न्यास क्या है ?

मुद्रा द्वारा ग्रहण होनेवाली सकारात्मक (पॉजिटिव) शक्ति संपूर्ण शरीरभर में फैलती है, जबकि न्यास द्वारा वह सकारात्मक शक्ति  शरीर में विशिष्ट स्थान पर प्रक्षेपित कर सकते हैं ।

किसानो, साधना मानकर खेती करें एवं समृद्ध हों !

इसलिए सनातन संस्था की सीख है कि किसानों की आत्महत्या की समस्या पर कर्जमाफी जैसे ऊपरी-ऊपर उपाय करने के स्थान पर प्रत्येक किसान को ईश्वरप्राप्ति के लिए साधना करना सिखानी चाहिए ।

अनेक विकारों पर औषधि : पान का बीडा

भारतीय संस्कृति में अनमोल ‘पान’, अर्थात खाने का ‘पान’ अर्थात बीडा । आयुर्वेदानुसार एवं व्यवहारानुसार इसके गुण-दोष हम देखेंगे ।

महर्षि द्वारा सप्तर्षि जीवनाडीपट्टी से आपातकाल एवं तीसरे महायुद्ध के विषय में साधकों को जागृत करना

गत कुछ वर्षाें से भारतभूमि के संत-महात्मा, सिद्धपुरुष, ज्योतिष्यशास्त्र के जानकार, नाडीपट्टीवाचक एवं कुछ द्रष्टाओं ने ‘वर्ष २०२० से वर्ष २०२५, यह काल कितना भयावह होनेवाला है’, इसके संकेत दिए हैं ।

नैसर्गिक आपत्तियों में संगठितरूप से आपत्कालीन सहायता कैसे करें ?

    अनुक्रमणिका१. आपत्तियों का सखोल अध्ययन करना आवश्यक१ अ. आपत्कालीन घटना का स्वरूप और व्याप्ति समझकर लेना१ आ. आपत्कालीन सहायताकार्य करने के विषय में प्राधान्यक्रम निश्चित करना१ इ. पूर्वतैयारी के लिए घटनास्थल की भौगोलिक स्थिति का अंदाज लेना२. आपत्कालीन सहायता करने की पद्धति३. सहायताकार्य करनेवाले स्वयंसेवकों में आवश्यक गुण और कौशल४. आपत्कालीन सहायताकार्य के … Read more

शरीर का भार बढाने के आयुर्वेदिक उपचार

शरीर का भार बढाने के लिए प्रतिदिन तेल मालिश करें, व्यायाम करें और पौष्टिक आहार का सेवन करें । जिन्हें भूख नहीं लगती, वे भूख बढानेवाली औषधि लें ।

स्थूलता (मोटापा) घटाने के लिए आयुर्वेदिक उपचार

स्थूलता घटाने के लिए प्रतिदिन व्यायाम करें, औषधि से मर्दन (मालिश) करें, उचित आहार के साथ औषध का सेवन भी करें । ये सब प्रयत्न करने पर शरीर में जमा अनावश्यक मेद (चरबी) घटता है ।

अभ्यंग (मालिश)

संपूर्ण शरीर को अथवा शरीर के किसी भाग को तेल लगाकर मालिश करना, इसे ‘अभ्यंग’ कहते हैं ।अभ्यंग के कारण शरीर की थकान एवं वात दूर होता है । रंग में निखार एवं कांति आने में सहायता होती है ।

आनंदी जीवन के लिए आयुर्वेद समझ लें !

जागतिक आरोग्य संगठन की भी आरोग्यविषयी व्याख्या केवल ‘रोग न होना अर्थात आरोग्य’ ऐसी न होकर, अपितु उसमें दैवीय उपायों का समावेश है । इसमें मंत्रोपचार भी आता है । कुछ असाध्य रोग तीव्र प्रारब्ध के कारण होते हैं । व्यक्ति को असाध्य रोग होना, यह उसके गत कुछ जन्मों के पापकर्म का फल भी होता है ।