गुरुकृपा किस प्रकार कार्य करती है ?

गुरु के किसी उद्देश्य के अथवा उनके द्वारा बताई गई किसी सेवा के कार्यकारणभाव को भली-भांति समझकर, कम से कम समय में एवं उचित ढंग से उसे पूर्णत्वतक ले जाना गुरु को अपेक्षित होता है । गुरु यदि कहें, ‘पूजा करो’ और शिष्य बुद्धि का प्रयोग कर अधिकाधिक अच्छे ढंगसे पूजा करे, तो यह अवज्ञा नहीं होती; अपितु गुरु इस बात से प्रसन्न होते हैं ।

शास्त्रमें बताए गुरुद्रोह

गुरु के विषय में परिहासपूर्ण बोलने से शिष्य की अधोगति होती है । हम जैसे अपने माता-पिता के विषय में परिहास नहीं करते, उसी प्रकार गुरु के विषय में भी न बोलें ।

वास्तविक गुरुके लक्षण क्या हैं ?

एक सर्वोत्तम शिक्षकके समान ही गुरुमें सर्व गुण विद्यमान होते हैं । गुरुका खरा गुण है आत्मानुभूति; परन्तु मात्र बुद्धिद्वारा उसका ज्ञान होना असंभव है ।

खग्रास चंद्रग्रहण (२७.७.२०१८) के दिन क्या करें आैर क्या न करें ?

आषाढ पूर्णिमा को (२७.७.२०१८) चंद्रग्रहण है । यह ग्रहण भारत में सर्वत्र ‘खग्रास’ दिखाई देनेवाला है । ग्रहण २७.७.२०१८ की रात्रि  ११.५४ से ३.४९ तक है । ग्रहणकाल में की गई साधना का फल सहस्रों गुना अधिक प्रमाण में मिलता है ।

गुरु के प्रति व्यवहार कैसा हो ?

गुरु के समक्ष हाथ जोडकर खडे रहें, उनके ‘बैठो’ कहने पर बैठें । गुरु की तुलना में शिष्य का अन्न, वस्त्र एवं वेश निकृष्ट होना चाहिए ।

गुरुप्राप्ति पश्‍चात पूजाघर में क्या परिवर्तन करें ?

पूजाघर में गुरु का छायाचित्र अथवा मूर्ति रखनी चाहिए । उसे प्रतिदिन पोंछकर, देवताओं की पूजा करते समय जब अगरबत्ती दिखाते हैं, तो उन्हें भी अगरबत्ती दिखाएं तथा पूजा समाप्त होने पर जब नमस्कार करते हैं तो उन्हें भी नमस्कार करें ।

साधना में अति शीघ्र प्रगति का मार्ग कौन सा है ?

घर-द्वार का त्याग कर गुरुसान्निध्य में रहना साधना में अति शीघ्र प्रगति का मार्ग है । गुरु के प्रति खरे प्रेम की उत्पत्ति हेतु इस सान्निध्य की आवश्यकता है । गुरु के साथ रहने पर ही विषयों पर अंकुश रहता है ।

शिष्य में कौन-से गुण होने आवश्यक हैं ?

आज्ञा की पृष्ठभूमि से शिष्य कदाचित अनभिज्ञ हो; परंतु उसे इस बात का पूर्ण विश्वास होता है कि ‘गुरु की विचारधारा कल्याणकारी है’; अतः सत्शिष्य सद्गुरु की आज्ञा का पालन निस्संदेह करता है । वे कहें ‘नामजप कर’, तो वह उसी अनुसार करता है ।

श्रीगणेशजी को अडहुल के पुष्प अर्पण करें

देवताओंको पुष्प अर्पित करनेका मुख्य उद्देश्य : देवताओंसे प्रक्षेपित स्पंदन मुख्यतः निर्गुण तत्त्वसे संबंधित होते हैं । देवताओंको अर्पित पुष्प तत्त्व ग्रहण कर पूजकको प्रदान करते हैं, जिससे पुष्पमें आकर्षित स्पंदन भी पूजकको मिलते हैं । 

गणेशपूजनमें दूर्वाका विशेष महत्त्व

दुः + अवम्, इन शब्दोंसे दूर्वा शब्द बना है । ‘दुः’ अर्थात दूरस्थ एवं ‘अवम्’ अर्थात वह जो पास लाता है । दूर्वा वह है, जो श्री गणेशके दूरस्थ पवित्रकोंको पास लाती है ।