भीषण रेल दुर्घटना में भी केवल गुरुकृपा से रक्षा होने के विषय में श्री श्याम राजंदेकर की अनुभूति

भीषण रेल दुर्घटना में भी केवल गुरुकृपा से तीव्र प्रारब्ध में कैसे रक्षा होती है यह श्री श्याम राजंदेकर की अनुभूति विस्तृत में जान लेंगे |

‘कोरोना’ महामारी की अवधि में इस भीषण आपातकाल में मृतक का अग्‍निसंस्‍कार करने के संदर्भ में आगे दिए सूत्रों पर ध्‍यान दें !

‘धर्मशास्‍त्रानुसार व्‍यक्‍ति की मृत्‍यु होने पर श्‍मशान में शव पर मंत्रोच्‍चार सहित अग्‍निसंस्‍कार होना आवश्‍यक होता है । वर्तमान में ‘कोरोना’ महामारी के वैश्‍विक संकट के कारण भारी मात्रा में लोगों की मृत्‍यु हो रही है ।

‘गुरु सर्व प्रकार से साधक का भार उठाते हैं’, इसकी साधक को हुई प्रतीति !

‘गुरुदेव किस प्रकार शिष्य की सभी बातों की ओर ध्यान रखते हैं !’, इस विचार से मुझे गुरुदेव के प्रति पुनः-पुन: कृतज्ञता व्यक्त हो रही थी । वे अपने शिष्य का सर्व प्रकार से भार उठाते हैं । आज भी मुझे इस प्रसंग का स्मरण होने पर मन कृतज्ञता से भर आता है ।

भक्ति के सुंदर उदाहरण वाला जनाबाई के जीवन का प्रसंग

जनाबाई जैसे भक्त बनने के लिए उनकी ही तरह हर काम में, हर प्रसंग में ईश्‍वर को अपने साथ अनुभव करना, उनसे हर प्रसंग का आत्मनिवेदन करते रहना, उनको ही अपना सब मानकर अपनी सब बातें बताना आवश्यक है ।

कलियुग के लिए नामजप सर्वोत्तम साधना क्यों है ?

कलियुग में साधारण व्यक्ति की सात्त्विकता निम्न स्तर पर आ गई है । ऐसे में वेद एवं उपनिषद के गूढ भावार्थ को समझना क्लिष्ट हो गया है ।

अध्यात्म और विज्ञान में समानता कैसे रखें ?

‘विज्ञान केवल स्थूल पंचज्ञानेंद्रियों के संदर्भ में ही संशोधन करता है, किंतु अध्यात्म सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम का भी विचार करता है !’ विज्ञान तंत्रज्ञान के संदर्भ में जानकारी देता है एवं अध्यात्म आत्मज्ञान के संदर्भ में !

दान और अर्पण का महत्त्व एवं उसमें भेद

‘पात्रे दानम् ।’ यह सुभाषित सर्वविदित है । दान का अर्थ है ‘किसी की आय और उसमें से होनेवाला व्यय घटाकर, शेष धनराशि से सामाजिक अथवा धार्मिक कार्य में योगदान ।’

हमेशा आनंद में रहने के लिए क्या आवश्यक है ?

ईश्वर की अनुभूति आने से हमें जो आनंद मिलता है उसे अपने कुछ दोषों के कारण हम अधिक समय तक टिकाकर नहीं रख पाते । हमेशा आनंद में रहने के लिए आवश्यक है कि हम अपने दोषों पर शीघ्रातिशीघ्र विजय प्राप्त करें ।