गुरुकुल समान आश्रमोंका निर्माण !

१. अ. परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजीका साधकोंको साधनाके
लिए अनुकूल वातावरण मिले, इस हेतु आश्रमोंकी निर्मिति करना

साधकोंको पूर्णसमय साधना करनेके लिए अनुकूल वातावरण मिले, इस हेतु परात्पर गुरु डॉक्टरजीने गुरुकुल समान आश्रमोंका निर्माण किया है । उनकी प्रेरणासे रामनाथी (गोवा), देवद (मुंबई), मिरज (सांगली) आदि स्थानोंपर बने आश्रमोंमें लगभग ८०० साधक पूर्णसमय साधना कर रहे हैं ।

इन आश्रमोंकी विशेषता यह है कि यहां रहनेवाले सब साधक अनेक जाति-पन्थोंके हैं तथा विविध योगमार्गानुसार साधना करते हैं; तब भी आनन्द और प्रेमपूर्वक साथ-साथ रहते हैं । भारतमें आज अभूतपूर्व जातिद्वेष दिखाई दे रहा है । ऐसी स्थितिमें भी, सनातनके आश्रमोंमें जाति-पाति का भेदभाव दिखाई नहीं देता । प्रत्येक साधक दूसरे साधकको गुरुबन्धु अथवा गुरुभगिनी मानता है । इसलिए सनातन आश्रम सैकडों सदस्योंका एक परिवार ही बन गया है । ईश्‍वरप्राप्तिके ध्येयसे समाज संगठित एवं एकजुट रह सकता है और रामराज्य अनुभव कर सकता है, इस कथनको परात्पर गुरु डॉक्टरजीने सनातनके आश्रमोंमें सत्य कर दिखाया है ।

 

१.आ. सनातनके विविध आश्रमोंमें चलनेवाले राष्ट्र और धर्म सम्बन्धी कार्य

१. आ १. सनातन आश्रम, रामनाथी, फोंडा, गोवा

यहां सनातन संस्थाका मुख्यालय है ।

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१. आ १ अ. सनातन प्रभात समाचारपत्र-समूहका कार्यालय

यहां सम्पादक, संवाददाता, समाचारपत्रोंकी संगणकीय पृष्ठ-रचना करनेवाले, विज्ञापन लानेवाले, मुद्रणालयमें गट्ठे बांधनेवाले अथवा नियतकालिकोंका सदस्यता शुल्क एकत्र करनेवाले साधक, राष्ट्र और धर्म की वैचारिक सुरक्षाकी भावनासे प्रेरित होकर अवैतनिक एवं समर्पित भावसे सेवारत रहते हैं ।

१ आ १ आ. जालस्थल (वेबसाइट) विभाग

सूचना और प्रौद्योगिकी (आई.टी.) क्षेत्रके उच्च शिक्षित तथा विविध महत्त्वपूर्ण पदोंपर कार्य करनेवाले अनेक युवा साधक उच्च वेतनकी सेवा (नौकरी) छोडकर स्वयंप्रेरणासे हिन्दू धर्मका प्रसार करनेवाला सनातनका जालस्थल चला रहे हैं । उन्होंने अपनी धर्मश्रद्धाके बलपर ही ये जालस्थल अन्तरराष्ट्रीय स्तरके बनाए हैं ।

१ आ १ इ. ग्रन्थ-रचना विभाग

इस विभागमें परात्पर गुरु डॉक्टर आठवलेजीके संकलित ग्रन्थोंके – हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती और बंगला संस्करणोंकी निर्मिति की जाती है । इस विभागमें युवा विद्यार्थियोंसे ७० वर्ष तकके साधक टंकण, संकलन, मुद्रितशोधन, संगणकीय रचना आदि सेवा करते हैं ।

१ आ १ ई. कला-विभाग

इस विभागमें लगभग २० साधक-कलाकार, मात्र कलाके लिए कला नहीं, अपितु ईश्‍वरप्राप्तिके लिए कला, इस उद्देश्यसे देवताओंके सात्त्विक चित्र और मूर्तियां, सात्त्विक रंगोलियां, सात्त्विक मेंहदी और सात्त्विक देवनागरी अक्षरोंकी निर्मिति कर रहे हैं ।

१ आ १ उ. सनातन कलामन्दिर

हिन्दुओंकी दूरदर्शन-वाहिनी आरम्भ करनेके उद्देश्यसे कार्यरत इस विभागमें दृश्य-श्रव्य अभिलेखन (रेकार्डिंग) के लिए अति आधुनिक उपकरणोंसे सुसज्जित २ स्टुडियो तथा दृश्य-श्रव्य संकलन (वीडियो एडिटिंग) के १० कक्ष हैं ।

१ आ १ ऊ. आध्यात्मिक शोध विभाग

यहां हिन्दू संस्कृतिकी श्रेष्ठता तथा अध्यात्मका महत्त्व सिद्ध करनेवाले शोध, वैज्ञानिक उपकरणोंकी सहायतासे किए जाते हैं ।

१ आ १ ए. आध्यात्मिक संग्रहालय

यह, सूक्ष्म जगतके प्रति विश्‍वास उत्पन्न करनेवाला और आध्यात्मिक दृष्टिसे महत्त्वपूर्ण वस्तुओंका संग्रह करनेवाला अद्वितीय संग्रहालय है ।

१ आ १ ऐ. सनातन साधक-पुरोहित पाठशाला

इस पाठशालामें अध्ययन किए विद्यार्थी-पुरोहित, साधनाके रूपमें धर्मरक्षा हेतु निरन्तर धार्मिक कृत्य और यज्ञ-हवन कर रहे हैं ।

१ आ १ ओ. यज्ञशाला

यहां धर्मरक्षा हेतु सतत यज्ञ-हवन किए जाते हैं ।

१ आ २. सनातन आश्रम, देवद, पनवेल, जनपद रायगढ, महाराष्ट्र

यहां निम्नांकित कार्यालय और विभाग कार्यरत हैं ।

अ. हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना हेतु अखण्ड सक्रिय, हिन्दू जनजागृति समितिका कार्यालय

आ. दैनिक सनातन प्रभातकी मुंबई और पश्‍चिम महाराष्ट्र संस्करणोंका कार्यालय

इ. सनातनके ग्रन्थोंका संग्रह, मांग और आपूर्ति केन्द्र

ई. सनातनके पूजनोपयोगी और दैनिक उपयोग की सात्त्विक वस्तुओंका वितरण केन्द्र

१ आ ३. सनातन आश्रम, मिरज, जनपद सांगली, महाराष्ट्र

यहांसे सांगली जनपदमें धर्मप्रसारका कार्य किया जाता है ।

१ इ. भविष्यकालीन योजना – वृद्ध साधकोंके
लिए सर्वत्र वानप्रस्थ आश्रमोंकी स्थापना करना

जो साधक सर्वस्व त्यागकर साधना करते हैं, उनका मन वृद्धावस्थामें बेटेके घर रहकर नाती-पोतोंसे खेलना, दूरदर्शनके कार्यक्रम देखना, अनावश्यक सांसारिक चर्चाएं करना आदि में नहीं रमता । उन्हें अध्यात्म और साधना के विषयमें बोलने तथा साधना करनेके अतिरिक्त कुछ अच्छा नहीं लगता । ऐसे साधकोंकी सुविधा हेतु प्रथम, भारतके प्रत्येक राज्यमें तत्पश्‍चात प्रत्येक जनपदमें, वानप्रस्थ आश्रम बनानेका लक्ष्य रखा है । जिन साधकोंने आजीवन साधना की है, उन्हें अन्ततक सम्भालना और उनकी साधनाके लिए मार्गदर्शन करना, यह इन आश्रमोंके निर्माणका उद्देश्य है ।

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजीके सर्वांगीण कार्यका संक्षिप्त परिचय’

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