भोजन बनाते समय विविध कृतियों में कैसा भाव रखें ?

कहते हैं ‘जैसा अन्न, वैसा मन’। अर्थात भोजन बनाते समय हमारे मन में जैसा भाव होगा, वैसा ही भाव खानेवाले के मन में भी निर्माण होता है । यदि हम भावपूर्ण भोजन बनाएंगे, तो वह भोजन प्रसाद स्वरूप होगा । इसलिए अब हम अपनी रसोई बनाते समय कैसा भाव रखेंगे, यह देखते हैं ।

प्राणायाम, व्यायाम और योगासन कर शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढाएं !

नियमित रूप से प्राणायाम, व्यायाम और योगासन कर शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढाएं और आपातकाल का सामना करने के लिए अपने शरीर और मन की तैयारी करें !

नवविधा भक्ति : दास्य भक्ति

ईश्वर को मन से स्वामी स्वीकार कर स्वयं को उनका दास समझना दास्य भक्ति है । ईश्वर की सेवा कर प्रसन्न होना । भगवान को अपना सर्वस्व मान लेना ‘दास्य भक्ति’ कहलाता है ।

स्वामी विवेकानंद

वर्तमान लेख में, हमने स्वामी विवेकानंद द्वारा प्रदान की गई सेवा, गुरु के प्रति उनके दृष्टिकोण, गुरुकृपा के महत्व और गुरुकृपा और गुरुकृपा के कारण व्यक्तिगत लक्ष्य को कैसे पूरा किया, इस पर चर्चा की है।

स्वामी विवेकानंद के समाज को प्रबुद्ध करनेवाले वचन !

भयंकर दोष उत्पन्न करनेवाली आज की शिक्षा पद्धति की तुलना में मनुष्य का चारित्र बनानेवाली शिक्षा देना क्यों आवश्यक है, इसपर स्वामी विवेकानंद के अमूल्य विचार हम प्रस्तुत लेख में जानेंगे ।

युवावस्था में सन्यासाश्रम की दीक्षा लेकर हिन्दू धर्म का प्रचारक बने तेजस्वी और ध्येयवादी स्वामी विवेकानंद

धर्मप्रवर्तक, दार्शनिक, विचारक, वेदान्तमार्गी राष्ट्रसंत आदि विविध रूपों में विवेकानंद का नाम पूरे विश्व में प्रसिद्ध है । भरी युवावस्था में संन्यास की दीक्षा लेकर हिन्दू धर्म का प्रचारक बने तेजस्वी एवं ध्येयवादी व्यक्तित्त्व थे, स्वामी विवेकानंद ।

रवि ग्रह का तुला राशि में होनेवाला प्रवेश, उसका प्रभाव एवं उस काल में की जानेवाली सूर्योपासना !

सूर्योपासना करना, अर्थात तेजतत्त्व की उपासना करना । सूर्य की उपासना के कारण सात्त्विकता एवं चैतन्य ग्रहण करने की क्षमता बढती है ।

थियोसोफिस्टों के हिन्दुत्व विरोध पर बेधडक बोलनेवाले स्वामी विवेकानंद !

इंग्लैंड और अमेरिका में मेरे छोटे-से कार्य को ‘थियोसोफिस्ट’ लोगों ने सहायता की, यह समाचार सर्वत्र फैलाया जा रहा है । आपको यह स्पष्ट बताना चाहता हूं कि यह समाचार पूर्णत: असत्य है ।

धर्मांतरितों के शुद्धीकरण पर स्वामी विवेकानंद के विचार !

धर्मांतरित हिन्दुओं और मूलतः अहिन्दुओं के शुद्धीकरण पर ‘प्रबुद्ध भारत’ पत्रिका के प्रतिनिधि ने वर्ष १८९९ में स्वामी विवेकानंद से वार्तालाप किया था ।

स्वामी विवेकानंद के समान ज्वलंत धर्माभिमान धारण करें !

एक बार जब स्वामीजी अपने शिष्यों के साथ कश्मीर गए थे, तब उन्हें वहां क्षीर भवानी मंदिर के भग्नावशेष दिखाई दिए । उन्होंने बहुत दुखी होकर अपनेआप से पूछा, जब यह मंदिर भ्रष्ट और भग्न किया जा रहा था, तब लोगों ने प्राणों की बाजी लगाकर प्रतिकार क्यों नहीं किया ?