a Comment