दिनभर की विभिन्न कृतियों में भी हम कैसे भाव रख सकते हैं ?

आज से हम जो भी कृति करेंगे वह ईश्वर का स्मरण करते हुए और जैसी ईश्वर को अच्छी लगेगी, वैसी करेंगे । फिर हम उसे ईश्वर को समर्पित करेंगे ।

हनुमानजी की सेवा और भक्ति का अद्वितीय उदाहरण

आज तक जहां राम-नाम का स्मरण होता है, जहां रामकथा होती है, वहा साधकों को मदद करने के लिए हनुमानजी सूक्ष्मरूप से उपस्थित रहते हैं ।

मनुष्यजीवन का कारण क्या है ?

मनुष्य का पुनः-पुनः जन्म होने के विविध कारण है । इसके दो प्रमुख कारण हैं – पहला कारण है प्रारब्ध अर्थात पिछले जन्म में किए अच्छे-बुरे कर्मों को भुगतना और सामान्य जीवनयापन करना ।

‘अध्यात्म’ का वास्तविक अर्थ क्या है ?

अध्यात्म, यह शब्द अधि + आत्मन् अर्थात आत्मा को समझने का जो शास्त्र है, उसे अध्यात्म कहते हैं । यह एकमात्र शास्त्र ऐसा है जो मनुष्य को किसी भी स्थिति में आनंद में कैसे रहें, यह सिखाता है ।

याचक भाव अर्थात शरणागतभाव का महत्त्व

भगवान के पास जाते समय यदि मन में गर्व लेकर जाएंगे अथवा बिना शरणागत हुए जाएंगे, तो निश्चितरूप से भगवान की कृपा नहीं मिलती । हम याचक बनकर गए, शरणागत होकर गए, बिना फल की अपेक्षा रखकर गए, तो भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं ।

वास्तु देवता को प्रसन्न कैसे करें ?

वास्तुदेवता की जो हम पर कृपा है, उसके लिए मन में जितनी कृतज्ञता रखें उतनी कम ही है । उनके चरणों में भावपूर्ण कृतज्ञता व्यक्त करेंगे ।

वास्तुदेवता का क्या महत्त्व है ?

हम जिस घर में रह रहे हैं, वह वास्तुदेवता ही हैं । वास्तु हमें ईश्वर से मिला कृपाप्रसाद है । कुलदेवता समान ही अन्य देवता अर्थात वास्तु देवता, स्थान देवता व ग्राम देवता भी हमारे लिए कार्यरत रहते हैं और हमारी रक्षा करते हैं ।

भाव का महत्त्व

भगवान का अस्तित्व प्रत्येक कृति करते समय तथा प्रत्येक क्षण अनुभव करना, प्रत्येक कृति करते समय भगवान के अस्तित्व की अनुभूति लेना, अथवा ईश्‍वर के अस्तित्व का भान होना, यही है भाव !

मानसपूजा

देवता अथवा गुरु के सगुण रूप की मन से कल्पना कर मन से ही उनकी स्थूल की कृति समान पूजा करना, अर्थात मानसपूजा करना ।