कलियुग के लिए नामजप सर्वोत्तम साधना क्यों है ?

प्रत्येक युग की साधना निश्‍चित है । जैसे –

सत्ययुग के लिए – ज्ञानयोग

त्रेतायुग के लिए – ध्यानयोग,

द्वापरयुग के लिए – यज्ञ, कर्मकांड, (पूजा-अर्चना)

कलियुग के लिए – नामजप

कलियुग में भगवान की प्राप्ति का सबसे सरल किंतु प्रबल साधन नामजप ही बताया गया है । श्रीमद्भागवत का कथन है – यद्यपि कलियुग दोषों का भंडार है तथापि इसमें एक बहुत बडा सद्गुण यह है कि सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग पहले के इन युगों में भगवान के ध्यान द्वारा, यज्ञ-अनुष्ठान के द्वारा तथा पूजा-अर्चना से जो फल मिलता था, वह पुण्यफल कलियुग में केवल श्रीहरि के नाम-संकीर्तन से ही प्राप्त हो जाता है ।
कृष्णयजुर्वेदीय कलिसंतरणोपनिषद मेें लिखा है कि द्वापरयुग के अंत में जब देवर्षि नारद ने ब्रह्माजी से कलियुग में कलि के प्रभाव से मुक्त होने का उपाय पूछा, तब सृष्टिकर्ता ने कहा – आदिपुरुष भगवान नारायण के नामोच्चारण से मनुष्य कलियुग के दोषों को नष्ट कर सकता है ।

भगवान चैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि कलियुग में केवल हरिनाम ही हमारा उद्धार कर सकता है । यही बात नानक देवजी ने भी कही है, ‘नानक दुखिया सब संसार, ओही सुखिया जो नामाधार ।’ रामचरितमानस में भी यही लिखा है, ‘कलियुग केवल नाम आधारा । सुमिरि-सुमिरि नर उतरहीं पारा ॥’

ध्यानयोग के अनुसार ध्यान करने के लिए आज शहरों के रज-तमात्मक वातावरण में शांत तथा प्रसन्न वातावरण उपलब्ध होना कठिन है । आज टीवी, मोबाईल तथा लैप टॉप आदि साधनों से आधा घंटा भी दूर रहना संभव नहीं होता है, ऐसी स्थिति में घंटों ध्यान साधना और आगे समाधि की स्थिति कैसे अनुभव कर सकते हैं । एक ही स्थान पर एकांत में लंबे समय तक बैठने की आज मुनष्य में क्षमता नहीं है । ध्यान के अभ्यास के प्रारंभ में मन की जो स्थिरता आवश्यक होती है, वह आज संभव नहीं है । मन सतत विचारों से ग्रस्त रहता है । अच्छे ध्यान के लिए सदाचार, सद्विचार, यम-नियम और सात्विक भोजन का पालन करना भी आज कठिन है । यद्यपि किसी एक मनुष्य को उसके पिछले जन्म के ध्यानयोगानुसार साधना के संस्कारों के कारण ध्यान संभव होगा, तो भी यह साधना आज के युग में सभी के लिए संभव नहीं है । इस कारण शास्त्रों के आधार पर हमें हमारा साधनामार्ग सुनिश्‍चित करना आवश्यक है । हिन्दू धर्म की विशेषता है कि ऋषि-मुनियों ने, मानवजाति के कल्याण हेतु शास्त्रों में युगानुसार हमें कौन सी साधना करनी चाहिए, यह स्वयं लिखकर रखा है । हमें मात्र उनके बताए गए ज्ञान का उपयोग कर आचरण करना है । इस कारण हम अपने मनानुसार साधना करने की अपेक्षा धर्मशास्त्र के अनुसार साधना करें, तो निश्‍चित ही हमें अधिक लाभ हो सकता है ।

 

ध्यान, कर्मकांड, ज्ञानयोग की अपेक्षा नामसंकीर्तन
(नामजप) कलियुग के लिए सर्वोत्तम साधना क्यों है ?

कलियुग में अन्य साधना की तुलना में नामसंकीर्तन का महत्त्व

कलियुग में साधारण व्यक्ति की सात्त्विकता निम्न स्तर पर आ गई है । ऐसे में वेद एवं उपनिषद के गूढ भावार्थ को समझना क्लिष्ट हो गया है । अतः ज्ञानयोग की साधना कठिन है । वर्तमान समय में लोगों के पास दस मिनट पूजा करने के लिए भी समय नहीं होता अतः अनेक वर्ष ध्यान लगाकर ध्यानयोग की साधना भी संभव नहीं । उसी प्रकार कर्मकांड अंतर्गत यज्ञयाग करना भी वर्तमान समय में कठिन हो जाता है क्योंकि यज्ञयाग के लिए सात्त्विक सामग्री एवं सात्त्विक पुरोहित का होना अति आवश्यक है और आज के समय में यह मिलना कठिन है । साथ ही यज्ञयाग के लिए कर्मकांड के कठोर नियमों का पालन करना भी सरल नहीं । अतः कलियुग के लिए सबसे सरल मार्ग है भक्ति योग और उसके अंतर्गत नाम संकीर्तन योग, यह सबसे सहज और सरल साधना मार्ग है ।

व्यासजी ने कलियुग का महत्त्व कथन किया है कि जो फल सतयुग में दस वर्ष ब्रह्मचर्य आदि का पालन करने से मिलता है, उसे मनुष्य त्रेता में एक वर्ष, द्वापर में एक मास और कलियुग में सिर्फ एक दिन में प्राप्त कर लेता है । जो फल ध्यान, यज्ञ और देवार्चन करने से प्राप्त होता है, कलियुग में वही फल केवल ईश्‍वर के नाम-संकीर्तन से मिल जाता है । ‘नाम’ साधना की नींव है ।

श्रीमद्भागवत में कहा गया है –

यत्फलं नास्ति तपसा न योगेन समाधिना।
तत्फलं लभते सम्यक्कलौ केशव कीर्तनात्॥

भावार्थ : जो फल तपस्या, योग एवं समाधि से भी नहीं मिलता, कलियुग में वही फल श्री हरिकीर्तन से सहज ही मिल जाता है । हरिकीर्तन अर्थात नामस्मरण का तात्पर्य – वाणी से प्रभु नाम का गायन, मन से स्मरण, चित्त से चिंतन एवं हृदय से धारण करने से है; नाम ही जगत का बीज है ।

नामसंकीर्तन साधना की विशेषता

इसमें सभी वर्णों का अधिकार है । इस महामंत्र की दीक्षा में मुहूर्त के विचार की आवश्यकता नहीं है । इसके जप में बाह्यपूजा भी अनिवार्य नहीं है । केवल उच्चारण करने मात्र से यह सम्पूर्ण फल देता है । इस मंत्र के अनुष्ठान में देश-काल का कोई प्रतिबंध नहीं है । जूठे मुंह अथवा किसी भी प्रकार की अशुद्ध अवस्था में भी नामजप करने का निषेध नहीं है । श्रीमद्भागवत महापुराण का तो यहां तक कहना है कि जप-तप एवं पूजा-पाठ की त्रुटियां श्रीहरि के नामसंकीर्तन से ठीक और परिपूर्ण हो जाती हैं ।

नामसंकीर्तनयोग का महत्त्व : मनुस्मृति में कहा गया है –

ये पाकयज्ञाश्‍चत्वारो विधियज्ञसमन्विता: ।
सर्वे ते जपयज्ञस्य कलां नार्हन्तिषोडशीम् ॥ (मनुस्मृति २.८६)

भावार्थ : अर्थात गृहस्थ द्वारा जो चार महायज्ञ (वैश्‍वेदेव, बलिकर्म, नित्य श्राद्ध एवं अतिथि भोजन) प्रतिदिन किए जाते हैं, जपयज्ञ का फल इन सब कृतियों के फल के कई गुना होता है ।

नामजप में जप शब्द की व्युत्पत्ति ‘ज’ जोड(+)‘प’ से हुई है । जप शब्द का अर्थ है ‘जकारो जन्म विच्छेदकः पकारो पाप नाशक:’ अर्थात जो हमें जन्म और मृत्यु के चक्र से निकाल कर हमारे पापों का नाश करता है, उसे जप कहते हैं ।

साधना की अखंडता नामजप से ही संभव है : यदि हमें उस अनंत परमेश्‍वर से एकरूप होना है, तो हमें अखंड साधना करनी होगी और ज्ञानयोग के अनुसार ग्रंथों का अखंड पठन करना अथवा ध्यानयोग के अनुसार अखंड ध्यान लगाना होगा । त्राटक तथा प्राणायाम करना, भक्तियोग के अनुसार अखंड भजन करना, पूजा करना, तीर्थ करना अथवा कीर्तन प्रवचन सुनना बताया गया है; परंतु यह भी २४ घंटे करना संभव नहीं । साथ ही गृहस्थ के लिए घर-द्वार, बच्चे, नौकरी आदि संभालते हुए साधना में अखंडता बनाए रखने का सबसे अच्छा साधन है नामजप करना ।

कुछ व्यक्ति को यह भ्रांति होती है कि आसन और प्राणायाम के माध्यम से हम आध्यात्मिक प्रगति कर सकते हैं । अपने आप में यह एक गलत धारणा है । आसन और प्राणायाम हमारी आध्यात्मिक प्रगति करवाने की क्षमता नहीं रखते हैं । वे मात्र हमारी स्थूल देह एवं प्राण देह की कुछ सीमा तक शुद्धि कर सकते हैं । इन देहों की शुद्धि अन्य साधना मार्ग से भी संभव है । अतः आध्यात्मिक प्रगति में आसन एवं प्राणायाम को विशेष महत्व नहीं दिया गया है ।

किसी भी योगमार्ग से साधना करने पर स्थूल देह एवं प्राण देह की अधिकाधिक शुद्धि २०% से ३०% तक ही होती है और स्वर्ग एवं उसके आगे के लोक अर्थात महा, जन, तप या सत्य लोक के आध्यात्मिक प्रवास हेतु सभी देहों की पूर्ण शुद्धि परम आवश्यक है और नामजप से हमारी चारों देह अर्थात स्थूल देह, मनो देह अर्थात मन, कारण देह अर्थात बुद्धि तथा महाकारण देह अर्थात अहं की पूर्ण शुद्धि संभव है । नामसंकीर्तन योग का यही महत्व है ।

भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमदभगवदगीता में नामजप के महत्त्व के विषय में कहा है, ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि ।’ अर्थात कलियुग में सर्व यज्ञों में जपयज्ञ मैं हूं । इससे कलियुग में नामजप का महत्त्व ध्यान में आता है ।

 

नामजप संबंधी कथा

हम सब जानते हैं, ब्रह्माजी के पुत्र महर्षि नारदजी का नाम लेते ही, हमारे सामने ‘नारायण नारायण’ का नामजप करते हुए सम्पूर्ण ब्रम्हांड में भ्रमण करने वाले नारदजी की छवि आती है । एक बार महर्षि नारदजी अपने आराध्य भगवान श्रीविष्णुजी के पास जाकर पूछते हैं, ‘‘हे अखंड ब्रम्हांड को चलानेवाले भगवान आपका सबसे श्रेष्ठ भक्त कौन है ?’’ ये पूछते समय नारदजी की अपेक्षा थी कि श्रीविष्णु भगवान उन्हीं का नाम लेंगे । किंतु भगवान श्रीविष्णु तो नारदजी के मन की बात को पहले ही जान गए थे । उन्होंने सोचा, चलो आज नारदजी को जो, ‘मैं ही सर्वश्रेष्ठ भक्त हूं’ का अहंकार है वो नष्ट करते हैं । क्योंकि ईश्‍वर तो भक्तवत्सल होते हैं, तो उन्हें अपने भक्त की सभी प्रकार की चिंता रहती है ।

विष्णु भगवान नारदजी को लेकर एक खेत पर जाते हैं और एक किसान की ओर उंगली दिखाकर बोलते हैं, ‘‘वो देखो वो रहा मेरा सबसे श्रेष्ठ भक्त ।’’ नारदजी को बडा आश्‍चर्य लगता है मैं तो हर पल नारायण नारायण का जाप करता हूं और यह किसान तो दिन भर खेत में काम करता है, तो यह श्रेष्ठ भक्त कैसे हुआ ? विष्णुजी नारदजी की परीक्षा लेकर उन्हें समझाने का निश्‍चय करते हैं । वो नारदजी को किसान के पास लेकर जाते हैं और पूछते हैं कि तुम कितनी बार भगवान विष्णु जी का नामस्मरण करते हो उस समय किसान कहता है, ‘‘जब जब ध्यान में आता तब तब करता हूं किंतु अधिक नहीं करता मैं अपने काम में व्यस्त रहता हूं । सुबह उठने के उपरांत मैं विष्णुजी का नाम लेकर उन्हें प्रार्थना करता हूं कि आपके कारण आज का दिन मुझे देखने को मिला । और रात को सोने से पूर्व उन्हें धन्यवाद देता कि आपके कारण ही मेरा आज का दिन अच्छा से गया । बस इससे अधिक तो मैं कर नहीं पाता ।’’

भगवान विष्णु उस किसान को और महर्षि नारद जी को पानी से भरा एक घडा देते हैं और दोनों को कहते हैं, ‘‘जो इस भरे घडे में से बिना एक बूंद पानी गिराए इस खेत के चक्कर लगा सकेगा, वही मेरा श्रेष्ठ भक्त होगा ।’’ नारदजी घडा लेकर निकलते हैं और बिना एक बूंद गिराए खेत का चक्कर लगाकर आते हैं और भगवान विष्णु जी को कहते हैं ‘‘देखिए प्रभु पानी की एक बूंद भी नहीं गिरी ।’’ अब भगवान विष्णु किसान को खेत का चक्कर लगाने को कहते हैं, किसान सिर पर घडा रखकर विष्णुजी को प्रार्थना कर उनका नामस्मरण करके बिना एक बूंद गिराए खेत का चक्कर लगाकर आता है । तब विष्णु भगवान कहते हैं, ‘‘देखा किसान ही मेरा सच्चा भक्त है ।’’ नारदजी को बडा आश्‍चर्य लगता है, ‘ऐसा कैसे हुआ’ तब भगवान विष्णु उन्हें पूछते हैं, ‘‘आप जब सिर पर पानी का घडा रखकर खेत के चक्कर लगा रहे थे, तो आपने मेरा नामस्मरण कितनी बार किया ?’’ ये प्रश्‍न पूछने पर नारदजी को ध्यान में आता है, वो तो नामस्मरण करना भूल ही गए थे । उनका तो पूरा ध्यान ‘घडा में से पानी नहीं गिरना चाहिए’, इसी के ऊपर था । तब उन्हें ये भी ध्यान में आता है किसान ने तो भगवान विष्णु को प्रार्थना करके और उनका स्मरण करके अपने कार्य को आरंभ और समाप्त किया था । इस प्रकार भगवान विष्णु जी नारदजी को उनकी भूल का भान करवाते हैं ।

यह कथा बहुत ही बोधप्रद है । इस कथा के माध्यम से आपके अनेक प्रश्‍नों के उत्तर मिले होंगे । अब नामस्मरण के संदर्भ में आपने जो प्रश्‍न पूछे हैं, उनके संदर्भ मे भी हम देखेंगे । सर्वप्रथम हमें ये ध्यान में लेना है कि नामजप करने के लिए कोई भी स्थल-काल का बंधन नहीं है । बिना स्नान किए, भूमि पर, कुर्सी में बैठकर, खडे रहकर, चलते फिरते, मन ही मन, बोलकर तथा लिखकर किसी भी प्रकार से हम नामजप कर सकते हैं । महिलाओं के लिए घर के काम करते समय, पुरुष अगर कोई बौद्धिक काम नहीं कर रहे हों, तो काम करते समय, गाडी चलते समय, बस ट्रेन में प्रवास करते समय, बच्चों के लिए नोट बुक में लिखवाकर भी नामजप कर सकते हैं । माला लेकर अथवा भगवान के सामने बैठकर ही नामजप करना चाहिए, ऐसा कोई बंधन नहीं है । इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने कलियुग में नामजप करना सर्वश्रेष्ठ और सरल साधना मार्ग बताया है । अभी हम घर पर हैं, तो जितना संभव है उतना बैठकर नामजप करने का प्रयास करेंगे, तो उससे हमें नामजप का अभ्यास होने में सहायता होगी ।

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