अनुक्रमणिका
- १. विश्वयुद्ध अटल होने के कारण प्राणरक्षा के कृत्यों और साधना को सर्वोच्च प्राथमिकता दें ! – सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले
- २. शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति के लिए स्वभावदोष, प्रमाद और संभ्रम को दूर करें ! – श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळ
- ३. आपातकाल में संरक्षण प्राप्त करने के लिए ईश्वर के भक्त बनें ! – श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ
१. विश्वयुद्ध अटल होने के कारण प्राणरक्षा के कृत्यों और साधना को सर्वोच्च प्राथमिकता दें !
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले

‘वर्तमान में वैश्विक स्तर पर अत्यधिक उलथापालथ हो रही है । वैश्विक स्तर पर विश्वयुद्ध अटल है तथा आगामी ५ से ७ वर्ष अत्यंत भीषण युद्धजन्य परिस्थिति सर्वत्र रहनेवाली है । यह काल अर्थात एक प्रकार से ‘संधिकाल’ (संक्रमण काल) है । आगे अत्यंत भयंकर आपातकाल आनेवाला है, यह पिछले २० वर्षों से ‘सनातन संस्था’ बता रही है । वह भयंकर काल अब आगे प्रत्यक्ष अनुभव करना पडेगा । इस संकटकाल में जीवित रहने और जीवन व्यतीत करने के लिए कौन-सी तैयारी करनी चाहिए ? साथ ही कौन-सी साधना करनी चाहिए ? इसका मार्गदर्शन सनातन संस्था ने समय-समय पर ग्रंथ, नियतकालिक, जालस्थल आदि के माध्यम से किया है । संस्था द्वारा किया गया यह मार्गदर्शन केवल पढने के लिए नहीं, अपितु उसे आचरण में लाने का उचित समय अब आ गया है । इसलिए बिना किसी विलंब के प्राणरक्षा के लिए आवश्यक कृत्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, साथ ही यह ध्यान में रखते हुए कि संकटकाल में भगवान केवल भक्त की ही रक्षा करते हैं, कठोर साधना करें और भगवान के अनन्य भक्त बनें !
पिछले ५-७ वर्षों से, विशेषतः कोरोना महामारी के काल से ‘संपत्काल’ (अच्छा समय) समाप्त होकर ‘आपातकाल’ का आरंभ हुआ । अब पिछले वर्ष से, अर्थात भारत-पाक युद्ध से युद्धकाल आरंभ हुआ है । प्रत्येक काल के नियम भिन्न होते हैं । संपत्काल में मनोरंजन, यात्रा, नौकरी-व्यवसाय को जैसे प्राथमिकता होती है, उसी प्रकार युद्धकाल में राष्ट्रीय कर्तव्यों का पालन करना, जीवित रहने के लिए प्रयास करना और साधना करना इन्हें प्राथमिकता होती है । संधिकाल में साधना करने से अनेक वर्षों की साधना अल्प कालावधि में हो जाती है । इसलिए आगामी ५-७ वर्षों के कठिन काल में साधना पर अधिक बल देने से आपको बडा आध्यात्मिक लाभ होगा और ईश्वरीय संरक्षण प्राप्त होगा ।
इस भीषण युद्धकाल में केवल स्वयं का विचार न करते हुए समाज के सात्त्विक हिंदुओं (जीवों) की रक्षा करना अत्यंत आवश्यक है । ऐसी कठिन परिस्थिति में सात्त्विक हिंदुओं (जीवों) की प्राणरक्षा हेतु निष्ठापूर्वक प्रयास करना, यही इस काल की वास्तविक समष्टि साधना सिद्ध होनेवाली है ।’
– सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले, संस्थापक, सनातन संस्था
२. शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति के लिए स्वभावदोष, प्रमाद और संभ्रम को दूर करें ! – श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळ

‘साध्यति निष्पादयति कार्यमिति साधकः।’ अर्थात जो आध्यात्मिक उन्नति साध्य करने के लिए अपेक्षित फल मिलने तक निरंतर कर्म (साधना) करता रहता है, वही साधक कहलाता है । ऐसे सच्चे साधक बनने की प्रक्रिया में सबसे बडे अवरोध हैं स्वभावदोष, प्रमाद और संभ्रम ।
१. स्वभावदोष : आलस्य आदि अनेक स्वभावदोषों के कारण साधना की गति और उसका फल कम हो जाता है । इसलिए साधकों के लिए ‘स्वभावदोष-निर्मूलन प्रक्रिया’ को आत्मसात करना महत्त्वपूर्ण है । इस प्रक्रिया के माध्यम से ‘स्वभावदोष’ रूपी बाधा का निराकरण किया जा सकता है ।
२. प्रमाद : प्रमाद अर्थात जान-बूझकर अथवा अनजाने में किया गया अनुचित आचरण । कर्मफल-सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक कर्म का फल भोगना ही पडता है; इसलिए कोई भी प्रमाद साधक की साधना का क्षय करता है । प्रमाद के परिणामस्वरूप साधक की अपेक्षित आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो पाती । प्रायश्चित आदि कर्मों के द्वारा प्रमाद का परिमार्जन (निवारण) किया जा सकता है; इसलिए साधक को हुए प्रमाद के लिए प्रायश्चित अवश्य लेना चाहिए ।
३. संभ्रम : साधक के लिए सबसे बडी बाधा यदि कोई है, तो वह है ‘संभ्रम’ ! संभ्रम साधक द्वारा स्वयं-निर्मित एक नकारात्मक मानसिक अवस्था है । इसमें मुख्यतः तीन बातें सम्मिलित होती हैं ।
अ. भ्रम – जो असत्य है, उसे सत्य मान लेना ।
आ. द्वंद्व – ‘यह उचित है अथवा अनुचित ?’, ऐसी अनिर्णित अवस्था में बने रहना ।
इ. संदेह – गुरु और साधना के विषय में मन में नकारात्मक विचार उत्पन्न होना ।
स्वभावदोष और प्रमाद पर हम अपने प्रयासों से विजय प्राप्त कर सकते हैं; परंतु संभ्रम की अवस्था को दूर करने के लिए गुरु का मार्गदर्शन अथवा गुरुकृपा ही आवश्यक होती है । गुरुरूप संतों का मार्गदर्शन ग्रहण करना ही संभ्रम दूर करने का सर्वोत्तम उपाय है । इस गुरुपूर्णिमा पर शीघ्र आध्यात्मिक उन्नति के लिए अपने भीतर के बाधारूपी स्वभावदोष, प्रमाद और संभ्रम को दूर करने का दृढ संकल्प करें !’
– श्रीसत्शक्ति (श्रीमती) बिंदा नीलेश सिंगबाळजी (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी की एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी)
३. आपातकाल में संरक्षण प्राप्त करने के लिए ईश्वर के भक्त बनें ! – श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ

जैसा कि अनेक दृष्टाओं और संतों ने बताया था, आपातकाल आरंभ हो चुका है । आगे आनेवाले अत्यंत भीषण आपातकाल से तरने के लिए ‘ईश्वर की भक्ति करना’, यही एकमात्र उपाय (समाधान) है !
भक्ति की पहली सीढी है, जीवन में प्रत्येक कर्म करते समय ईश्वर के प्रति अंतःकरण में भाव उत्पन्न करना । इसके लिए नित्य साधना करना आवश्यक होता है । गुरुचरणों की सेवा करते समय गुरु के सान्निध्य में जीव के अंतःकरण में देवता के प्रति स्वतः भाव उत्पन्न होता है । इसके लिए अलग से प्रयत्न नहीं करने पडते । गुरुचरणों को न छोडना, यह प्रत्येक जीव के जीवन का अंतिम ध्येय होना चाहिए । कुछ लोग कहेंगे, ‘हमारे गुरु नहीं हैं ।’ तब ‘इष्टदेवता ही हमारे गुरु हैं’, ऐसा भाव रखना चाहिए । इससे हमारा संपूर्ण जीवन ही बदल जाता है ।
‘जहां भाव वहां भगवान’ इस उक्ति के अनुसार निरंतर भगवान के आंतरिक सान्निध्य में रहा जा सकता है । आंतरिक सान्निध्य का जीवन में अनन्यसाधारण महत्त्व है । आंतरिक सान्निध्य के कारण जीव को माया का विस्मरण हो जाता है और उसके लिए जीवन ‘आध्यात्मिक आनंद का सागर’ बन जाता है । इससे वर्तमान में उस पर कितने भी संकट आएं, तो भी वह उनका हंसते-हंसते सामना करता है । इसे ही ‘ईश्वरकृपा होना’ अथवा ‘गुरुकृपा होना’ कहते हैं ।
मन में ईश्वर के प्रति अथवा गुरु के प्रति भाव होगा, तो ‘सबकुछ ईश्वर की इच्छा से ही हो रहा है’, ऐसी श्रद्धा मन में उत्पन्न होती है । आपातकाल में यही श्रद्धा और भक्ति हमारे जीवन का आधार बनती है । श्रद्धा और भक्ति के बिना जीवन की नौका मार्ग से भटक जाती है ।
आपातकाल में भावभक्ति के सहारे ही हम तर सकते हैं । संतों का कहना है कि ‘तीसरा विश्वयुद्ध भयंकर होगा ।’ उसके लिए पहले से ही मन और बुद्धि की तैयारी करना आवश्यक है । ‘नित्य साधना करना’, यही उसका एक उत्तम उपाय है ।
इस गुरुपूर्णिमा पर गुरु की शरण जाकर व्यष्टि और समष्टि साधना का उचित समन्वय करने का प्रयत्न करते हुए तीव्र साधना करने का संकल्प करें । ऐसी श्रद्धा रखें कि गुरु निश्चित ही हमें इस कठिन काल में तारेंगे ।
आपातकाल की स्थूल तैयारी के साथ ही, भाव, त्याग, शरणागति और अहं-निर्मूलन के माध्यम से आत्मिक तैयारी भी करें । इस गुरुपूर्णिमा पर ऐसा करने का दृढ संकल्प करें तथा सहस्र गुना कार्यरत गुरुतत्त्व का आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करें !’
– श्रीचित्शक्ति (श्रीमती) अंजली मुकुल गाडगीळ (सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवलेजी की एक आध्यात्मिक उत्तराधिकारिणी)
