पीलिया पर आयुर्वेद के उपाय
गन्ने का रस, आंवले का रस अथवा भूरा कद्दू (पेठा) के रस के साथ अमलतास की फलियों का गूदा लें ।
गन्ने का रस, आंवले का रस अथवा भूरा कद्दू (पेठा) के रस के साथ अमलतास की फलियों का गूदा लें ।
भारतीय संस्कृति में अनमोल ‘पान’, अर्थात खाने का ‘पान’ अर्थात बीडा । आयुर्वेदानुसार एवं व्यवहारानुसार इसके गुण-दोष हम देखेंगे ।
शरीर का भार बढाने के लिए प्रतिदिन तेल मालिश करें, व्यायाम करें और पौष्टिक आहार का सेवन करें । जिन्हें भूख नहीं लगती, वे भूख बढानेवाली औषधि लें ।
स्थूलता घटाने के लिए प्रतिदिन व्यायाम करें, औषधि से मर्दन (मालिश) करें, उचित आहार के साथ औषध का सेवन भी करें । ये सब प्रयत्न करने पर शरीर में जमा अनावश्यक मेद (चरबी) घटता है ।
संपूर्ण शरीर को अथवा शरीर के किसी भाग को तेल लगाकर मालिश करना, इसे ‘अभ्यंग’ कहते हैं ।अभ्यंग के कारण शरीर की थकान एवं वात दूर होता है । रंग में निखार एवं कांति आने में सहायता होती है ।
जागतिक आरोग्य संगठन की भी आरोग्यविषयी व्याख्या केवल ‘रोग न होना अर्थात आरोग्य’ ऐसी न होकर, अपितु उसमें दैवीय उपायों का समावेश है । इसमें मंत्रोपचार भी आता है । कुछ असाध्य रोग तीव्र प्रारब्ध के कारण होते हैं । व्यक्ति को असाध्य रोग होना, यह उसके गत कुछ जन्मों के पापकर्म का फल भी होता है ।
अनंतमूल की बेल १५ फुट लंबी होती है । उनकी जडों का उपयोग औषधि के रूप में करते हैं । मराठी में इसे ‘उपलसरी’ भी कहते हैं ।
महामारी अर्थात अनेक लोगों को तथा जनसमुदाय को मरणोन्मुख करने हेतु गंभीर स्वरूप धारण किया हुआ रोग अथवा व्याधि । गावों में, जिलों में, राज्यों में, देश अथवा भूखंड में रहनेवाले सभी लोगों को ऐसी व्याधियों का सामना करना पडता है । किसी भी बीमारी अथवा व्याधि के कारणों का विभाजन सामान्य तथा असामान्य, इन दो वर्गाें में किया जाता है ।
कफ, गठिया, आमवात, सायटिका, सिरदर्द, सूजन, ज्वर, त्वचारोग – बच्छनाग (वत्सनाभ) पानी में घिसकर उसका लेप दें ।