मदिरापान के अधीन एक व्यक्ति द्वारा नामजप एवं आध्यात्मिक उपायों का आरंभ किए जाने के पश्‍चात केवल १ ही मास में उसका व्यसन छूट जाना, यह सनातन संस्था द्वारा बताई गई साधना की श्रेष्ठता !

व्यसनमुक्त होने के लिए सहस्रोें रुपए का व्यय करनेपर भी व्यसन छुटेगा, ऐसा नहीं होता; क्योंकि व्यसन लगने के पीछे पूर्वजों का कष्ट अथवा अनिष्ट शक्तियों का कष्ट जैसे कष्ट हो सकते हैं ।

पाप एवं पाप का महत्त्व

उचित कर्म कर प्रारब्ध पर मात करने की एवं अपने साथ ही संपूर्ण सृष्टि को सुखी करने की क्षमता ईश्‍वर ने केवल मनुष्य को दी है । ऐसा होते हुए भी इस क्षमता का उपयोग अपना स्वार्थ साधने, निष्पाप जीवों पर अन्याय करने, अन्यों पर अधिकार जमाने इत्यादि अधर्माचरण करने से समाज का प्रारब्ध दूषित होता है ।

पाप के दुष्परिणामों का निराकरण कैसे करें ?

प्रायश्‍चित कर्म से पाप के दुष्परिणामों का निराकरण संभव है । प्रायश्‍चित पापमुक्ति के लिए हैं । प्रायश्‍चित अर्थात स्वयं से हुई भूल एवं दुष्कृत्यों के लिए पश्‍चाताप होना तथा उसके लिए धर्म में बताए दंड भुगतना ।

कुछ अटल चूकें और उनके लिए विविध प्रायश्‍चित

अधिकांशत: सदैव होनेवाली भूल के लिए प्रायश्‍चित कर्म है नित्यनैमित्तिक कर्म अर्थात दैनिक पूजा-अर्चना, स्नान-संध्या, व्रत इत्यादि । (इन कर्मों के सन्दर्भ में विस्तृत विवरण सनातन के ग्रंथ कर्म का महत्त्व, विशेषताएं व प्रकार में दिया है ।

यमदीपदान करते समय १३ दीपक क्यों अर्पण करते हैं ?

दीपकों की संख्या १३ मानकर, पूजा की जाती है । इस दिन यमदेवता द्वारा प्रक्षेपित लहरें ठीक १३ पल नरक में निवास करती हैं । इसका प्रतीक मानकर यमदेवता को आवाहन करते हुए १३ दीपकों की पूजा कर, उन्हें यमदेवता को अर्पण किया जाता है ।

साधिका द्वारा भावजागृति हेतु किए गए प्रयास

‘स्वयं में भाव उत्पन्न होना ईश्वरप्राप्ति की तडप, अंतकरण में ईश्वर के प्रति बना केंद्र और प्रत्यक्षरूप से साधना, इन घटकोंपर निर्भर होता है । कृती बदलने से विचार बदलते हैं और विचारों को बदलने से कृती बदलती है’, इस तत्त्व के अनुसार मन एवं बुद्धि के स्तरपर निरंतर कृती करते रहने से भाव शीघ्र होने में सहायता मिलती है ।

साधना कर पुण्य बढाने का महत्त्व

व्यक्तिने अपने पूर्वजन्मों में जो कुछ अच्छे कर्म, परोपकार एवं दानधर्म किए होंगे, उसका फल पुण्य के रूप में एकत्र होता है और वह आपको अगले जन्म में सुख के रूप में मिलता है ।

पति-पत्नी के पापों की भागीदारी

पत्नी का आधा पाप पति को लगता है; मात्र पत्नी का पुण्य पतिको नहीं मिलता । पत्नी पति के स्वाधीन होने के कारण वह उसके पाप के लिए उत्तरदायी होता है; मात्र सुख के लिए नहीं; क्योंकि अध्यात्म में अंत में सुख का भी त्याग ही करना होता है ।