ईश्वरप्राप्ति हेतु त्याग का महत्त्व !
तन-मन-धन का त्याग और सर्वस्व अर्पण करने की तैयारी द्वारा साधक के अहं का लय होने लगता है । उसका संचित और प्रारब्ध संमाप्त होता है । उसे ईश्वर की प्राप्ति होती है और उसका जीवन सार्थक होता है ।
तन-मन-धन का त्याग और सर्वस्व अर्पण करने की तैयारी द्वारा साधक के अहं का लय होने लगता है । उसका संचित और प्रारब्ध संमाप्त होता है । उसे ईश्वर की प्राप्ति होती है और उसका जीवन सार्थक होता है ।
मानव का ध्येय क्या है ? ‘मनुष्य जन्म दुर्लभ है । विविध स्वरूपों से भगवान बताते हैं कि ‘मनुष्यजन्म लेकर ईश्वरप्राप्ति करनी है’ ।
कुछ घरों में किसी प्राणी अथवा पक्षी का दीर्घकाल तक संगोपन किया जाता है । मृत्यु के समय ऊपर दिए अनुसार संबंधित व्यक्ति को भी उनके लिए कुछ न कुछ धार्मिक उपाय करने से उन्हें उसका उपयोग अगले जीवन के लिए होगा ।
पू. अण्णा के आध्यात्मिक मार्गदर्शन एव प्रेमभाव, इसके साथ ही नामजप एवं आध्यात्मिक उपायों के कारण इस व्यावसायी के मद्यपान का व्यसन छूट गया ।
आस्थापन के मालिक ने उन्हें १० प्रतिशत वेतन देना जारी रखा । ‘तदुपरांत कुछ माह में दिवाली में खर्च करने के लिए उन्हें पैसे कम पड रहे होंगे’, ऐसे आस्थापन के मालिक को लगा; इसलिए उन्होंने २ सहस्र रुपये वेतन बढा दिए । उसी माह में उस साधक की मां को फेफडों का कष्ट शुरू हो गया और उसके लिए उन्हें महीने में २ सहस्र रुपयों की औषधियां लग रही थीं । ‘साधना करने से भगवान साधकों की कैसेे सहायता करता है ?’, इसका यह एक उत्तम उदाहरण है ।’
फेसबुक पर प्रसारित हुए इस संदेश में ‘श्रीराम ने रावण को दशहरा के दिन मारने के उपरांत २१ दिनों में वे पैदल चलते हुए अयोध्या पहुंचे थे । इसलिए दशहरे के २१ दिनों पश्चात दिवाली मनाई जाती है’, ऐसे आशय का संदेश प्रसारित किया जा रहा है । प्रभु श्रीरामचंद्र पुष्पक विमान से अयोध्या पहुंचे, ऐसा रामायण में उल्लेख है ।
‘ॐ नमः शिवाय ।’ इस नामजप के कारण मन को शांति लगती है और आसपास एक रिक्ती है, ऐसा प्रतीत होने के साथ ही स्वयं भी रिक्ती होने से शिवजी ही सर्व कर रहे हैं, इसकी अनुभूति आना
‘घर में हमारे साथ साक्षात भगवान हैं’, इस दृढ श्रद्धा से साधना करनी चाहिए !
साधारण मानव को परिवार का पालन करते समय भी परेशानी होती है । परमेश्वर तो सुनियोजित रूप से पूरे ब्रह्मांड का व्यापक कार्य संभाल रहे हैं । उनकी अपार क्षमता की हम कल्पना भी नहीं कर सकते ! ऐसे इस महान परमेश्वर के चरणों में कोटिशः कृतज्ञता !
आपकी दृष्टि सुंदर होनी चाहिए । तब मार्ग पर स्थित पत्थरों, मिट्टी, पत्तों और फूलों में भी आपको भगवान दिखाई देंगे; क्योंकि प्रत्येक बात के निर्माता भगवान ही हैं । भगवान द्वारा निर्मित आनंद शाश्वत होता है; परंतु मानव-निर्मित प्रत्येक बात क्षणिक आनंद देनेवाली होती है । क्षणिक आनंद का नाम ‘सुख’ है ।