साधिका द्वारा भावजागृति हेतु किए गए प्रयास

‘स्वयं में भाव उत्पन्न होना ईश्वरप्राप्ति की तडप, अंतकरण में ईश्वर के प्रति बना केंद्र और प्रत्यक्षरूप से साधना, इन घटकोंपर निर्भर होता है । कृती बदलने से विचार बदलते हैं और विचारों को बदलने से कृती बदलती है’, इस तत्त्व के अनुसार मन एवं बुद्धि के स्तरपर निरंतर कृती करते रहने से भाव शीघ्र होने में सहायता मिलती है ।

अहं को घटाने हेतु साधना के महत्त्वपूर्ण घटक क्या हैं ?

दैनिक जीवन के सर्व कामकाज को सेवा के रूप में ही करने का प्रयत्न करें, उदाहरणार्थ‘ अपने कपडे इस्त्री करना भी गुरु सेवा ही है’, ऐसा भाव रहेगा तो सेवावृत्ति बढाने में सहायता मिलेगी । ‘मैं सेवक हूं’, यह भाव जितना अधिक होगा, उतनी मात्रा में अहं भी शीघ्र घटेगा ।

अहं के कारण क्या हानि होती है और इसे नष्ट करना महत्त्वपूर्ण क्यों है ?

अहं जितना अधिक होगा, व्यक्ति उतना ही दुःखी होगा । मानसिक रोगियों का अहं सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक होता है; इसलिए वे अधिक दुःखी होते हैं ।

अहं के प्रकार एवं निर्मिति

धन एवं लोकैषणा के कारण अर्थात संपत्ति, पद, अधिकार, राज्य इत्यादि की प्राप्ति से अहं बढता है, उदाहरणार्थ हिरण्यकश्यप एवं रावण, राज्यप्राप्ति के उपरांत मदोन्मत्त हो गए । फल की अपेक्षा रखने से अहं आता है ।

अहं किसे कहते हैं एवं अहं-निर्मूलन का क्या महत्त्व है ?

अहं, खेत में उगनेवाली घास समान है । जब तक उसे जड सहित उखाड न दिया जाए, तबतक खेत की उपज अच्छी नहीं हो पाती । घास को निरंतर काटते रहना आवश्यक है । उसी प्रकार, अहं को पूर्णतः नष्ट किए बिना उत्तम उपज अर्थात परमेश्वरीय कृपा संभव नहीं ।

गुरुकृपायोगानुसार साधना करनेवाले साधकों की मृत्यु के समय एवं मृत्यु के पश्चात प्रगति

गुरुकृपायोग के अनुसार ६० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर से अधिक उन्नत जीवों का पुनर्जन्म नहीं होता; क्योंकि वह सभी दृष्टि से शिक्षित होता है । व्यष्टियोग में ७० प्रतिशत से आगे पुनर्जन्म नहीं होता, परंतु समष्टियोग में (गुरुकृपायोग में) ईश्वर से अपनेआप अधिक सहायता मिलने के कारण ६० प्रतिशत आध्यात्मिक स्तर पर ही शिक्षित अवस्था प्राप्त हो जाती है । इसलिए ऐसा शिक्षित जीव पुनः भूतल पर जन्म नहीं लेता ।

गुरुकृपायोग से शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति होने के कारण

गुरुकृपायोग के मूल्य जीव को सेवाभाव से अहं अल्प करने के लिए विशिष्ट स्तर पर चैतन्य प्रदान कर ‘समष्टि साधना से व्यष्टि साधना की अपेक्षा अहं न्यून होने में शीघ्र सहायता मिलती है’, इसकी शिक्षा देते हैं ।’ अहं नष्ट करने के लिए गुरुकृपा की आवश्यकता होती है आैर इसलिए ‘गुरुकृपायोग’ सर्व योगों में श्रेष्ठ योग है ।