श्रीधरस्वामीकृत् श्रीहनुमत्स्तोत्रम्
अनेक सुखद स्थानों को सुशोभित करनेवाले, मदन का गर्वहरण करनेवाले, आत्मज्ञानविहीनों का अज्ञान दूर करनेवाले अंजनीसुत को हम भजते हैं ।
अनेक सुखद स्थानों को सुशोभित करनेवाले, मदन का गर्वहरण करनेवाले, आत्मज्ञानविहीनों का अज्ञान दूर करनेवाले अंजनीसुत को हम भजते हैं ।
आजकल के स्पर्धा और भाग-दौड-भरे जीवन में सात्त्विकता बचाने के लिए छोटी-से-छोटी क्रिया शास्त्रानुसार करने से लाभ निश्चित होता है ।
ऐतिहासिकदृष्टि से देखने पर दक्षिण-पूर्व एशिया भाग पर प्राचीन भारतीय संस्कृति की पकड थी । इसलिए थायलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, फिलिपीन्स, कंबोडिया, व्हिएतनाम जैसे असंख्य अधिराज्य समृद्धशाली हुए ।
अर्थ न जानते हुए वेदमंत्र पढनेवाला बिना पत्ते, पुष्प और फलों के वृक्षसमान शुष्क है, केवल भारवाही तथा खंभे समान है ।
समर्थ रामदासस्वामी के चरित्र में उल्लेखित घी की गागर श्रीक्षेत्र जांब के श्रीराम मंदिर में हमें देखने मिलती है । जिससे आज भी घी निकलता है ।
पुणे जनपद के पूर्व-दक्षिण कोण की दिशा में नीरा और भीमा नदियों के संगम तट पर श्रीक्षेत्र नीरा-नृसिंहपुर बसा है । जिनके कुलदेवता ‘नृसिंह’ हैं, वे इस तीर्थक्षेत्र में जाकर श्री नृसिंह के दर्शन करें ।
शिमला, हिमाचल प्रदेश में स्थित ‘भलेई माता मंदिर’ के विषय में वहां के भक्तों की श्रद्धा है कि यहां की देवी की मूर्ति से जब पसीना निकलता है, तब पूजक की मनोकामना पूर्ण होती है ।
चितगांव जिले में निसर्गरम्य स्थान पर पहाडी की तलहटी में बसे सीताकुंड नामक गांव में एक शक्तिपीठ है । यहां की दुर्गादेवी को भवानी देवी कहते हैं । सीताकुंड में माता सती का दायां हाथ गिरा था ।
पुण्यनदी गोदावरी, हिन्दू संस्कृति की एक ऐतिहासिक और समृद्ध धरोहर है ! इस पुण्यसलिला के तट पर सनातन धर्म की संस्कृति का विकास हुआ ।गोदावरी का इतिहास, उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय संस्कृतियों के संगम का इतिहास है ।
समर्थ रामदास स्वामी ने ग्रंथ दासबोध का लेखन उनके शिष्य कल्याण स्वामी ने किया था । दासबोध का प्रत्येक समास ऐसा लगता है, जैसे वह प्रत्येक मनुष्यजन्म के अनुभवों की गठरी हो, इतना उसमें जीवनसंदेश ओतप्रोत भरा है ।
