परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी द्वारा समय-समय पर दिए गए साधना के विषय में दृष्टिकोण

गुरुपूर्णिमा के दिन गुरुतत्त्व १ सहस्र गुना मात्रा में कार्यरत होने से गुरुपूर्णिमा सभी शिष्य, भक्त एवं साधकों के लिए एक अनोखा पर्व होता है । केवल गुरुकृपा के कारण ही साधक की आध्यात्मिक उन्नति होती है ।

श्री गणेशजी का कार्य, विशेषताएं एवं उनका परिवार

विभिन्न साधनामार्गों के संत विभिन्न देवताओं के उपासक होते हैं, फिर भी सब संतों ने श्री गणेश की शरण जाकर याचना की है, उनका भावपूर्ण स्तवन किया है । सर्व संतों के लिए श्री गणेश अति पूजनीय देवता रहे ।

श्री गणपति के कुछ अन्य नाम

पार्वती द्वारा निर्मित गणेशजी महागणपति के अवतार हैं । उन्होंने मिट्टी से आकार बनाया तथा उसमें गणपति का आवाहन किया । जगदुत्पत्ति से पूर्व महत्त्व निर्गुण तथा आत्मस्वरूप में होने के कारण उसे ‘महागणपति’ भी कहते हैं ।

भगवतभक्ति का अनुपमेय उदाहरण अर्थात् संतश्रेष्ठ नामदेव महाराज !

८४ लक्ष योनियों के पश्‍चात् जीव को मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, किंतु उस समय यदि अधिक मात्रा में चुकाएं हुई, तो पुनः फेरा करना पडता है । अतः इस जन्म में ही आत्माराम से (ईश्‍वर से) पहचान करें !

सनातन संस्था तथा हिन्दू जनजागृति समिति द्वारा इंदौर (मध्यप्रदेश) में प्रवचन

श्री गणेशोत्सव निमित्त सनातन संस्था तथा हिन्दू जनजागृति समिति द्वारा श्री साई रेसीडन्सी इस संकुल में प्रवचन आयोजित किया गया था ।

चैतन्यदायी गुरुपूर्णिमा महोत्सव में सहस्त्रो लोगों ने अनुभव किया गुरुपरंपरा की महानता !

चैतन्यदायी गुरुपूर्णिमा महोत्सव में सहस्त्रो लोगों ने अनुभव किया गुरुपरंपरा की महानता !

ओणम

ओणम केरल का एक प्रमुख त्योहार है। ओणम केरल का एक पर्व है। दक्षिण भारत के अहम पर्वों में से एक है ओणम। इस पर्व में दक्षिण भारत की परंपरा के पूर्ण दर्शन होते हैं।

साधकों पर प्रेम की बौछार करनेवाली श्रीमती अश्विनी पवार 69 वे संतपद पर विराजमान !

सनातन की प्रसारसेविका सद्गुरु (कु.) अनुराधा वाडेकर ने 9 जुलाई को अर्थात् गुरुपूर्णिमा के शुभदिन पर यह घोषित किया कि, ‘यहां के सनातन के आश्रम में साधकों की आध्यात्मिक माता कहलानेवाली (श्रीमती) अश्विनी पवार (आयु 27 वर्ष ) ने 71 प्रतिशत स्तर प्राप्त कर वे सनातन की 69 वे संतपद पर विराजमान हुई हैं ।’

प्रीति : चराचर के प्रति निरपेक्ष प्रेम सीखानेवाला साधना का स्तर !

प्रीति अर्थात् निरपेक्ष प्रेम । व्यवहार के प्रेम में अपेक्षा रहती है । साधना करनेसे सात्त्विकता बढ जाती है तथा उससे सान्निध्य में आनेवाली चराचर सृष्टि को संतुष्ट करने की वृत्ती निर्माण होती है ।