आपातकाल में जीवनरक्षा हेतु आवश्यक पूर्वतैयारी : भाग – १

आपातकाल से पार होने के लिए साधना सिखानेवाली सनातन संस्था !

अखिल मानवजाति को आपातकाल में जीवित रहने के लिए
पूर्वतैयारी के विषय में मार्गदर्शन करनेवाले एकमेव परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी !

 

१. कोरोना विषाणुरूपी आपदा अर्थात भावी महाभीषण आपातकाल की छोटी-सी झलक !

‘जनवरी २०२० से ‘कोरोना’ विषाणु ने पूरे विश्‍व में हाहाकार मचा दिया है । यातायात बंदी (लॉकडाऊन) का पालन करना पड रहा है । जिसके कारण उद्योग-व्यापार पर दुष्परिणाम होकर, आर्थिक मंदी भी आई है । ‘कोरोना’ के कारण अत्यधिक जीवित एवं वित्त हानि हो रही है । कोरोना संसर्ग का निरंतर भय रहने के कारण सर्वत्र मुक्त संचार करना, अस्पताल में जाकर उपचार लेना इत्यादि कठीन लग रहा है । सभी ओर एक प्रकार से तनाव और भय का वातावरण है । अक्टूबर २०२० की यह स्थिति देखकर ‘कोरोना’ आपदा महाभीषण आपातकाल की छोटी-सी झलक लग रही है ।

 

२. भावी महाभीषण आपातकाल के स्वरूप का संक्षिप्त वर्णन

विश्‍वयुद्ध, भूकंप, विकराल बाढ आदि के रूप में महाभीषण आपातकाल तो अभी आना शेष है । यह महाभीषण आपातकाल निश्‍चित आएगा, यह बात अनेक नाडीभविष्यकारों और द्रष्टा साधु-संतों ने बहुत पहले ही बता दी है । उन संकटों की आहट अब सुनाई देने लगी है । ‘कोरोना’ विषाणुरूपी संकट चीन के कारण उत्पन्न हुआ है, यह कहते हुए अमेरिका सहित कुछ यूरोपीय देशों ने चीन के विरुद्ध ताल ठोंकना आरंभ कर दिया है । तात्पर्य यह कि विश्‍वयुद्ध अब निकट आता दिखाई दे रहा है । यह भीषण आपातकाल कुछ दिनों का अथवा महीनों का नहीं, अपितु वर्ष २०२० से २०२३ तक तीन वर्षों का होगा । अर्थात, यह काल भारत में ‘हिन्दू राष्ट्र’ (ईश्‍वरीय राज्य के समान आदर्श राज्य) की स्थापना होने तक रहेगा । आपातकाल में बिजली की आपूर्ति ठप हो जाती है । पेट्रोल, डीजल आदि की आपूर्ति घट जाती है । इससे यातायात ठप हो जाता है । यातायात ठप होने से शासन सब स्थानों पर सहायता नहीं पहुंचा पाता । शासन के अन्य कार्यों में भी बहुत बाधाएं आती हैं । रसोई-गैस, खाने-पीने की वस्तुएं आदि अनेक महीने नहीं मिलती या राशन की दुकानों पर मिलती हैं । डॉक्टर, वैद्य, औषधियां, चिकित्सालय आदि की उपलब्धता कठिन होती है । ये सब बातें ध्यान में रखकर आगामी आपातकाल का सामना करने के लिए सबको शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, आध्यात्मिक आदि स्तरों पर पहले से तैयारी करनी आवश्यक है ।

 

३. शारीरिक स्तर पर तैयारी

‘अन्न’, जीवित रहने की एक मूलभूत आवश्यकता है । आपातकाल में हमेें भूखा न रहना पडे, इसके लिए पहले से पर्याप्त मात्रा में अन्न खरीदकर रखना आवश्यक है । हमारी वर्तमान पीढी को विविध प्रकार के अन्न संचय करने और उन्हें दीर्घकाल तक उत्तम स्थिति में रखनेवाली पद्धतियों की जानकारी नहीं होती । इसलिए हमने कुछ अन्नसुरक्षा पद्धतियों के विषय में इस लेखमाला में बताया है । अन्नसंग्रह कितना भी करें, वह धीरे-धीरे समाप्त होता ही रहता है । ऐसे समय में अन्न के लिए तरसना न पडे, इस हेतु पूर्वतैयारी के रूप में अन्न की बोआई करना आवश्यक है । धान, गेहूं, मोटे अनाज सब लोग बोने में सक्षम नहीं होते । ऐसे लोग कंद-मूल, अल्प पानी में अधिक उपज देनेवाली तथा बारहों महीने उत्पन्न होनेवाली सब्जियां और बहु उपयोगी फलदार वृक्ष घर के परिसर में तथा सदनिका (फ्लैट) के बारजे में लगा सकते हैं । इस विषय में उपयोगी जानकारी लेखमाला में दी गई है ।

आपातकाल में भोजन पकाने के लिए ‘गैस’ आदि साधन उपलब्ध न होने पर चूल्हा, ‘सौर कूकर’ आदि का उपयोग करनेके विषय में बताया गया है । आपातकाल में नित्य की भांति सब प्रकार का भोजन नहीं बनाया जा सकता । इस दृष्टि से कौन-कौन से टिकाऊ खाद्यपदार्थों का संग्रह करना चाहिए और उन्हें अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए क्या करना चाहिए, इस विषय में उपयोगी सूचना बताई गई है । परिवार को लगनेवाले नित्य उपयोग की तथा कभी-कभी लगनेवाली वस्तुओं की सूची भी दी गई है । इससे, पाठकों को सब प्रकार की वस्तुएं खरीदने में सुविधा होगी । मनुष्य पानी के बिना जीवित नहीं रह सकता तथा बिजली के बिना जीवनयापन की कल्पना नहीं कर सकता । अतएव, पेयजल की व्यवस्था करना, जलभंडारण, जलशुद्धीकरण की पद्धतियां तथा बिजली के विकल्प के विषय में भी इस लेखमाला में बताया गया है । लेखमाला में एक विषय से संबंधित अनेक प्रकार की व्यवस्थाएं बताई गई हैं । प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकता, स्थान की उपलब्धता, आर्थिक स्थिति, स्थानीय जलवायु, भौगोलिक स्थिति आदि का विचार कर, अपने लिए सुविधाजनक व्यवस्था बना सकता है । जहां प्रत्यक्ष व्यवस्था बनाने के विषय में विस्तार से बताना संभव नहीं है, वहां केवल निर्देश किया गया है; उदा. ‘आपातकाल में पानी की उपलब्धता अल्प न हो, इसके लिए कुआं खोदें’, यह कहा गया है; परंतु इसके लिए ‘प्रत्यक्ष क्या करना चाहिए’, यह नहीं बताया गया है । ऐसे कार्यों के विषय में पाठक उस विषय के जानकार लोगों से बात करें अथवा उससे संबंधित पुस्तक का अध्ययन करें ।

 

४. मानसिक तैयारी

आपातकाल में अनेक लोगों को घबडाना, चिंता होना, निराश होना, भय लगना आदि कष्ट होते हैं । प्रतिकूल परिस्थिति का धैर्य से सामना करने के लिए मन को पहले से दृढ करना पडता है तथा इसके लिए उसे ‘स्वसूचना’ देनी पडती है । इस विषय में भी इस लेखमाला में बताया गया है ।

अधिक जानकारी के लिए पढें : प्रतिकूल परिस्थिति में बिना घबराए आगे बताई सूचना मन को देकर आत्मबल बढाएं !

 

५. आध्यात्मिक तैयारी

आपातकाल में रक्षा होने के लिए व्यक्ति अपने बल पर कितनी भी तैयारी कर ले, पर्याप्त नहीं होती । अंततः, ईश्‍वर पर भरोसा करना ही पडता है । व्यक्ति जब साधना कर देवता की कृपा प्राप्त कर लेता है, तब देवता उसकी प्रत्येक संकट में रक्षा करते हैं । साधना करने का महत्त्व समझने के लिए भी यह लेखमाला उपयोगी है ।

 

६. साधको, अपने को सब प्रकार से शीघ्र तैयार करो !

पाठकगण यदि इस लेखमाला के अनुसार अभी से कार्य आरंभ कर देंगे, तो भावी आपातकाल को झेलना सरल हो सकेगा । पाठकगण यह विषय अपने तक सीमित न रखकर, समाजबंधुओं को भी बताएं । लेखमाला के कुछ बिंदुओं पर लेखन अभी भी जारी है । पाठकगण अपनी आपातकालीन तैयारी में शीघ्र लग जाएं, इसके लिए यह लेखमाला आरंभ कर रहे हैं । इस विषय की ग्रंथमाला भी शीघ्र प्रकाशित करनेवाले हैं ।

 

७. प्रार्थना

‘आपातकाल में केवल सुरक्षित रहने के लिए नहीं, अपितु जीवन में साधना का दृष्टिकोण अपनाकर आनंदमय रहने के लिए भी इस लेखमाला का उपयोग हो’, यह श्री गुरु से प्रार्थना !

पू. संदीप आळशी

 

आपातकाल में मानव जाति के जीवित
रहने हेतु और सृष्टि के कल्याण के लिए प्रयत्नरत
विश्‍व के एकमेव द्रष्टा परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी !

‘हिरण्याक्ष नामक असुर ने पृथ्वी का अपहरण कर, उसे महासागर में छिपा दिया तब श्रीविष्णु ने वराह अवतार लेकर पृथ्वी की रक्षा की । सृष्टि का संतुलन सदैव टिके रहने हेतु भगवान शिव अखंड ध्यानावस्था में रहते हैं । परात्पर गुरु डॉ. जयंत आठवलेजी भी अनेक दैवीय गुणों से युक्त हैं और उनके देवता समान होने की अनेक साधकों को अनुभूतियां भी हुई हैं । परात्पर गुरु डॉक्टरजी को भी देवताओं समान अखिल मानवजाति की रक्षा और कल्याण के साथ-साथ सृष्टि की भी चिंता है ।

भावी आपातकाल में बाढ, भूकम्प समान प्राकृतिक आपदाएं और महायुद्ध समान मानव-निर्मित विपदाएं आएंगी । अखिल मानव जाति को इन विपदाओं का भली-भांति सामना करने के लिए उन्हें मार्गदर्शन मिले, इसके लिए परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी ने वर्ष २०१३ से ‘आपातकाल की संजीवनी’ इस ग्रन्थमाला की निर्मिति आरम्भ की । इसमें डॉक्टर, औषधियां आदि के न होते हुए भी लोग स्वयं ही उपचार कर पाएं, ऐसी विविध उपचार-पद्धतियों पर ग्रन्थ हैं । इसके अन्तर्गत ‘प्राणशक्ति प्रणाली के उपचार’ अथवा ‘रिक्त बक्से के उपचार’ इन सरल और प्रभावी उपचार-पद्धतियों का शोध परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने स्वयं लगाया है । आश्‍चर्य की बात यह है कि परात्पर गुरु डॉक्टरजी ने वर्ष १९८० से ही जब वे अपने मुंबई स्थित घर में थे, उस समय से आयुर्वेद, बिन्दुदाब, रेकी जैसी उपचार-पद्धतियों के विषय से संबंधित सैकडों कतरनें संग्रहित करना रखी थीं । इन कतरनों का उपयोग अब ग्रन्थ बनाने के लिए हो रहा है । इसीसे परात्पर गुरु डॉक्टरजी का द्रष्टापन ध्यान में आता है ।

भावी आपातकाल में घरेलु औषधियां सहजता से उपलब्ध हों, इसके लिए देश-विदेश के लोगों को उनके घर के बरामदे में, आंगन अथवा घर के निकट के परिसर में सहजता से बागवानी कर सकें, ऐसी औषधि वनस्पतियों का अभ्यास वे साधकों द्वारा करवा रहे हैं । ये वनस्पतियां सर्वत्र लगाई जाएं, इस पर भी ध्यान दे रहे हैं । उन्होंने औषधि वनस्पतियों के बागवानी से सम्बन्धित ग्रन्थ भी तैयार किए हैं ।

आपातकाल में मानव को जीवित रहने के लिए केवल उपचार-पद्धतियों की जानकारी होना ही पर्याप्त नहीं, अपितु अन्न-धान्य, पानी, इंधन, बिजली जैसे अनेक जीवनावश्यक बातों की मानव को अत्यंत आवश्यकता होगी । यह सब ध्यान में रख आपातकाल का सामना करने के लिए सभी को शारीरिक स्तरपर ही नहीं, अपितु मानसिक, कौटुंबिक, आर्थिक और आध्यात्मिक स्तर पर भी पूर्वतैयारी करना आवश्यक होता है । इस दृष्टि से ‘प्रत्येक को व्यक्तिगतरूप से और अपने समाजबंधुओं के साथ मिलकर क्या करना चाहिए’, यह बतानेवाले परात्पर गुरु डॉक्टर एकमेव हैं । उनके ‘भावी आपातकाल में जीवित रहने के लिए की जानेवाली तैयारी’ इस विषय पर लेख नियतकालिक और जालस्थल पर प्रकाशित हुए हैं और अब शीघ्र ही इस विषय पर आधारित ग्रंथमाला भी प्रकाशित हो रही है ।

आपातकाल में रक्षा हेतु व्यक्ति अपने बल पर कितनी भी तैयार रहे, भूकम्प, त्सुनामी समान महाभीषण आपत्तियों से बचने के लिए अन्ततः भगवान पर भरोसा करना ही पडता है । यदि व्यक्ति साधना कर भगवान की कृपा प्राप्त कर ले, तो भगवान उस व्यक्ति की प्रत्येक संकट में रक्षा करते हैं । भक्त प्रल्हाद, पांडव जैसे अनेक उदाहरणों से यह सिद्ध भी हुआ है । इसीलिए परात्पर गुरु डॉक्टरजी कुछ वर्षों से ग्रन्थों, नियतकालिकों, जालस्थलों आदि के माध्यम से अखिल मानवजाति पर अपार करुणा कर, बार-बार बता रहे हैं कि ‘अब न्यूनतम जीवित रहने के लिए तो साधना करो !’

हिन्दू धर्मशास्त्र कहता है कि ‘धर्माचरण का ह्रास होने से अधर्म प्रबल होता है, जिससे पृथ्वी पर अनेक संकट आते हैं ।’ जब समाज धर्माचरण करता है, साधना करने लगता है तथा सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में धर्म को महत्त्व दिया जाता है; तब पृथ्वी पर संकट नहीं आते । इससे सृष्टि का सन्तुलन बने रहने में सहायता होती है । इसीलिए परात्पर गुरु डॉक्टरजी केवल भारत में ही नहीं, अपितु संपूर्ण पृथ्वी पर धर्माधारित ‘ईश्‍वरीय राज्य’ स्थापित करने के लिए मानवजाति का आध्यात्मिक स्तर पर मार्गदर्शन कर रहे हैं । इसके अतिरिक्त वे सन्तों, सम्प्रदायों, साधकों, हिन्दुत्ववादियों, धर्मप्रेमियों और राष्ट्रभक्तों को संगठित भी कर रहे हैं ।

पिछले कुछ वर्षों से परात्पर गुरु डॉक्टरजी की प्राणशक्ति बहुत घटी हुई है । वे अनेक व्याधियों से ग्रस्त होने के कारण जैसे-तैसे केवल जीवित हैं । वे सदैव ब्रह्मलीन अवस्था में रहते हैं; मन में आ गया तो कभी भी आनंदपूर्वक देहत्याग कर सकते हैं । ऐसा होने पर, भी वे केवल अखिल मानवजाति को आपातकाल में बचाने के लिए तथा उसे सात्त्विक बनाकर सर्वत्र ईश्‍वरीय राज्य की स्थापना करने के साथ-साथ सम्पूर्ण सृष्टि का कल्याण हो, इस उद्देश्य से प्रतिदिन अपनी पूरी शक्ति लगाकर १५ – १६ घंटे कार्य करते हैं !

ऐसे धर्मसंस्थापक, जगतोद्धारक, सृष्टि के पालनहार, युगप्रवर्तक तथा परम कृपालु गुरुदेवजी के चरणों में दण्डवत प्रणाम !’

– (पू.) श्री. संदीप आळशी (११.११.२०१९)

घोर आपातकाल के विषय में द्रष्टा, संत, सप्तर्षि और देवताओं की भविष्यवाणियां !

 

२०२३ में भारत में ‘हिन्दू राष्ट्र’की
(आदर्श ऐसे ईश्‍वरीय राज्य की) स्थापना होने तक आपातकाल रहेगा !

‘आजकल भूकंप, भीषण बाढ आदि के माध्यम से आपातकाल आरंभ हो चुका है । वर्ष २०२१ से आपातकाल की भीषणता बहुत बढेगी । वर्ष २०२३ में भारत में ‘हिन्दू राष्ट्र’ (ईश्‍वरीय राज्य) की स्थापना होने तक आपातकाल रहेगा ।’  (परात्पर गुरु) डॉ. जयंत आठवले

 

१. आपातकाल आरंभ होने का संकेत देनेवाली प्राकृतिक आपदाएं और अन्तरराष्ट्रीय घटनाक्रम

१ अ. कुछ प्राकृतिक आपदाएं

पिछले कुछ वर्षों से पूरे विश्‍व में प्राकृतिक आपदाएं आ रही हैं । उदाहरण के रूप में, हाल के बीते वर्षों में घटित कुछ घटनाओं के विषय में देखते हैं । वर्ष २०१३ में केदारनाथ में जलप्रलय हुआ था, जिसमें ६० गांव बह गए थे तथा १,००० से अधिक लोगों की मृत्यु हुई थी । वर्ष २०१८ में केरल में भयंकर बाढ आई, जिसमें ३ लाख लोगों को विस्थापित होना पडा और ३७५ से अधिक लोगों के प्राण गए । दिसंबर २०१८ में इंडोनेशिया के समुद्र में ज्वालामुखी का विस्फोट हुआ, जिससे समुद्र में सुनामी आई और उसमें लगभग ३०० लोगों की मृत्यु हुई । कैलिफोर्निया (अमेरिका) के वन में पिछले कुछ वर्षों में २ बार लगी भयंकर आग में सैकडों एकड भूमि पर व्याप्त प्राकृतिक सम्पत्ति नष्ट हो गई ।

१ आ. तीसरे महायुद्ध का कारण बन सकनेवाली कुछ अन्तरराष्ट्रीय घटनाएं

पाकिस्तान का भारत की सीमा पर लगातार संघर्षविराम का उल्लंघन और आतंकवादियों के माध्यम से भारत के विरुद्ध छुपा युद्ध, चीन की बार-बार भारतीय सीमा में घुसपैठ, उत्तर कोरिया के पास स्थित पारमाणविक अस्त्र नष्ट करने के विषय पर उत्तर कोरिया-अमेरिका के बीच संघर्ष की स्थिति, महासत्ता बनने की चीन की महत्त्वाकांक्षा से आरम्भ चीन-अमेरिका संघर्ष, अमेरिका-रूस के बीच पुनः उत्पन्न शीतयुद्ध, ‘कोरोना’ विषाणुरूपी संकट चीन के कारण उत्पन्न हुआ है, यह कहते हुए अमेरिका सहित कुछ यूरोपीय देशों ने चीन के विरुद्ध ताल ठोंकना आदि घटनाओं पर विचार करें, तो भारतसहित विश्‍व के अनेक देश कभी भी तीसरे महायुद्ध के लपेटे में आ सकते हैं ।

 

२. ‘आपातकाल में परिस्थिति की भीषणता दर्शानेवाली कुछ घटनाएं

२ अ. दूसरे महायुद्ध के समय की स्थिति

दूसरे महायुद्ध के समय जर्मनी ने ब्रिटेन के विरुद्ध युद्ध घोषित किया । इस कारण ब्रिटेन में पहले ४ दिन में ही १३ लाख लोगों को स्थलांतर करना पडा । युद्धकाल में निर्दीपन (ब्लैक आऊट) भी आरम्भ हुआ । रात्रि में घर के बाहर पूरा अंधेरा रहता था । खिडकी से अथवा द्वार से धुंधला प्रकाश भी बाहर जानेपर लोगों को दण्ड किया जाता था ! इतना कठोर प्रतिबन्ध एक-दो दिन अथवा महीने-दो महीने नहीं, लगातार ५ वर्ष था ! दूसरे महायुद्ध के समय जर्मनी ने रूस को भी अपने चंगुल में ले लिया था । उस काल में रूसी जनता को वृक्ष के पत्ते, लकडी का बुरादायुक्त केक जैसे पदार्थ खाकर पेट पालना पडा था !

२ आ. वर्ष २०१५ में नेपाल में भूकंप से उत्पन्न विकट
परिस्थिति और उसमें जनता की हुई दुर्दशा-सम्बन्धी कुछ घटनाएं

२ आ १. रसोई गैस की आपूर्ति घटने पर जनता की हुई दुर्दशा से संबंधित कुछ प्रसंग
२ आ १ अ. रसोई गैस सिलिंडर की कालाबाजारी होना

‘१ सहस्र ५०० रुपए में मिलनेवाला गैस सिलिंडर कालाबाजारी में ८,००० रुपए में मिलता था ।

२ आ १ आ. भूकंप में गिरे घरों की लकडियों का उपयोग जलाऊ लकडी की भांति होना

भूकंप के पश्‍चात, लोगों को ७ मास तक गैस सिलिंडर नहीं मिला । इसलिए, उन्होंने भोजन बनाने के लिए भूकंप में गिरे घरों की लकडियों का उपयोग जलाऊ लकडी के रूप में करना आरंभ किया । कुछ महीने पश्‍चात शासन ने जनता के लिए जलाऊ लकडी का प्रबंध किया; परंतु वह लकडी २० रुपए प्रति किलो के भाव से मिलती थी !

२ आ १ इ. लकडी का उपयोग ईंधन के रूप में करने पर उत्पन्न हुईं समस्याएं

१. लकडी विक्रेता गीली लकडियां भी बेचने लगे । इससे महिलाओं को चूल्हा जलाने में बहुत कठिनाई होती थी ।

२. अनेक लोगों के पास लकडी फाडने के लिए कुल्हाडी नहीं थी और कुछ लोगों को लकडी फाडना नहीं आता था; इसलिए ऐसे लोगों को यह कार्य दूसरों से करवाना पडता था ।

३. भाडे के घर में रहनेवाले लोगों को गृहस्वामी चूल्हे पर भोजन नहीं बनाने देते थे । उनका कहना था कि चूल्हे की धूल से घर की भीत काली होगी ।

२ आ १ ई. अनेक सप्ताह प्रतीक्षा के पश्‍चात मिला गैस सिलिंडर, वाहन के अभाव में घर तक ले जाना कठिन होना

अनेक सप्ताह प्रतीक्षा के पश्‍चात कुछ गैस सिलिंडर मिलते थे; परंतु इंधन के अभाव में वाहन उपलब्ध न होने के कारण उन्हें अपने घर तक ले जाने में बहुत कठिनाई होती थी ।

२ आ २. किराना मिलने में बहुत कठिनाई होना

उस काल में किराना दुकानों में अनेक वस्तुएं उपलब्ध नहीं रहती थीं और उपलब्ध होने पर भी पहले की तुलना में चार गुना मूल्य पर मिलती थीं; उदाहणार्थ, १०० से १८० रुपए प्रति लीटर मिलनेवाला मीठा तेल ५०० रुपए प्रति लीटर मिलता था ।

२ आ ३. औषधियों के अभाव में साधारण रोग से भी लोगों की मृत्यु होना

चिकित्सालयों में औषधियां न होने से कुछ लोग साधारण रोग से भी मरे ।

२ आ ४. बिजली की अपर्याप्त आपूर्ति से उत्पन्न समस्या

काठमांडू नगर में प्रतिदिन निर्धारित १४ घंटे बिजली की आपूर्ति नहीं होती थी । कभी-कभी तो बिजली की आपूर्ति दिन में केवल २ -३ घंटे ही होती थी । बिजली की आपूर्ति आरंभ होने पर प्रत्येक घर में पानी की मोटर चालू करना, बिजली के उपकरणों पर भोजन बनाना आदि कार्य होते थे । ऐसी स्थिति में अधिक भार (लोड) के कारण परिणामित्र (ट्रान्सफॉर्मर) जल जाते थे । उन्हें ठीक करने में राजकीय कर्मचारी ४ – ५ दिन लगाते थे ।

२ आ ५. पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति घटनेसे उत्पन्न समस्या

अ. पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति घटने से वाहन नहीं चल रहे थे; इसलिए विद्यालय और उद्योग बन्द थे ।

आ. कभी-कभी इन ईंधनों का वितरण सरकार की ओर से होता था; परन्तु इन्हें पाने के लिए ४ – ५ घंटे पंक्ति में खडा रहना पडता था । इसी प्रकार, अनेक लोगों की बारी आते-आते ईंधन समाप्त भी हो जाता था । इसलिए उन्हें पुनः अनेक सप्ताह प्रतीक्षा करनी पडती थी । शासन की ओर से ईंधन का वितरण आगे कब होगा, इस विषय में किसी को जानकारी नहीं मिलती थी । इसलिए, लोग अनेक दिन अपने वाहन मार्ग पर ही पंक्ति में लगा जाते थे ।

इ. सामान्य स्थिति में १०० से १३० रुपए प्रति लीटर मिलनेवाला पेट्रोल काला बाजारी में ५०० रुपए प्रति लीटर बिकता था और ८० से १०० रुपए प्रति लीटर बिकनेवाला डीजल २५० से ३०० रुपए प्रति लीटर बिकता था ।

ई. ईंधन की आपूर्ति घटने से सायकल चलानेवालों की संख्या बढ गई । इसलिए, उस काल में बहुत सस्ती मिलनेवाली सायकल का मूल्य भी १०,००० हो गया था !

२ आ ६. बिजली, पेट्रोल तथा डीजल के अभाव में ‘इंटरनेट’ सेवा बंद

विविध कार्यालयों की बिजली आपूर्ति बंद होने के कारण जनित्र (जनरेटर) की सहायता से बिजली की व्यवस्था की जाती थी । परंतु, भूकंप के पश्‍चात बिजलीसहित पेट्रोल और डीजल की भी आपूर्ति बाधित होने से ये जनित्र निरुपयोगी हो गए । परिणाम यह हुआ कि ‘इंटरनेट’ से होनेवाले काम रुक गए ।

२ आ ७. उद्योग-धंधे बंद पडे होने से अनेक लोगों की नौकरियां जाना

उस काल में लगभग २,००० उद्योग-धंधे बंद पडे और लगभग १ लाख लोगों की नौकरियां समाप्त हो गईं ।’

– ‘एस.एस.आर.एफ.’की साधिका कु. सानू थापा, नेपाल (२४.४.२०१६)

उपर्युक्त सब उदाहरण आपातकाल के भीषणता की केवल झलक हैं । आपातकाल में क्या-क्या समस्या हो सकती है, इस बात की हम कल्पना भी नहीं कर सकते । हमें ऐसी सभी समस्याओं का यदि डटकर सामना करना है, तो आपातकाल की पहले से तैयारी भी उतनी पक्की करनी पडेगी; आपातकाल से बचने का अन्य मार्ग नहीं है, यह स्मरण रखें !

 

३. आपातकाल की दृष्टि से शारीरिक स्तर पर की जानेवाली विविध तैयारियां !

३ अ. अन्न के बिना भूखे न रहना पडे, इस हेतु ये करें !

३ अ १. रसोई ‘गैस’, ‘स्टोव’ हेतु आवश्यक केरोसीन इत्यादि की संभावित तंगी अथवा अनुपलब्धता को ध्यान में रख, आगे दिए आवश्यक उपाय करें ।
३ अ १ अ.  घर में चूल्हे की व्यवस्था करें

१. घर में चूल्हा न हो, तो हाट (बाजार) से मिट्टी, सीमेंट अथवा ‘बीड’ नामक धातु से बना चूल्हा खरीदकर रखें । कुछ उत्पादक पारंपरिक चूल्हे की तुलना में अल्प इंधन से चलनेवाले, अल्प धुआं करनेवाले, परिवहन में सुलभ, इन अनेक सुविधाओं से युक्त लोहे के चूल्हे बनाते हैं, उदा. भोपाल, मध्य प्रदेश स्थित ‘दत्तू चूल्हा’ (भ्र.क्र. 9425009113) । कुछ उत्पादकों द्वारा बनाए चूल्हे में धुआं बाहर निकलने हेतु ‘चिमनी’ की सुविधा होती है । इन आधुनिक चूल्हों का अध्ययन कर अपनी आवश्यकता के अनुसार चूल्हा खरीद सकते हैं । (ऐन समय पर तीन पत्थरों की विशिष्ट पद्धति से रचना कर चूल्हा बना पाना भी आवश्यक है ।)

दत्तू चूल्हा

२. चूल्हा जलाना, प्रतिदिन उसकी स्वच्छता करना इत्यादि बातें भी सीख लें ।

३. चूल्हे के इंधन के रूप में लकडियां, कोयले, उपले, ‘बायोमास ब्रिकेट’ (गन्ने के चिपडे (रसहीन भाग), लकडी का भूसा, मूंगफली के छिलके, सूरजमुखी के फूल तोडने के उपरांत बचा भाग आदि पर विशिष्ट दबाव से प्रक्रिया कर, उनको एक बनाकर किए छोटे-छोटे टुकडे) इत्यादि का पर्याप्त संग्रह करके रखें । ‘बायोमास ब्रिकेट’ बडे शहरों की दुकानों में तथा ‘ऑनलाइन’ भी खरीदे जा सकते हैं ।

४. चूल्हे पर भोजन पकाना सीखें । इस समय ‘प्रेशर कुकर’ का उपयोग न कर, पतीला अथवा अन्य बरतनों में दाल-चावल पकाना, रोटियां तवे पर पलटकर उन्हें अंगारों पर सेंकना जैसे कृत्यों का समावेश हो । चूल्हे पर भोजन पकाना सीखते समय ‘प्लेटफॉर्म पर खाना पकाने की आदत’ भी घटाने का प्रयास करें ।

३ अ १ आ.  रसोई में सहायक सौर ऊर्जा पर चलनेवाले उपकरण खरीदें

१. जिनके पास सौर ऊर्जा से (‘सोलर’ से) बिजली निर्माण करने की व्यवस्था नहीं है, वे ‘सोलर कुकर’ जैसे उपकरण खरीदकर रखें ।

२. जिनके पास सौर ऊर्जा से बिजली निर्माण करनेवाली व्यवस्था है, वे बिजली की सहायता से भोजन पकानेवाला ‘इंडक्शन चूल्हा’ और उस चूल्हे के लिए उपयुक्त रसोई के बरतन लेकर रखें । (बादलों की अधिकता हो, तो सौरऊर्जा सीमित हो जाती है ।)

इंडक्शन चूल्हा
३ अ १ इ. पर्याप्त मात्रा में गीला कचरा (सब्जियों के डंठल, जूठन, अन्य नष्ट होने योग्य जैविक पदार्थ इत्यादि) उपलब्ध होने पर ‘बायो-गैस संयंत्र’ बनाएं
बायो-गैस संयंत्र

इस संयंत्र में गोबर का उपयोग भी किया जा सकता है । साथ ही इस संयंत्र से शौचालय को जोड सकते हैं । कुछ राज्यों में शासन ‘बायो-गैस संयंत्र’ बनाने का संपूर्ण खर्चा उठाता है, जबकि कुछ राज्यों में शासन इन संयंत्रों को बनाने हेतु कुछ मात्रा में अनुदान देता है ।

३ अ १ ई. गाय, बैल इत्यादि प्राणी पालनेवाले ‘गोबर-गैस संयंत्र’ बनाएं
गोबर-गैस संयंत्र

इस संयंत्र से शौचालय को जोड सकते हैं । यह संयंत्र बनाने हेतु किसानों को राज्य शासन से विशिष्ट नियमों के अंतर्गत अनुदान मिल सकता है ।

३ अ २. रसोई में यंत्रों का (उदा. ‘मिक्सर’ का) उपयोग टालकर, पारंपरिक वस्तुओं का उपयोग करने की आदत अभी से बनाएं
सिलबट्टा

अ. यांत्रिक मथनी से छाछ बनाने जैसी कृतियां घटाकर सामान्य मथनी से छाछ मथें ।

आ. ‘मिक्सर’ के स्थान पर चटनी पीसने हेतु सिलबट्टे का और मूंगफली का चूर्ण बनाने हेतु खलबट्टे का उपयोग करें ।

खलबट्टा

इ. अन्य पारंपरिक वस्तुओं (उदा. पिसाई हेतु चक्की, कूटने हेतु ओखली और मूसल) का उपयोग करने की भी आदत बनाएं ।

 

आपातकाल में शासन के भरोसे रहने की चूक
न कर, प्रत्येक व्यक्ति का विविध स्तरों पर तत्पर रहना आवश्यक !

आपातकाल में यातायात ठप रहता है । इसलिए, शासन की सहायता सब स्थानों पर नहीं पहुंच सकती । शासन के सहायता कार्य में अन्य बाधाएं भी आ सकती हैं । आपातकाल में प्रायः रसोई गैस, खाने-पीने की वस्तुओं आदि की आपूर्ति खंडित होती है । उसके कारण वितरण-व्यवस्था में भ्रष्टाचार होने की सम्भावना अधिक रहती है । उस समय शासन कुछ वस्तुओं की राशनिंग करता है तथा ‘औषध-वितरण केंद्र’ खोलकर नागरिकोंको धैर्य देने का प्रयत्न करता है । परन्तु, शासन के सहायता कार्य की भी सीमा होती है । यह सब ध्यान में रखकर, आपातकाल में जीवित रहने के लिए सबको शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक आदि दृष्टि से स्तरपर पहले से सिद्ध रहना अति आवश्यक है ।

 

आपातकाल में, ‘जैसा भाग्य में लिखा होगा, वैसा होगा’, ऐसी मानसिकता ठीक नहीं !

आपातकाल के विषय में गंभीरता उत्पन्न होने की दृष्टि से कुछ लोगों को जब बताया जाता है, तब वे कहते हैं, ‘आपातकाल में जो सबका होगा, वह हमारा भी होगा । आपातकाल में जो होना होगा, वह होगा । आगे का आगे देखेंगे ।’ इस विषय में निम्नांकित दृष्टिकोण रखना चाहिए ।

आपातकाल में जो होना होगा, वह अर्थात विनाश तो होगा ही । परंतु, घर-घर में वृद्ध और छोटे बच्चे रहते हैं । वृद्ध लोग परावलंबी एवं असहाय होते हैं, तो बच्चे अबोध होते हैं । उन्हें संभालने और उनकी रक्षा करने का दायित्व परिवार के कर्ता व्यक्तियों पर होता है । जब परिवार के कर्ता व्यक्ति ही आपातकाल से रक्षा का प्रयास नहीं करेगें और आगे आपातकाल की आग में वृद्ध और बच्चे जलेंगे, तब उसका पातक परिवार के कर्ता जनों को अवश्य लगेगा, यह वे ध्यान में रखें ।

(प्रस्तुत लेखमाला के सर्वाधिकार (कॉपीराइट) ‘सनातन भारतीय संस्कृति संस्था’ के पास हैं ।)

भाग २ पढने के लिए देखें । आपातकाल में आपातकाल में जीवनरक्षा हेतु आवश्यक पूर्वतैयारी भाग – २

संदर्भ : सनातन की आगामी ग्रंथमाला ‘आपातकाल में जीवनरक्षा हेतु आवश्यक पूर्वतैयारी’

 

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