कलियुग के लिए नामजप सर्वोत्तम साधना क्यों है ?

कलियुग में साधारण व्यक्ति की सात्त्विकता निम्न स्तर पर आ गई है । ऐसे में वेद एवं उपनिषद के गूढ भावार्थ को समझना क्लिष्ट हो गया है ।

अध्यात्म और विज्ञान में समानता कैसे रखें ?

‘विज्ञान केवल स्थूल पंचज्ञानेंद्रियों के संदर्भ में ही संशोधन करता है, किंतु अध्यात्म सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम का भी विचार करता है !’ विज्ञान तंत्रज्ञान के संदर्भ में जानकारी देता है एवं अध्यात्म आत्मज्ञान के संदर्भ में !

दान और अर्पण का महत्त्व एवं उसमें भेद

‘पात्रे दानम् ।’ यह सुभाषित सर्वविदित है । दान का अर्थ है ‘किसी की आय और उसमें से होनेवाला व्यय घटाकर, शेष धनराशि से सामाजिक अथवा धार्मिक कार्य में योगदान ।’

हमेशा आनंद में रहने के लिए क्या आवश्यक है ?

ईश्वर की अनुभूति आने से हमें जो आनंद मिलता है उसे अपने कुछ दोषों के कारण हम अधिक समय तक टिकाकर नहीं रख पाते । हमेशा आनंद में रहने के लिए आवश्यक है कि हम अपने दोषों पर शीघ्रातिशीघ्र विजय प्राप्त करें ।

नामस्मरण है श्रेष्ठ स्मरण भक्ति !

अर्थात भगवान का स्मरण करते जाएं । उनके नाम का अखंड जप करें । नामस्मरण कर संतुष्ट हों । सुख हो अथवा दु:ख मन उद्विग्न हो अथवा चिंता में, सर्वकाल और सभी प्रसंगों में नामस्मरण करते जाएं ।

वास्तुशास्त्र (भवननिर्माणशास्त्र)

सहस्रों वर्ष पहले प्रकृति, भवन और व्यक्ति के शरीर की ऊर्जा का संतुलन वास्तुशास्त्र के माध्यम से साधने की कला हमारे देश के महान दार्शनिक जानते थे । प्रत्येक घर की रचना कैसी होनी चाहिए, इसका सूक्ष्म विचार हिन्दू वास्तुशास्त्र में किया गया है ।

नवविधा भक्ति : दास्य भक्ति

ईश्वर को मन से स्वामी स्वीकार कर स्वयं को उनका दास समझना दास्य भक्ति है । ईश्वर की सेवा कर प्रसन्न होना । भगवान को अपना सर्वस्व मान लेना ‘दास्य भक्ति’ कहलाता है ।