श्री गणपति के कुछ अन्य नाम

किसी देवता के विषय में अध्यात्मशास्त्रीय ज्ञान (जानकारी) प्राप्त होने पर, देवता के प्रति श्रद्धा बढने में सहायता मिलती है । श्रद्धा के कारण उपासना भावपूर्ण होने में सहायता मिलती है एवं ऐसी उपासना अधिक फलदायक होती है । इसलिए प्रस्तुत लेखों मे श्री गणपति के विषय में सामान्य रूप से अन्यत्र न मिलनेवाला; परंतु उपयुक्त अध्यात्मशास्त्रीय ज्ञान (जानकारी) विशेषकर दिया हुआ है । श्री गणपति के प्रमुख नामों का भावार्थ, देवताओं की प्रकाशभाषा एवं मानव की नादभाषा को एक-दूसरे में रूपांतरण, प्राणशक्ति में वृद्धि इत्यादि गणपति के कार्य और विशेषताएं, दाईं एवं बाईं सूंड के गणपति का महत्त्व आदि । इस के साथ सार्वजनिक गणेशोत्सव के वर्तमान हृदय-विदारक स्वरूप को देखते हुए ‘वह कैसा हो और कैसा न हो’, इसका भी विवेचन इन लेखों मे संक्षिप्त रूप में दिया गया है । गणेशभक्तों को एवं श्री गणेश की सांप्रदायिक साधना करनेवालों को यह अध्यात्मशास्त्रीय ज्ञान निश्‍चित ही उपयुक्त सिद्ध होगा; परंतु इस संदर्भ में साधारण व्यक्ति के लिए आगे दिया हुआ नियम ध्यान में रखना आवश्यक है । कुछ लोगों को रामायण पढने पर प्रभु श्रीराम की, गणेशपुराण अथवा श्री गणपति अथर्वशीर्ष पढनेपर श्री गणपति की एवं देवीमाहात्म्य पढने पर देवी की उपासना करने का मन करता है । इसी प्रकार प्रस्तुत ज्ञान पढकर कुछ लोगोंको श्री गणपति की उपासना करने की इच्छा होगी; परंतु ध्यान दें कि इस प्रकार की उपासना से सबकी आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र नहीं होती । इसलिए कि यदि गणपति इत्यादि विशेष देवता की उपासना करना आवश्यक हो, तब ही उस उपासना का अधिक लाभ मिलता है, अन्यथा बहुत साधना करनेपर भी अत्यल्प प्रगति होती है । ‘गणपति की उपासना अगले चरण की उपासना है तथा वह स्वयंके लिए आवश्यक है अथवा नहीं’, यह साधारण व्यक्ति को ज्ञात नहीं होता; केवल आध्यात्मिक दृष्टिसे उन्नत पुरुष ही बता सकते हैं । इसलिए साधारण व्यक्ति प्रस्तुत लेखों को केवल ज्ञान पाने के लिए ही पढें । साधना के संदर्भ में अनुभूति पाने की दृष्टि से साधना के पहले चरण के रूपमें अपनी कुलदेवता ‘श्री… (कुलदेवी / कुलदेव के नाम का चतुर्थी का प्रत्यय)… नमः ।’ इस पद्धति से (उदा. कुलदेवी श्री अंबादेवी हों, तो ‘श्री अंबादेव्यै नमः ।’ इस प्रकार) जप करें । भविष्य में यदि गुरु गणपति का नाम जपने के लिए बताएं, तब इन लेखों मे प्रस्तुत ज्ञान का उपयोग गणपतिपर श्रद्धा बढाने में सहायक होगा । अन्योंको यह लेख पढकर गणपति के विषय में कुछ नूतन जानकारी प्राप्त होगी । श्री गुरुचरणों में यही प्रार्थना है कि यह विषय पढकर गणेशभक्तों की श्री गणेश के प्रति श्रद्धा दृढ हो एवं प्रत्येक को अधिकाधिक साधना करने की प्रेरणा मिले । – संकलनकर्ता

अब जान लेते हैं श्री गणेशजी के ’गणपति’ और अन्य कुछ नामों का अर्थ

 

१. ’गणपति’ इस शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ

गण + पति = गणपति । संस्कृतकोशानुसार ‘गण’ अर्थात पवित्रक । पवित्रक अर्थात सूक्ष्मातिसूक्ष्म चैतन्यकण । ‘पति’ अर्थात स्वामी । ‘गणपति’ अर्थात पवित्रकों के स्वामी ।

 

२. श्री गणपति के कुछ अन्य नाम एवं उनके अर्थ

मुद्गल ऋषि ने ‘गणेशसहस्त्रनाम’ लिखा है । उसमें गणपति के 1 सहस्त्र (हजार) नाम दिए गए हैं । द्वादशनाम स्तोत्र में श्री गणपति के 12 नाम इस प्रकार हैं ।

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥

उपरोक्त बारह नाम तथा श्री गणपति के कुछ अन्य नाम एवं उनका आध्यात्मिक अर्थ आगे दिया गया है।

२ अ. वक्रतुंड

सामान्यतः ‘वक्रतुंड’ का अर्थ ‘वक्र मुंह अथवा सूंडवाला’ लगाया जाता है; परंतु यह अर्थ उचित नहीं है । ‘वक्रान् तुण्डयति इति वक्रतुण्डः । अर्थात ‘वक्र (बुरे) मार्ग पर चलनेवालों एवं बोलनेवालों को दंड देकर सीधे मार्ग पर लानेवाले को वक्रतुंड कहते हैं ।’ तिर्यक (रज-तम) एवं विस्फुटित (तम-रज) अर्थात वह जो ३६० टेढी रज-तमात्मक तरंगों को अपनी सूंड के माध्यम से १०८ तरंगों के समान सीधा एवं सात्त्विक बनाता है । (२७ नक्षत्रों से निकली २७ तरंगों के अजानजलोक में प्रत्येक के चार चरण (विभाग) होकर पृथ्वी पर २७ x ४ = १०८ तरंगें आती हैं । शेष से निकलनेवाली तरंगों को ‘हिरण्यगर्भ-तरंगें’ कहते हैं । पृथ्वी के पृष्ठभाग पर आने पर, उनकी संख्या ३६० होती है; इसलिए उन्हें ‘३६० तरंगें’ कहते हैं ।)

२ आ. एकदंत अथवा एकशृंग

यह नाम इसलिए कि गणपति का एक ही दंत अखंड है (दूसरा टूटा हुआ है) । दो दंतों में से दाहिना दंत अखंड होता है, बायां दंत टूटा हुआ होता है ।

१. दाहिनी बाजू सूर्यनाडी की होती है । सूर्यनाडी तेजस्वी होती है, इसलिए ऐसे तेजस्वी भाग का दंत कभी भी खंडित नहीं हो सकता ।

२. ‘एक’ ब्रह्म का निर्देशक है, एकदंत ।

३. ‘दंत’ शब्द दृ-दर्शयति (अर्थात दिखाना) धातुसे बना है । इसका यह भी अर्थ है कि एकदंत वह है जो ‘एक’ ब्रह्म की अनुभूति पाने की दिशा दिखाता है ।

४. मेधा तथा श्रद्धा, दो दंत हैं । मेधा अर्थात बुद्धि, धारणशक्ति । मेधा अपूर्ण (खंडित) दंत तथा श्रद्धा पूर्ण दंत है ।

२ इ. कृष्णपिंगाक्ष

कृष्ण + पिंग + अक्ष, इस प्रकार यह शब्द बना है । कृष्ण अर्थात सांवला, पिंग अर्थात धूमवर्ण (धुएं समान) एवं अक्ष अर्थात नेत्र । सांवला पृथ्वी के संदर्भ में है, धूमवर्ण मेघ के संदर्भ में है । ‘पृथ्वी एवं मेघ जिस के नेत्र हैं अर्थात वह जो पृथ्वी एवं मेघ के मध्य में जो कुछ भी है, उसे संपूर्ण रूपसे देख सकता है ।’

२ ई. गजवक्त्र

१. गज अर्थात मेघ । इसे द्यु (देव) लोक का प्रतिनिधि मानते हैं । वक्त्र अर्थात मुंह । गजवक्त्र अर्थात वह जिसका मुंह द्युलोक समान (विराट) है ।

२. ग अर्थात कह तत्त्क जिसमें सब का लय होता है और ज अर्थात कह तत्त्क जिस से सब का जन्म होता है; अतः गज अर्थात ‘ब्रह्म’ । (मुद्गलपुराण)

२ उ. लंबोदर

यह शब्द लंब (अर्थात बडा) तथा उदर के मेल से बना है ।

१. लंबोदर शब्द का अर्थ संत एकनाथ ने कुछ ऐसा दिया है – चराचर सुष्टि आपके उदर में विचरती है, इसलिए आपको लंबोदर कहते हैं । – एकनाथी भागवत, आरंभ, पंक्ति ३

२. गणपतितंत्रानुसार भगवान शंकर ने डमरू बजाया । डमरू के गंभीर नाद से (ध्वनि से) श्री गणेश ने वेदविद्या ग्रहण की । प्रतिदिन तांडवनृत्य देखकर श्री गणेश ने नृत्यकला सीखी । पार्वती की नूपुर की झंकार से उन्होंने संगीत सीखा । इतने विविध प्रकार का ज्ञान उन्होंने आत्मसात अर्थात उदरस्थ किया; इसलिए उनका उदर बडा हो गया ।

२ ऊ. विकट

वि + कृत + अकत (आकुति) । वि अर्थात विशेषतः, कृत अर्थात किया हुआ एवं अकत अर्थात मोक्ष; इसीलिए विकट अर्थात वह ‘जो विशेष पद्धति से तरंगें उत्पन्न कर मोक्ष प्रदान करता है।’

२ ए. विघ्नेश

विघ्न + ईश = विघ्नेश । विघ्न शब्द ‘विशेषेण घ्नन्तीति विघ्नानि ।’ (विघ्न वे हैं, जो विशेषकर हिंसा करते हैं, कष्ट देते हैं ।) से बना है । विघ्नों के, संकटों के ईश को अर्थात उनका नियमन एवं नाश करनेवाले को कहते हैं विघ्नेश । विघ्न अर्थात 360 (रज-तम) तथा 108 (सत्त्व) तरंगोंसे घिरा होना । यह त्रिगुणातीत होनेके ध्येय के विपरीत है । ईश शब्द ई + श से बना है । ई-ईक्षते अर्थात देखना एवं श-शमयते अर्थात शांत करना; इसलिए ईश अर्थात इन 360 एवं 108 तरंगों पर ध्यान देकर उनकी तपिश को लुप्त करनेवाला, उन्हें नष्ट करने वाला । गणपति का एक नाम ‘विघ्नहर्ता’ भी है । श्री गणपति विघ्नहर्ता हैं, इसलिए किसी भी धार्मिक मंगलविधि से पूर्व श्री गणेशपूजन होता है ।

२ ऐ. धूम्रवर्ण

धूम्र अर्थात धुआं । धुआं घनीकरण के समय की प्राथमिक अवस्था है । घनरूप में सगुण एवं निर्गुण के बीच की अवस्था है धुआं । जो ऐसे धूम्रवर्ण का है, इसलिए यह नाम । ‘जहां धुआं है, वहां अग्नि है’, इस नियमानुसार श्री गणपति में अग्नितत्त्व (अंगार) है ही ।

२ ओ. भालचंद्र

भाल अर्थात भौहों के ऊपर मस्तक का भाग । प्रजापति, ब्रह्मा, शिव, श्रीविष्णु तथा मीनाक्षीसे प्रसारित तरंगों के एक-दूसरे में मिश्रित होने पर, उनसे सहस्रों तरंगों के कई समूह निर्मित होते हैं । प्रजापति, ब्रह्मा, शिव, श्रीविष्णु तथा मीनाक्षी निर्गुण हैं; परंतु उनकी तरंगें गुणमय हैं । उनमें से तीन तरंगें अर्थात ममता, क्षमाशीलता व वात्सल्य की (आल्हाद की) तरंगें जहां से निकलती हैं, उसे चंद्र कहते हैं । ऐसे ‘चंद्र’ को जिसने अपने भाल (मस्तक) पर धारण किया है, उसे भालचंद्र कहते हैं । मूलतः यह नाम शंकर का है; परंतु शंकरपुत्र होने के नाते गणपति का भी यह नाम पड गया ।

२ औ. विनायक

‘विशेषरूपेण नायकः ।’ से यह शब्द आया है । इसका अर्थ कुछ इस प्रकार है – जिसमें नायक की अर्थात, नेता की समस्त विशेषताएं विद्यमान हैं । ‘यह सर्वमान्य है कि कुल छः विनायकगण हैं । मानवगृह्यसूत्र तथा बौधायनगृह्यसूत्र में विनायकगणों के संदर्भ में जानकारी दी गई है, जिसका सारांश यह है कि विनायकगण विघ्नकारी, उपद्रवकारी तथा व्र्ाूर होते हैं । एक बार उनका उपद्रव आरंभ हो जाए, तो मनुष्य का आचरण विक्षिप्त हो जाता है । उन्हें भयानक स्वप्न आते हैं और वे सदैव भयभीत रहते हैं । इन विनायकगणों की बाधा नष्ट होने हेतु धर्मशास्त्र में अनेक शांतिविधियां बताई गई हैं । श्री गणपति विनायक हैं अर्थात सर्व विनायकगणों के अधिपति हैं । शिवजी ने गणपति से कहा, ‘विनायकगण तुम्हारे सेवक होंगे । यज्ञ आदि कार्य में तुम्हारी पूजा प्रथम होगी । जो व्यक्ति ऐसा न करे, उसकी कार्यसिद्धि में विघ्न आएंगें ।’ तब से कार्यारंभ में श्री गणपतिपूजन होने लगा । विनायकगण विघ्नरूप थे; परंतु विनायक विघ्नहर्ता हो गए । भक्तों को अभीष्टसिद्धियां प्राप्त करवानेवाले वे सिद्धिविनायक बन गए ।’

२ अं. श्री गणपति

‘सूत्र १. व्युत्पत्ति एवं अर्थ’ देखें ।

२ अः गजानन

गज अर्थात ‘हाथी’ एवं आनन अर्थात ‘मुख’ । वह जिसका मुख (चेहरा) हाथी के मुख समान है (तथा देह है संपूर्ण विश्‍व) ।

२ क. व्रातपति

‘श्री गणपत्यथर्वशीर्ष में गणपति को ‘नमो व्रातपतये’, ऐसे नमन किया है ।

२ ख. चिंतामणि

‘यह गणपति का अन्य एक नाम है । चित्त की पांच अवस्थाएं होती हैं – क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र एवं निरुद्ध । जो इन अवस्थाओं को प्रकाशित करता है, वह चिंतामणि कहलाता है । चिंतामणि के भजन से चित्त की पांचों अवस्थाओंका नाश होता है तथा पूर्ण शांति का लाभ होता है ।’ – मुद्गलपुराण

२ ग. मंगलमूर्ति

मङ्गं सुखं लाति इति मङ्गलम् । मंग अर्थात सुख प्राप्त करवाता है, वह मंगल । ऐसी मंगलकारी मूर्ति को ‘मंगलमूर्ति’ कहते हैं ।

२ घ. उमाफल

उमा अर्थात पार्वती । पार्वती का फल अर्थात ‘पुत्र’ के अर्थ से श्री गणपति का यह एक नाम है । उमाफल का दूसरा अर्थ है ज्ञान । श्री गणपति ज्ञान के देवता हैं; इसलिए यह नाम दोनों अर्थों से श्री गणपति के लिए लागू होता है ।

२ च. विद्यापति

१८ विद्याओं के – १. शिक्षा, २. कल्प, ३. व्याकरण, ४. निरुक्त, ५. ज्योतिष, ६. छंद, ७. ऋग्वेद, ८. यजुर्वेद, ९. सामवेद, १०. अथर्ववेद, ११. पूर्व-उत्तरमीमांसा, १२. न्याय, १३. पुराण, १४. धर्मशास्त्र, १५. आयुर्वेद, १६. धनुर्वेद, १७. गांधर्ववेद और १८. नीतिशास्त्र के इन १८ विद्याओं के अधिपति श्री गणेश हैं; इसलिए विद्याओं का अध्ययन आरंभ करने से पहले अथवा विद्यांर्तगत पाठ्यक्रम में श्री गणेशपूजन महत्त्वपूर्ण है ।

२ छ. ब्रह्मणस्पति

वेदों को ‘ब्रह्म’ कहते हैं । ‘वेदब्रह्म’, ऐसा शब्दप्रयोग करते हैं । इन वेदों के मंत्रों के अधिपति श्री गणेश हैं; इसलिए उन्हें ‘ब्रह्मणस्पति’ कहते हैं ।

२ ज. भूभाग के अनुसार विविध नाम

विभिन्न प्रांतों में श्री गणेश के विभिन्न नाम प्रचलित हैं । दक्षिण हिंदुस्थान में श्री गणेश को ‘राजमुख’ अथवा ‘मुरुगन’ संबोधित किया जाता है । नेपाल में वह ‘सूर्यगणपति’, म्यानमार में (पहले का ब्रह्मदेश) ‘महापिनी’, मंगोलिया में ‘धोतकार’, तिब्बत में ‘एकदंत’, कंबोडिया में ‘प्रदगणेश’, जावा द्वीपपर ‘कलांतक’, चीन में ‘क्वान्शिटियिक’ तथा जापान में  ‘विनायकशा’ के नामों से प्रचलित हैं ।

 

३. महागणपति

पार्वती द्वारा निर्मित गणेशजी महागणपति के अवतार हैं । उन्होंने मिट्टी से आकार बनाया तथा उसमें गणपति का आवाहन किया । जगदुत्पत्ति से पूर्व महत्तत्त्व निर्गुण तथा आत्मस्वरूप में होने के कारण उसे ‘महागणपति’ कहते हैं । जब महागणपति की आराधना विशेष सिद्धिप्राप्ति अथवा केवल मोक्षप्राप्ति के लिए की जाती है, तब दाहिनी सूंडवाले गणपति लेने की प्रथा है; परंतु ऐसे में वह संभवतः पार्थिव गणपति होता है । कुछ सोने-चांदी की बनी दाहिनी सूंड के गणपति की मूर्तियां भी क्वचित पाई जाती हैं ।’ ‘प्रत्येक पुरुषदेवता की एक विशेष शक्ति मानी जाती है, उदा. ब्रह्मा-भारती, श्रीविष्णु-श्री लक्ष्मी, शिव-पार्वती । गाणपत्यों ने (गणेश संप्रदायवालों ने) भी परब्रह्मरूप गणपति की कोई एक शक्ति मानी हो, तो कोई आश्‍चर्य की बात नहीं होगी । एक शिल्प में श्री गणपति अपनी शक्ति को गोद में बिठा आलिंगन करते हुए दिखाए गए हैं । आज भी ऐसा रंगीन चित्र देखने को मिलता है । उसी प्रकार, ऐसे भी शिल्प उपलब्ध हैं, जिनमें उनकी दोनों पत्नियां, ‘सिद्धि’ और ‘बुद्धि’ (‘रिद्धि’ और ‘सिद्धि’), उनके दोनों ओर बैठी हुई हैं । इस शक्तिसहित गणपति को तंत्रशास्त्र में ‘महागणपति’ कहा गया है ।

 

४. व्याप्ति

अ. गणपति का सिर चंद्रमा का दर्शक है ।

आ. उनका पेट पृथ्वी का दर्शक है ।

इ. उनके पैर सप्त पाताल के दर्शक हैं ।

किसी भी देवता की पूजा में प्रथम श्री गणपतिपूजन करने का महत्त्व

अन्य देवता किसी भी दिशा से श्री गणेश की अनुमति के बिना पूजास्थान पर नहीं आ सकते । इसलिए मंगलकार्य अथवा अन्य किसी भी देवतापूजन के समय प्रथम श्री गणपतिपूजन करते हैं । श्री गणेशद्वारा दिशाएं मुक्त किए जाने पर, जिस देवता की हम पूजा कर रहे हैं, वे वहांपर पधार सकते हैं । इसी को ‘महाद्वारपूजन’ अथवा ‘महागणपतिपूजन’ कहते हैं । (गाणपत्य संप्रदाय में ब्रह्म के लिए ‘गणपति’ तथा परब्रह्म के लिए ‘महागणपति’ शब्द का प्रयोग किया जाता है ।)

संदर्भ : सनातन-निर्मित ग्रंथ ‘श्री गणपति’

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