नामकरण
जिसप्रकार बच्चे का लिंग गर्भाशय में ही निश्चित होता है, उस प्रकार बच्चे का नाम भी पूर्वनिश्चित ही होता है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध, ये घटक एकत्रित रहते हैं; इसीलिए बच्चे का जो रूप है उसके अनुसार उसका नाम भी होता है ।
जिसप्रकार बच्चे का लिंग गर्भाशय में ही निश्चित होता है, उस प्रकार बच्चे का नाम भी पूर्वनिश्चित ही होता है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध, ये घटक एकत्रित रहते हैं; इसीलिए बच्चे का जो रूप है उसके अनुसार उसका नाम भी होता है ।
सनातन की ग्रंथप्रदर्शनी उत्कृष्ट है और सनातन का कार्य भी अच्छा है । गुजरात राज्य के राजकोट के अखिल भारतीय वैष्णव विरक्त संत महामंडल के श्री श्री १०८ घनश्यामदास महाराज ने २७ जनवरी को ऐसा प्रतिपादित किया ।
महाराष्ट्र के रत्नागिरी जनपद के नाणीज के जगद्गुरु नरेंद्राचार्य महाराज संस्थान के स्वीय साहायक श्री. सुनील ठाकुर तथा कार्यकर्ता श्री. राजन बोडेकर ने यहां की सनातन की ग्रंथप्रदर्शनी का अवलोकन किया ।
२७ जनवरी को कानपुर जनपद के गोरियापुर गांव के अखिल भारतीय श्रीपंचबारामाई दाडीया संस्थान के (खालसा के) महंत श्री देवनारायणदास वेदांताचार्य महाराज प्रदर्शनी देखने आए थे ।
सीमंतोन्नयन शब्द सीमंत (मांग की रेखा) एवं उन्नयन (केश ऊपर से पीछे की ओर करना), इन दो शब्दों से बना है । सीमंतोन्नयन अर्थात पत्नी के सिर के केश ऊपर से पीछे की ओर कर मांग निकालना ।
कुंभक्षेत्र की सीमा २५ किमी. है । इसके हृदयस्थान संगमक्षेत्र के समीप स्थित मोरी मार्ग के पास ‘सनातन संस्था’ को स्थान मिलना, केवल गुरुकृपा थी । कुंभक्षेत्र में आनेवाले श्रद्धालुओं में ३० प्रतिशत लोगों को इस क्षेत्र से जाना पडता है ।
इस प्रदर्शनी में भारतीय संस्कृति की वास्तविक जानकारी दिए जाने का देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता लग रही है । संत नामःभारत साधु समाज के राष्ट्रीय संगठनमंत्री महामंडलेश्वर डॉ. स्वामी प्रेमानंद महाराज ने २४ जनवरी को ऐसा प्रतिपादित किया ।
गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में २६ जनवरी को सायंकाल ५ बजे अक्षयवट एवं बडे हनुमान मार्गपर हिन्दू जनजागृति समिति की ओर से क्रांतिकारी एवं राष्ट्रपुरुषों के छायाचित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई ।
जातकर्म विधि के उद्देश्य हैं – उदकप्राशनादि से गर्भसंबंधी दोषों का निवारण हो एवं पुत्रमुख देखने से पुत्र का पिता ऋणत्रयी से (पितृऋण, ऋषिऋण, देवऋण से) तथा समाजऋण से मुक्त हो ।
सनातन की प्रदर्शनी बहुत ही सुंदर है । आप तो साधुओं से भी श्रेष्ठ कार्य कर रहे हैं । सभी साधुओं ने यदि इस पद्धति से धर्मकार्य किया, तो हिन्दू राष्ट्र स्थापना में विलंब नहीं लगेगा । कई लोक अपना संप्रदाय और पंथ को बढाने हेतु कार्य करते हैं; किंतु आप (सनातन) केवल हिन्दू धर्म के लिए कार्य कर रहे हैं ।