मनुष्य के विविध कुकर्म और तदनुसार उसे होनेवाली नरकयातना (श्रीमद्भागवत्)

मनुष्य के त्रिगुणों के कारण होनेवाले कृत्यों का फल
शुकदेव गोस्वामी महाराज परिक्षित से कहते हैं, यह जग ३ प्रकार के कृत्यों से भरा है । सत्त्वगुण (भलाई के उद्देश्य से किए जानेवाले कृत्य), रजोगुण (वासना के अधीन होकर होनेवाले कृत्य) और तमोगुण (अज्ञान के कारण होनेवाले कृत्य) । इसलिए उन्हें ३ विविध प्रकार के परिणाम भोगने पडते हैं ।

प्रारब्ध 

‘अध्यात्म विषयक बोधप्रद ज्ञानामृत’ लेखमाला से भक्त, संत तथा ईश्‍वर, अध्यात्म एवं अध्यात्मशास्त्र तथा चार पुरुषार्थ ऐसे विविध विषयों पर प्रश्‍नोत्तर के माध्यम से पू. अनंत आठवलेजी ने सरल भाषा में उजागर किया हुआ ज्ञान यहां दे रहे हैं । इस से पाठकों को अध्यात्म के तात्त्विक विषयों का ज्ञान होकर उनकी शंकाओं का निर्मूलन होगा तथा वे साधना करने के लिए प्रवृत्त होंगे ।

भीषण रेल दुर्घटना में भी केवल गुरुकृपा से रक्षा होने के विषय में श्री श्याम राजंदेकर की अनुभूति

भीषण रेल दुर्घटना में भी केवल गुरुकृपा से तीव्र प्रारब्ध में कैसे रक्षा होती है यह श्री श्याम राजंदेकर की अनुभूति विस्तृत में जान लेंगे |

‘कोरोना’ महामारी की अवधि में इस भीषण आपातकाल में मृतक का अग्‍निसंस्‍कार करने के संदर्भ में आगे दिए सूत्रों पर ध्‍यान दें !

‘धर्मशास्‍त्रानुसार व्‍यक्‍ति की मृत्‍यु होने पर श्‍मशान में शव पर मंत्रोच्‍चार सहित अग्‍निसंस्‍कार होना आवश्‍यक होता है । वर्तमान में ‘कोरोना’ महामारी के वैश्‍विक संकट के कारण भारी मात्रा में लोगों की मृत्‍यु हो रही है ।

नामजप न करते हुए और नामजप के साथ प्राणायाम

२१ जून विश्वभर में आंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाता है । योग इस शब्द का उगम ‘युज’ धातु से हुआ है । युग का अर्थ है संयोग होना । योग इस शब्द का मूल अर्थ जीवात्मा का परमात्मा से मिलन होना है । योगशास्त्र का उगम लगभग ५००० वर्षाें पूर्व भारत में हुआ है ।

कर्मस्थान – मनुष्यजन्म को सार्थक बनानेवाला कुंडली में निहित अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान !

मनुष्य का जीवन कर्ममय है । कर्मफल अटल होते हैं । अच्छे कर्माें के फलस्वरूप पुण्य तथा बुरे कर्माें के फलस्वरूप पाप लगता है । परमेश्वर प्रत्येक जीव के साथ उसके कर्माें के अनुसार न्याय करते हैं । इसलिए मनुष्य द्वारा होनेवाले प्रत्येक अपराध का उसे दंड मिलता है और इस दंड को उसे भोगकर ही समाप्त करना पडता है ।

भक्ति के सुंदर उदाहरण वाला जनाबाई के जीवन का प्रसंग

जनाबाई जैसे भक्त बनने के लिए उनकी ही तरह हर काम में, हर प्रसंग में ईश्‍वर को अपने साथ अनुभव करना, उनसे हर प्रसंग का आत्मनिवेदन करते रहना, उनको ही अपना सब मानकर अपनी सब बातें बताना आवश्यक है ।

कलियुग के लिए नामजप सर्वोत्तम साधना क्यों है ?

कलियुग में साधारण व्यक्ति की सात्त्विकता निम्न स्तर पर आ गई है । ऐसे में वेद एवं उपनिषद के गूढ भावार्थ को समझना क्लिष्ट हो गया है ।